शादी समारोह में चुदाई समारोह
नाम है मेरा आरुष लेकिन घर मे सभी मुझे गोलू कह कर ही बुलाते है। ग्रेजुएशन के दूसरे साल में हूँ, पढ़ाई में ठीक ठाक और दिखने में स्मार्ट हूँ। खेल कूद में आगे रहता हूँ तो बदन भी गठा हुआ है।

ज्योति - मेरी बड़ी बहन, दिखने में खूबसूरत लेकिन बहुत कम बोलने वाली। ग्रेजुएशन पास कर के अभी सरकारी नॉकरी की तैयारी में लगी है। बदन भरा हुआ है लेकिन फैशन से दूर ही रहती है।

माँ - सीधी सादी घरेलू महिला। पूजा पाठ में भरपूर विश्वास। हफ्ते में 3 दिन तो इनका उपवास ही रहता है, इस वजह से बदन दो बच्चों के बाद भी छरहरा बना हुआ है।

पिताजी - रेलवे में ड्राइवर हैं, महीने में 20 दिन तो घर से बाहर ट्रेन में ही गुजरता है इनका।


आज सुबह से ही घर मे सभी व्यस्त थे, क्योंकि आज हमें गांव जाना था, चाचा जी के बेटे विकास की शादी में। शादी में अभी दस दिन बाकी थे लेकिन बहुत सारी तैयारियां करनी थी इसलिए चाचा जी ने हमें पहले ही बुला लिया था। हम सभी ट्रेन से ही जाने वाले थे क्योंकि पिताजी को परिवार के लिए पास जो मिलता था। रोज की तरह माँ सुबह उठकर नहा धो कर पूजा करने बैठ गई थी, ये इनका रोज का नियम था। पिताजी बाथरूम में नहा रहे थे। मैंने दीदी के रूम में झांक कर देखा तो वो अभी तक सो रही थी। उन्होंने नाइटी पहनी हुई थी जो जांघों तक उठ गई थी। पीठ के बल लेट होने के कारण उनकी छातियाँ उभरी हुई नुकीली घाटियों जैसी दिख रही थी। तभी माँ पूजा करते करते चिल्लाई "अरे गोलू जरा देख ज्योति उठी की नही अब तक". अब तो मुझे मौका मिल गया मैं दीदी के रूम में घुसा, उनके बेड के पास जाकर खड़ा हो गया। उनके कंधे पर हाथ रख कर हिलाया "दीदी दीदी, उठो सुबह हो गई" लेकिन दीदी गहरी नींद में थी। कोई हलचल ना पाकर में उनके पैर की तरफ आया और उनकी उघड़ी हुई जाँघे देखने लगा। एकदम गोरी दूधिया रंगत, केले के तने जैसी मोटी जाँघे। मैन किया कि अभी सहलाना शुरू करूं पर डर से हाथ नही उठे। मैंने एक बार फिर दीदी को आवाज लगाई, लेकिन वो वैसी ही पड़ी रही। मैंने थोड़ा रिस्क लेने का सोचा और नाइटी को और ऊपर सरकाने लगा। बड़े घेर की नाइटी होने के कारण आराम से कमर तक ऊपर हो गई। और मुझे दर्शन हुए लाल रंग की पैंटी में ढकी उनकी चूत की। पैंटी एकदम सही साइज की पहनी थी दीदी ने, इसलिए बदन से बिल्कुल चिपकी हुई थी और इस कारण चूत वाली जगह पर उभार काफी स्पष्ट दिख रहा था। पैंटी के दोनों साइड में से काले काले बाल झांक रहे थे, इसका मतलब दीदी झांट की सफाई नही करती थी। लेकिन गोरी जाँघे, लाल पैंटी और काले झांट के बाल ये मिल कर मेरे लौड़े को सख्त कर चुके थे। मन तो कर रहा था चूत वाली जगह को मुट्ठी में भर कर मसल दूं, लेकिन डर था कहीं दीदी की नींद ना खुल जाए। तभी घंटी बजने की आवाज आयी, मतलब माँ की पूजा अब खत्म होने वाली है। मैंने उस रसीली चूत को एक बार भरपूर नजरों से निहारा और दबे पाँव दीदी के कमरे से निकल कर अपने कमरे में आकर सीधे बाथरूम घुस गया। जल्दी से कपड़े ख़ौल कर लंड को आजाद किया जो बोहोत देर से घुट रहा था। एक हाथ से लंड सहलाते हुए मैंने आंखे बंद कर ली और दीदी की लाल पैंटी में ढकी चूत को याद करने लगा। आह कितना मजा आ रहा था, मैंने लंड को सहलाना तेज कर दिया। और कुछ देर में दीदी को याद करते करते झड़ गया।

तैयार होकर जब मैं अपने रूम से निकला तो देखा मां टेबल पर नाश्ता लगा रही थी. आज उन्होंने क्रीम कलर की साडी लाल ब्लाउज के साथ पहनी थी. आँचल को छाती से होते हुआ कमर पर खोंसा था तो उनके स्तन ताने हुए नज़र आ रहे थे. नाश्ता रखने के लिए जब वो टेबल पर झुकी तो पल्लू ढीला हों जाने के कारण स्तन की गोलियों का उपरी हिस्सा नज़र आया. लेकिन बस पाल भर के लिए फिर मां मुड़ कर वापस किचन ओर चली गयी. जाते समय उनका साड़ी में लिपटा भारी पिछवाड़ा बड़ा मस्त लग रहा था. इतना नयन सुख लेने के बाद मेरे लौड़े ने फिर से हरकत शुरू कर दी थी और धीरे धीरे बड़ा होने लगा था. इस से पहले कोई ध्यान देता मैं डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गया नाश्ता करने और पिताजी को भी आवाज् लगाईं. फिर पापा और मैं दोनों नाश्ता करने लगे. तभी मां किचन से चाय लेकर आई और ज्योति को आवाज लगाईं. "अरे कितना टाइम लगाती है बेटी तैयार होने में, चल जल्दी कर" 10 बजे की ट्रेन है और 8 बजने को आये अभी तक हमारा नाश्ता भी नहीं हुआ था.

"आई मां " दीदी के कमरे से आवाज आई और उसके थोड़ी देर बाद वो भी कमरे से बाहर आई. हाय जीन्स और टी-शर्ट में क्या क़यामत लग रही थी. चूचियां तो जैसे टी-शर्ट से बाहर निकलने के लिए तड़प रही हों, इतनी कसी हुई थी. मां उसे देख मुस्कुरा दी, भले ही मां पूजा-पाठ में काफी विश्वास करती हों पर उन्होंने कभी हमें फैसन या कपड़ों वगैरह के लिए नहीं टोका. दीदी आकर टेबल पर मेरे सामने बैठ कर नाश्ता करने लगी. दीदी कुर्सी इतनी आगे कर के बैठी थी की लग रहा था उन्होंने चूचियां टेबल पर टिका कर रख दी हों. गौर से देखने पर मुझे उनके कन्धों पर ब्रा की लाइन भी दिखाई देने लगी. पहले मां और फिर ज्योति के बदन दर्शन से मेरे लौड़ा पूरे जोश में आ चुका था. मां नाश्ता कर के उठ चुकी थी. पिताजी कमरे से सफ़र का सामान बहार निकाल रहे थे. दीदी ने नाश्ता ख़तम करते हुए कहा " गोलू जल्दी कर, कितनी देर तक नाश्ता ही करता रहेगा, ट्रेन पकडनी भी है या नहीं." दीदी की बात सुन कर मैं बोला " बस दीदी ये चाय ख़तम कर लूं फिर उठता हूँ" ये सुनकर दीदी कुर्सी से उठी और टेबल से बर्तन उठा कर अपनी गांड मटकाती हुई किचन की उर चल दी. अब मैं दीदी को कैसे समझाता की जबतक ये मेरे पेंट में तम्बू बना है मैं कैसे कुर्सी से उठूं.

खैर थोड़ी देर में लौड़ा थोड़ा नरम पड़ा, तो जल्दी से मैं बहार गेट की ओर लपका जहां पिताजी ऑटो में सामान चढ़ा रहे थे स्टेशन जाने के लिए. मां ने गेट में ताला बंद किया और पड़ोस वाली आंटी को घर का ख्याल रखने को कह कर ऑटो के पास आ गयी. पापा ड्राईवर के साथ आगे वाली सीट पर बैठ गए और पीछे माँ और दीदी बैठ गयी. सामान ज्यादा होने के कारण पीछे और जगह नहीं बची थी. अब मैं कहाँ बैठता. अब या तो मैं माँ की गोद में बैठता या दीदी की गोद में. मां ने अपनी गोद में चाचा के बेटे के लिए खरीदा हुआ सेहरा के साथ और भी सामान पकड़ रखा था. मां ने कहा "गोलू तू दीदी की गोद में बैठ जा." मैं तो इसी के इंतज़ार में था, झट से मैं दीदी की गोद में धम्म से जा बैठा. उनकी गद्देदार नर्म नर्म जांघों का मजा ही कुछ और था. और मैंने जान बूझ कर अपनी पीठ थोड़ी पीछे कर ली ताकि दीदी की चूचियां मेरी पीठ से रगड़ खाए. घर से स्टेशन तक का रास्ता गड्ढों से भरा था तो ऑटो भी धीरे धीरे हिचकोले खाता हुआ जा रहा था. गड्ढों के कारन ऑटो कभी दायें तो कभी बाएं झुकता और दीदी की छातियाँ मेरे पीठ से रगड़ खाती. बहुत ही आनंद मिल रहा था मुझे एक तरफ नर्म नर्म जाँघों की सिंघासन तशरीफ़ रखने के लिए और दूसरी ओर नर्म चूचियों की पुश्त पीठ टिकाने के लिए. इतने आनंद की प्राप्ति के बाद मेरा लौड़ा क्यों भला शांत रहता, उसने सर उठाना शुरू किया और धीरे धीरे मेरे पेंट में तम्बू दिखने लगा. दीदी ने अपना हाथ मेरे कमर के दोनों बाजू से आगे करते हुए मेरी जाँघों पर रखा था. तभी एक बड़ा गड्ढा आया और ऑटो बड़ी जोर से हिला, बैलेंस बिगड़ने से दीदी आगे की ओर गिरने लगी और बचने के लिए उनके हाथ कोई सहारा ढूँढने लगे. अचानक उनकी मुट्ठियाँ मेरे लौड़े पर कस गई. पहले थोड़ा दर्द हुआ फिर मजा आने लगा. मां की गोद में सामान का ढेर होने के कारण उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. खराब रास्ता अभी ख़तम नहीं हुआ था इसलिए ऑटो हिल डुल ही रहा था. इस कारण दीदी ने भी अपनी मुट्ठी नहीं खोली और वैसे ही मेरे लौड़े को पकड़ कर ऑटो के साथ हिल डुल कर बैलेंस बनाकर बैठी रही.
दीदी द्वारा लंड मुट्ठी में पकडे जाने और ऑटो के लगातार हिलने डुलने के कारण बिलकुल मूठ मारने वाली फीलिंग आ रही थी. मैं भी दीदी के चूचों को अपने पीठ से रगड़ते हुए मज़ा ले रहा था. बस मुझे इसी बात का दर था की कहीं मेरा पानी ना छूट जाये. ऐसा होने से मेरी चड्डी गीली हों जाती और शायद दीदी को पता चल जाता.
स्टेशन अब आने वाला था और रास्ता भी अब ठीक था. मैंने थोड़ा मज़ा लेने की सोची और धीरे से दीदी के कानों में कहा
मैं: दीदी हाथ छोड़ो, दर्द कर रहा है.
तब दीदी ने ध्यान दिया की जिसे अब तक वो ऑटो का हैण्ड रेस्ट समझकर पकड़ी हुई थी वो असल में मेरा लंड था. दीदी का चेहरा लाल हों गया और वो शरमाने लगी. तबतक स्टेशन आ गया था, हमलोगों ने सामान उतारा और स्टेशन के अन्दर चले गए. ट्रेन आने में अभी टाइम था. हम दोनों को सामान के साथ खड़ा कर के माँ पिताजी फ़ूड स्टाल की तरफ चले गए खाना पैक करवाने के लिए. दीदी अब भी चुप थी और मुझसे नज़रें चुरा रही थी. मैंने सोचा इनकी झिझक दूर करनी होगी, इसलिए उनसे बात करनी शुरू की.
मैं: दीदी, आज स्टेशन में काफी भीड़ है ना?
दीदी: (सर झुका कर) हूं.
मैं: क्या हुआ दीदी आप ठीक से बात नहीं कर रही हों, मुझसे गुस्सा हो क्या?
दीदी: नहीं तो.
मैं: तो फिर आप मुझसे ठीक से बात क्यों नहीं कर रही हों? आपको मेरी कसम है क्या हुआ आप मुझे बताओ.
दीदी: (मेरी ओर देखते हुए) गोलू, मेरे भाई तुझे मैंने कितनी बार कहा है की ये कसमे ना दिया कर मुझे. असल में आज ऑटो में जो हुआ उसके लिए मैं बहुत शर्मिन्दा हूँ.
मैं: ओह दीदी, आप अभी तक उसी बात के बारे में सोच रही हों. ये तो नार्मल सी बात थी. और आपने कुछ जान बूझ कर तो नहीं किया था ना. देखो अगर मैं आपके साथ सड़क पर चल रहा हूँ और अचानक फिसल कर आपके ऊपर गिर गया और मेरा हाथ आपके बूब्स पर चला जाएगा तो क्या आप गुस्सा हों जाएँगी?
दीदी: नहीं वो तो तुम जान बूझ कर तो नहीं करोगे ना.
मैं: तो बिलकुल आज ऑटो में जो भी हुआ वो आपने जान बूझकर तो नहीं किया था ना, तो इसमें शर्मिन्दा होने की बात नहीं है. (अब दीदी नार्मल होने लगी थी और मेरी ओर देख कर हलके हलके मुस्कुरा रही थी) और वैसे भी हम तो भाई बहन है. और आपने तो मुझे नंगा भी देखा है, तो क्या हुआ आपने अगर मेरा कोई अंग पकड़ लिया तो. (ये सुन कर दीदी हंसने लगी, लेकिन उनकी हंसी में अब शरारत थी ना की शर्मिंदगी.
हम दोनों ने हँसते हुए देखा माँ पिताजी वापस आ रहे है हाथ में खाने का पैकेट लिए. हमारी ट्रेन भी अब प्लेटफ़ॉर्म में आ चुकी थी. पिताजी और माँ फुर्ती से सामान लेकर चढ़ गए, मैं और दीदी पीछे रह गए. जबतक हम ट्रेन के गेट पर पहुचे काफी लोग आ चुके थे. सब अन्दर घुसने के लिए जोर लगा रहे थे. तभी दीदी ने आगे बढ़कर गेट के एक साइड वाला हैंडल पकड़ लिया और मुझे अपने पीछे रहने का इशारा किया. मैं उनके पीछे आ गया. दीदी को जैसे ही मौका मिला वो सीढ़ियों पर उठ गयी लेकिन आगे भीड़ ज्यादा होने के कारण वो वही अटक गई. सीढ़ियों पर चढ़ने के कारण वो थोड़ी ऊपर हों गई थी जिस से उनकी गांड बिलकुल मेरे चेहरे के आगे के सामने आ गई थी. पीछे से भीड़ मुझे भी ठेल रही थी तो मेरा मुह जाकर दीदी की गांड से टकरा जाता. थोड़ी और जगह बनी तो मैं भी ऊपर चढ़ा लेकिन आगे भीड़ होने के कारण वही दीदी के पीछे दीदी से सत्कार खड़ा होना पड़ा. ऐसे ही एक दूसरे से सट कर हम धीरे धीर आगे बढ़ रहे थे. अब मेरा लंड बिलकुल दीदी की गांड पर दब रहा था. दीदी की नर्म गांड का स्पर्श पाकर मेरा लंड फिर से खड़ा होने लगा था. दीदी को भी शायद ये महसूस होने लगा था. दीदी ने मुझे पीछे नज़र घुमा कर देखा और शरारत से अपनी गांड थोड़ी पीछे ठेल दी और हंसने लगी. मैंने भी सोचा दीदी को बुरा नहीं लग रहा है तो थोड़ा आगे बढ़ा जाये. मैंने अपनी दोनों बाहें दीदी के कमर पर लपेट कर उनके पेट को पकड़ लिया. दीदी अभी भी हंस रही थी तो मैंने अपने दोनों हाथो को कसना शुरू किया जिस से मेरे और दीदी के बीच गैप और कम हों गया और मेरा लंड दीदी के गांड के दोनों फांको के बीच के गहराई में सेट हों गया. दीदी ने हलके से सिसकारी ली और मेरे कानों में कहा “चुभता है गोलू”.
ये सुन कर मेरी उत्तेजना और बढ़ गई और मैंने अपनी गर्दन दीदी के कंधों से बिलकुल सटा लिया. अब मेरे और दीदी के बीच बिलकुल भी जगह नहीं थी ऊपर से नीचे तक हम एक दूसरे से चिपके हुए थे. ट्रेन की भीड़ थी की आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही थी और हम दोनों भी शायद यही चाहते थे. मैंने दीदी के कानों में धीरे से कहा “ आई लव यू, दीदी” दीदी ने अपने हाथों से मेरे सर के बालों को सहलाया और कहा “आज बड़ा प्यार आ रहा है दीदी पर, आई लव यू टू मेरे भाई” मैंने अपने हाथ से दीदी के पेट को हलके हलके सहलाना शुरू कर दिया था. दीदी भी अपने होंठों को दांतों में दबा कर हलकी हलकी सिसकारियां ले रही थी और मज़ा ले रही थी. धीरे धीरे मैंने अपनी उंगलियाँ ऊपर की ओर बढानी शुरू की. दीदी की आँखें अब हलकी हलकी बंद होने लगी थी. दीदी अब अपनी गांड को धीरे धीरे मेरे लंड पर रगड़ने लगी थी. मैं अपना हाथ ऊपर ले जाते हुए उनके चूचियों के ठीक नीचे ले आया था और सहला रहा था. टी-शर्ट के अन्दर मैं उनके ब्रा के नीचे की पट्टी को महसूस कर सकता था. थोड़ी देर तक वहां मसलने के बाद जब मैंने देखा की दीदी भी इसका मज़ा ले रही है तो मैंने थोड़ा और आगे बढ़ने की सोची और अपना दाहिना हाथ को ठीक उनकी चूचियों के ऊपर रख दिया. दीदी के आँखे जो अब तक बंद थी, खुल गई और उन्होंने मुझे मुड़कर देखा. उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे, मुझे दर लगा की कहीं दीदी बुरा तो नहीं मान गयी. फिर दीदी हलके से मुस्कुराई और अपनी पलकों को एक बार धीरे से झपकाया, शायद ये उनकी सहमति का इशारा था, उन्होंने फिर आँखें बंद कर ली थीऔर अपनी गांड हिलाना जारी रखा था. मेरी हिम्मत और बढ़ गई औ अब मैंने दोनों हथेलियों को दोनों चूचियों के ऊपर रख दिया और हलके हलके दबाने लगा. ब्रा होने के कारण चूचियों की घुन्डिया स्पष्ट मालूम नहीं चल रही थी. लेकिन हल्का उभार जरूर पता चल रहा था. मैं मस्त था चूचियां दबाने में दीदी मस्त थी गांड रगड़ने में. दोनों अपने अपने काम में मगन थे. तभी मां की आवाज कानों में पड़ी. “गोलू, ज्योति कहाँ रहा गए बच्चे तुम दोनों. दीदी ने अपनी साँसों को संयत कर मां को आवाज दी “ माँ भीड़ में मैं और गोलू फसे हुए हैं आगे बढ़ने की जगह नहीं है”. “तुमलोग वही रुको मैं आता हूँ” ये पिताजी की आवाज थी. हम दोनों ने अपने आप की संभाला. मैंने अपना हाथ चूचियों से हटाया और दीदी से थोड़ी दूरी बना ली. तभी पिताजी सामने से भीड़ को हटाते हुए आये और हम दोनों को आराम से सीट तक ले के गए.


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