पापा कमाने मे और मम्मी चुदवाने मे व्यस्त
"ऐसी ...ऐसी कोई बात नही मन्यु। तुमने उस समय पूछा नही तो मैं भी तुम्हें बता नही पाई कि तुम्हारी वजह से ही बरसों बाद मैं इतना खुलकर ...अम्म! खुलकर झड़ी थी, मुझे तो याद भी नही कि आखिरी बार मैंने कब ...कब इतना ज्यादा, इतनी देरतक पानी छोड़ा था" वैशाली हौले से बुदबुदाई, बेटे के मुख से मिले सुख का स्वयं उसी के मुख पर बखान करना उस माँ को एकाएक अत्यधिक लज्जा से भर गया था। अतिशीघ्र उसका तमतमाता सुर्ख चेहरा नीचे फर्श की दिशा मे झुक गया, स्वतः ही उसका दायां पंजा उसकी नग्न चूत को ढांकने के असफल प्रयत्न मे जुट जाता है और साथ ही बायीं हथेली उसके गोल-मटोल मम्मों को छुपाने हेतु उनतक पहुँचने का मार्ग तय करने लगी थी।


"फिर क्या बात है? हुंह!" अपने चिरपरिचित जिद्दी स्वभाव के चलते अभिमन्यु ने दोबारा प्रश्न किया। कम से कम इस बात का जानकार तो वह हो ही चुका था कि जब-जब उसकी माँ शर्मिन्दगी का एहसास करती है उसकी जुबान सिर्फ हकलाती ही नही बल्कि टंग क्लीनर से भी कहीं ज्यादा साफ हो जाती है और आगामी परिणाम से अपने बचाव का रास्ता खोजने से पूर्व वह जल्द से जल्द उस तात्कालिक परिस्थिति से ही बचने का हरसंभव उपक्रम करना आरंभ कर देती है।

"औरतों का वह हिस्सा बहुत सेन्सिटिव होता है पर मेरा तो कुछ ज्यादा ही है, मैं अब अपने वहाँ तुम्हारी ...तुम्हारी जीभ बरदाश्त नही कर पाऊँगी मन्यु। मैं लगातार दो बार झड़ चुकी हूँ अगर ...अगर और झड़ी तो फिर बिस्तर से उठ नही सकूँगी। उफ्फ्! वहाँ मुझे छिल भी गया है शायद, पहले एहसास नही हो रहा था उम्म्! हाथ ...अभी हाथ लगाने से हो रहा है" झिझकते हुए ही सही मगर आखिरकार वैशाली ने सत्यता बयान कर ही दी। अभिमन्यु अपनी माँ के बनावटी भावों की भरपूर पहचान रखता था, मुखमैथुन में उसकी अपरिपक्वता उसके सामने उजागर कर उसकी माँ ने उसपर जैसे कोई उपकार--सा कर दिया था। वह जान गया कि गलतीवश उसके दाँत या नुकीले नाखून लग जाने के कारण ही उसकी माँ की चूत छिल गई थी और अब मलहमस्वरूप पुनः उसकी चोटिल चूत को चाटने का बीड़ा उठाने के लिए वह दूने मन से तैयार हो जाता है।

"प्रॉमिस करता हूँ कि तुम्हारी मर्जी के बगैर तुम दोबारा नही झड़ोगी माँ। इसबार पहले से भी ज्यादा प्यार से तुम्हारी चूत को चाटूँगा, मेरा यकीन करो तुम्हें बहुत राहत मिलेगी, बहुत सुकून पहुँचेगा। आओ, मेरे पास आओ माँ ...अपने बेटे के पास आओ" बेहद प्रेमपूर्वक स्वर मे ऐसा कहते हुए अभिमन्यु अपना दायां हाथ उससे दो कदम दूर खड़ी अपनी नग्नता को छुपाने की निरंतर प्रयासरत अत्यंत शर्मसार अधेड़ माँ के समकक्ष ऊपर उठा देता है। उसके प्रेमपूर्ण स्वर मे महज मधुरता ही नही वरन विश्वास की प्रचूरता भी सम्मिलित थी और जिसे महसूस कर वैशाली अपना दायां हाथ अपनी चूतमुख से हटाकर तत्काल बेटे के हाथ को थाम लेती है। जाने अभिमन्यु की आँखों मे वह अपने लिए कितनी ज्यादा मोहब्बत देखती थी जो उसका हाथ थामते ही उसके पाँव खुद ब खुद आगे बढ़कर उनके बीच की दो कदमों की दूरी क्षणमात्र मे खत्म कर देते हैं।

"अब सेंको रोटी माँ, मैं तुम्हारी छिली चूत की सिकाई करता हूँ और हमारी बातें भी होती रहेंगी" मुस्कुराकर अपने पिछले कथन मे जोड़ अभिमन्यु बिना कोई पल गंवाए फौरन अपने खुश्क होंठ अपनी माँ की कामरस उगलती चूत के चिपके चीरे से चिपका देता है।

"उफ्फ्फ्ऽऽ मन्यु! अपनी टाँगें ...टाँगे चौड़ाऊँ?" तवा गैस पर रखती वैशाली लंबी सीत्कार भरते हुए पूछती है, इतने अल्प समय मे उसके जवान बेटे का सुंदर मुँह दोबारा उसकी खौलती चूत से खेलेगा सोचनेमात्र से ही उस अधेड़ माँ की गांड का छेद अजीब सी संसानाहत से भर उठा था।

"हाँ माँ चौड़ाओ इन्हें, अरे तभी तो तुम्हारे बेटे की जीभ तुम्हारी चूत को गहराई तक चाट पाएगी। अब इतनी मेहनत करूँगा तो कम से कम ग्लास भर तो तुम्हारी स्वादिष्ट रज पियूँगा ही और तभी आज की आड़ी-टेढ़ी, मोटी-पतली, जली-कच्ची रोटियां मुझसे पच पाएंगी" अभिमन्यु ने जवाब मे जोरों से हँसते हुए कहा तो अपनी टाँगें चौड़ाते हुए वैशाली भी हँसना शुरू कर देती है।

"देखना कहीं ऐसी रोटियां पचाने के चक्कर मे तुम्हें दस्त ना लग जाएं। मेरी अभी आगे से बह रही है, बाद मे तुम्हारी पीछे से बहने लगे" रोटी बेलना आरंभ करते हुए वैशाली ने कहा। हरबार ऐसा होता था कि जब-जब वह मायूस होती थी, रुआंसी होती थी, उसका बेटा कैसे भी कर उसे हँसाकर ही मानता था।

अपनी माँ की टाँगें विपरीत दिशा मे खुली पाकर अभिमन्यु ने उसके गर्वीले यौवनस्थल का भरपूर चक्षुचोदन किया, जो वह पहले जल्दबाजी मे नही कर पाया था। उसकी बड़ी-बड़ी झांटों के चहुँओर थूकना शुरू कर चुका वह बारम्बार अपने थूक को अपनी लपलपाती जिह्वा से उसके संपूर्ण यौवनांग पर लपेटने लगता, मलने लगता तात्पश्चयात उसके होंठों ने अपनी कमान संभाली और हौले-हौले उसकी झांटों को चूसने के अपने पसंदीदा कार्य को गति प्रदान कर दी। तितर-बितर झाँटें कब लंबे-लंबे गुच्छों के आकार मे ढल गईं, उन्हें निरंतर चूसता वह स्वयं नही जान पाया। जब-तब उसके मुलायम होंठ उसकी माँ की चूत की फूली दोनों फांखों को भी संतुष्टिपूर्वक सुड़कते हुए चूसना आरंभ कर देते और जिसके मनभावन फलस्वरूप कामुक आहें भरती वैशाली अपनी मदमस्त मांसल गांड को थिरकाते हुए अपनी रस उगलती चूत स्वेच्छा से अपने बेटे के मुख पर रगड़ने को लालायित हो जाती, मनमर्जी से उसका मुँह चोदने को विवश हो जाती।

"आईईऽऽ बेटा!" वैशाली का नग्न बदन तब गनगना उठा जब अभिमन्यु की खुरदुरी जीभ ने उसकी चूत की फांखों के भीतरी संकीर्ण मार्ग मे प्रवेश किया और उसकी अंदरूनी नाजुक परतों को बेहद धीमी गति से चाटने लगा। गैस पर फूलती रोटी जलते-जलते बची थी और बेटे की इस मंत्रमुग्ध कर देने वाली क्रिया से बेहाल वैशाली की बायीं उंगलियां स्वतः ही उसकी गांड के पटों के अंदर विचरने लगी थी।

"उन्घ्! रोटी ...रोटी गंदी उफ्फ्ऽऽ!" अपनी गांड के कुलबुलाते छेड़ को खुजलाने की इच्छुक वह माँ तब टूट कर बिखर जाती है, जब उसकी गांड की दरार के भीतर घूमी उसकी गंदी उंगलियां दोबारा आटे का स्पर्श करती हैं। इसके उपरान्त तो जैसे वैशाली को कोई सुधबुध नही रहती, बिना अंतराल लगातार वह अपनी गांड के अतिसंवेदनशील छेद को खुजाती है और फिर अपनी उन्हीं उंगलियों से रोटी बेलने, उन्हें सेंकने का क्रम पूरा करने मे जुट जाती है। उसकी हाहाकारी सोच मे उसके द्वारा की जा रही निम्नस्तर की यह अत्यधिक घृणित हरकत पूर्णरूप से घुल चुकी थी, जिसके नतीजन उसका रोम-रोम सिहरता जाने लगा था।

"बस माँ, अब तुम्हारी चूत बहुत गीली हो चुकी इसलिए अब मैं तुम्हारे दाने को चूसना चाहता हूँ। अगर तुम झड़ना चाहो तो बेझिझक झड़ सकती हो, एकबार फिर मुझे तुम्हारी गाढ़ी रज पीने का मन है" अपनी गीली जिह्वा अपनी माँ की अत्यंत गीली चूत के बाहर निकालते हुए अभिमन्यु ने कहा और बिना उसकी स्वीकृति लिए पटापट उसके मोटे फड़फड़ाते भांगुर को चूमने भिड़ जाता है।

"मऽन्युऽऽ मेरी ...गांड मे वहाँ, अजीब ...उफ्फ्! अजीब बेटा" चीखकर ऐसा कहते हुए अकस्मात् वैशाली की टाँगें कांपने लगीं, जिन्हें स्थिर बनाए रखने हेतु अभिमन्यु तत्काल उसकी गांड के दोनों गुदाज पट बलपूर्वक अपनी हथेलियों से थाम लेता है।

"जानता हूँ माँ कि तुम्हारी गांड के छेद मे इस वक्त करंट ही करंट दौड़ रहा होगा, अपने निप्पलों पर ध्यान दोगी तो वह भी तुम्हें पत्थर जैसे कड़क महसूस होंगे ...अरे इसी को तो झड़ने से पहले की सुखद स्थिति कहा जाता है। तुम इतनी एक्सपीरिएंस्ड हो मगर जानकार दुख भी हुआ कि पापा की इग्नोरेंस ने तुम्हारा इतना बुरा हाल कर दिया है। मैं उन जैसा नही माँ, तुम्हारा हर सुख-दुख अब मेरा सुख-दुख बन गया है और मैं हमेशा तुम्हारा ऐसे ही साथ निभाता रहूंगा। आई प्रॉमिस, आई स्वेर मम्मी" अपनी माँ का ढाढ़स बढ़ाते हुए अभिमन्यु ने मुस्कुराकर कहा और अपना सारा ध्यान सिर्फ उसके भग्नासे पर केंद्रित कर देता है। अपने भग्नासे की प्राणघातक चुसाई से कामान्ध वैशाली ना चाहते हुए भी पलों मे पुनः स्खलित होने लगती है, उसकी भावविह्वल आँखों की किनोरें भी अपने आप बहाव पा जाती है और जोरों से चीखती दोबारा अपने जवान बेटे के मुँह के भीतर अपनी सुगन्धित कामरज की अनिश्चित लंबी फुहारें छोड़ती उसकी अत्यंत छरहरी वह नंगी अधेड़ माँ गैस पर तेजी से जल रही रोटी को देखते हुए ही बेटे के सिर को अपनी दोनों बाहों में जकड़कर अनियंत्रित ढंग से स्खलित होने लगती है।

"मन्युऽऽ चूस जाओ अपनी ...अपनी माँ को, उफ्फ्! मैं पा ...पागल ना ... आईईईईऽऽ! अरे चूस पापी, तू ही मेरा असली ...असली मर्द है। मेरा अपना उफ्फ्! अपना जवान बेटा ही उन्घ्! मेरा असली मर्द.... आहऽऽऽ!" अभिमन्यु को अपने अंक मे भरे वैशाली तबतक चीखती रही, चिल्लाती रही, रोती रही जबतक उसकी चूत से होते अतिआनंदित रजउत्सर्जन का पूर्णरूप से अंत उसके बेटे के मुँह के भीतर नही हो गया। वहीं अभिमन्यु भी अपनी माँ की चूत की बारम्बार खुलती बंद होती फूली फांखों के बीचों-बीच अपने मुलायम होंठ बलपूर्वक घुसाए उसकी स्वादिष्ठ गाढ़ी रज को तीव्रता से चूसकर उसे अपने गले से नीचे उतारकर जाने कबतक तृप्त होता रहा था।

"हम्फ्! हम्फ्! स ...सॉरी मन्यु हम्फ्!" बरसों बाद प्राप्त किए स्खलन के सर्वोच्च चरमोत्कर्ष मे वैशाली भूल बैठी कि उसने अपने बेटे का सिर अपने दोनों हाथों के घेरे से कसकर अपनी टांगों की खुली जड़ पर दबाया हुआ था और जब सहसा वह वास्तविकता मे वापस लौटी, झटके से अभिमन्यु के सिर को मुक्तकर हंपाईओं के साथ वह उससे तत्काल माफी मांगने लगती है। आश्चर्यस्वरूप वह बेटे से दो कदम पीछे हटकर अपनी गाढ़ी रज से भीगे उसके सुर्ख लाल चेहरे को घूरने लगती है, उसके प्रति उसके बेटे के समर्पणभावों ने फौरन उस माँ का कलेजा चीरकर रख दिया था कि यदि उसकी बेवकूफी की वजह से उसके बेटे की सांस रुक जाती तो वह भी अत्यंत तुरंत अपने प्राण त्याग देती।

"बता हम्फ्! बता नही सकते थे, बेवकूफ कहीं के ...हम्फ्!" वैशाली ने क्रोधित स्वर मे कहा और एकाएक अपनी जांघों पर अपनी दोनों हथेलियां रख वह अपनी चढ़ी साँसों को काबू मे करने का प्रयास करने लगती है। अपनी माँ को लड़खड़ाया जान अभिमन्यु विद्युतगति से स्टूल छोड़कर खड़ा हो गया मगर उसकी माँ उससे भी तेज दो कदम और पीछे खिसक गई थी।

"तुम खाना टेबल तक पहुँचाओ, मैं बेडरूम से होकर आती हूँ" नीचे झुकी वैशाली भी सीधी खड़े होते हुए बोली।

"मैं छोड़ आऊं? अकेली जा सकोगी?" अपनी माँ के आढ़े-टेढ़े चलायमान कदमों को देख अभिमन्यु ने मदद के उद्देश्य से पूछा, वैशाली बिना पीछे मुड़े अपने दाएं हाथ को हिलाकर उसे इनकार का इशारा करते हुए किचन के खुले दरवाजे की ओर बढ़ती रही परंतु वह ज्यादा आगे नही जा पाती क्योंकि अचानक से पूरा फ्लैट उसके बेटे द्वारा बजाई गई शर्मनाक सीटी से गूँज उठा था।

"उफ्फ्ऽऽ माँ! कितनी कातिल गांड है तुम्हारी, इसपर बेटे की एक प्यारी सी पप्पी तो लेती जाओ" ना चाहकर भी ज्यों ही वैशाली अपना चेहरा पीछे मोड़ती है, ठीक उसी वक्त अभिमन्यु अपना दाहिना हाथ अपनी छाती में मार जोरदार आहें भरते हुए कहता है।

"धत्!" अपने बेटे की इस बेशर्म हरकत से लजाकर वैशाली लगभग दौड़ती हुई सी किचन के बाहर निकलने लगती है, वहीं अभिमन्यु अपनी दौड़ती माँ की थिरकती मांसल गांड की थिरकन मे मानो खो सा जाता है।

अभिमन्यु डाइनिंग टेबल पर खाना लगा चुका था, बहुत सोच-विचारकर आज पहली बार उसने दो की जगह सिर्फ एक ही प्लेट लगाई थी। कुछ पाँच मिनट बीते होंगे कि तभी उसकी माँ अपने बेडरूम से निकलकर बाहर हॉल मे चली आती है, विश्वास से परे कि जिस अवस्था मे वह बेडरूम के भीतर गई थी, अपनी उसी पूर्ण नंगी अवस्था मे वापस भी लौट आई थी।


"तो शुरू करें" अपनी दोनो हथेलियां आपस मे मलती वैशाली बेटे की हैरान आँखों मे झांकते हुए बोली और बिना किसी अतिरिक्त झिझक के वह सीधे उसकी गोद मे आ कर बैठ गई।

"आज तो मैं तुम्हारे हाथों से ही खाऊँगी" अपनी नग्न पीठ का सारा भार अभिमन्यु की बलिष्ठ छाती पर डालते हुए उसने पिछले कथन मे जोड़ा और साथ ही अपनी टाँगों की जड़ को बेशर्मीपूर्वक चौड़ाकर वह अपनी मांसल चिकनी जांघें बेटे की जाँघों के पार निकाल उन्हें नीचे फर्श पर लटका लेती है।

"तुम्हारी दाद देनी पड़ेगी माँ, अगर आखिरी रोटी को हटा दो तो बाकी सभी रोटियां परफैक्ट बनी हैं" अभिमन्यु चपाती हॉटकेस खोलते हुए बोला और अगले ही क्षण अपनी दाईं सभी उंगलियां अपनी माँ की टाँगों की खुली जड़ के बीचों-बीच फेरने लगा। वह अपनी उंगलियों को उसकी चूत की फांखों, उनके मध्य के अत्यंत चिपचिपे चीरे पर भी रगड़ता है और जब उसकी उंगलियां अच्छी तरह से उसकी माँ के कामरस से तर-बतर हो चुकती हैं, अपनी उन्हीं रस भीगी उंगलियों से वह रोटी का पहला निवाला बनाकर आश्चर्य से अपना मुंह फाड़े बैठी अपनी माँ के खुले होंठों के भीतर पहुँचा देता है।

"जल्दी चबाओ मम्मी, मेरी उंगलियां भी तो चाटकर साफ करना है तुम्हें वर्ना दोबारा इन्हें तुम्हारी चूत के अंदर कैसे घुसेडूंगा ...फिर कहोगी कि जलन मच रही है" अभिमन्यु तब अपने पिछले कथन मे जोड़ता जब उसकी माँ निवाले को चबाने मे अपनी असमर्थता जताती है, हालांकि निवाले भरे मुँह से वह कुछ बोल तो नही सकती थी मगर उसके चेहरे के घृणित भावों से बिन बोले ही वह सबकुछ समझ गया था।

"मेरे हाथ के बने खाने को, मेरी ही चूत के पानी से गंदा कर खुद मुझे ही खिला रहे हो ...छि: मन्यु! बहुत गंदे हो तुम" जैसे-तैसे निवाले को अपने गले से नीचे उतार सकी वैशाली बेटे की सनी उंगलियों को घूरते हुए बोली।

"चलो कोई ना, मैं ही इन्हें चाटकर साफ कर देता हूँ। तुम चखो या ना चखो पर मुझे तो अब तुम्हारी स्वादिष्ट रज की जैसे अफीम लग चुकी है ...मेरा मतलब है कि मैं तुम्हारी रज का अब आदी हो गया हूँ माँ" मुस्कुराकर ऐसा कहते हुए ज्यों ही अभिमन्यु ने अपनी उंगलियों का अपने मुँह के नजदीक लाना चाहा, जाने क्या सोचकर तत्काल उसकी माँ उसकी कलाई को मजबूती से पकड़ते हुए उसकी पूरी हथेली ही चाटना शुरू कर देती है।

"अरे! अरे! अरे! चूसने मे तुम माहिर हो माँ, मैं जानता हूँ मगर अचानक यह बिल्ली की आत्मा तुम्हारे अंदर कैसे घुस गई?" अभिमन्यु जोरों से हँसते हुए पूछता है। कुछ उसके बेतुके प्रश्न का असर और कुछ अपनी ही शर्मनाक हरकत के सम्मिश्रण से सहसा वैशाली की खिलखिलाहट भी ऊँची हो गई, अपनी खिलखिलाहट की असल वजह तो वह खिलखिलाते हुए भी नही जान पाई थी मगर जो कुछ भी उस तात्कालिक परिस्थति के तहत वह महसूस कर रही थी, वह उस माँ की अबतक की सभी कल्पनाओं से अधिक सुखकर था।

ऐसे ही हँसते-हँसाते दोनों का खाना होता रहा। सब्जी और दाल में पड़े मसालों के प्रभाव से वैशाली की चूत मे जब-जब जलन होने लगती, अभिमन्यु अपनी गतिविधि पर फौरन रोक लगा लेता मगर जल्द ही उसकी शैतानी पुनः गतिशील हो जाती। उनके बीच का वार्तालाभ काफी हदतक इसी तरह आजादी, खुलेपन के इर्द-गिर्द सिमटा रहा था और जिसे दोनों माँ-बेटे बखूबी महसूस भी कर रहे थे। उनके रिश्ते की पवित्रता से जैसे उन्हें कोई सरोकार नही था, बल्कि उनकी आपसी निकटता अब पूर्व से कहीं ज्यादा प्रगाढ़ होती जा रही थी।

अपने जवान बेटे के समक्ष जो माँ कभी अपना पल्लू भी अपनी छाती से नीचे नही सरकने देती थी, आज उसी की गोद में पूरी तरह से नंगी होकर बैठी ठहाके लगाए हँसे जा रही थी मानो अपने उसी जवान बेटे के समकक्ष कपड़ो के बंधन से मुक्त होकर आज वह माँ ज्यादा खुश थी, अत्यधिक संतुष्ट थी। वहीं अभिमन्यु भी कम आंनदित नही था, अपनी माँ को इतना चहकता देख उसके दिल का सुकून अपने चरम पर पहुँच गया था जैसे उसकी जन्म-जन्मांतर की एकमात्र यही चाह आज वास्तविकता मे पूरी हो गई थी।

खाना खा चुकने के उपरान्त दोनों ने मिलकर डाइनिंग टेबल और किचन की सफाई की, वैशाली तो बर्तन भी मांजना शुरू कर देने वाली थी मगर अभिमन्यु के टोक देने पर दोनों वापस हॉल में लौट आते हैं।

"जाओ माँ अब कपड़े पहन लो, पापा आते ही होंगे" हॉल के सोफे पर अपने साथ अपनी माँ को भी बैठते देख अभिमन्यु ने कहा, पौने छः हो चुके थे और वह अभी भी बेखौफ घर के भीतर नंगी घूम रही थी।

"नही नही, मुझे नंगी ही रहना है ...मैं कपड़े नही पहनूँगी" बचपन मे अक्सर बड़ों के सामने जिस तरह छोटे बच्चे कपड़े ना पहनने की जिद मे अपने हाथ-पैर उछालते हुए आना-कानी करते है, बिलकुल उसी संजीदे अंदाज मे वैशाली भी उछल-कूद करते हुए बोली।

"माँ मजाक नही, पापा के लौटने का वक्त हो गया है" अभिमन्यु ने बेहद गंभीरतापूर्वक कहा, जिसके जवाब मे वैशाली अपनी गांड मटकाते हुए पुनः किचन की दिशा मे आगे बढ़ जाती है।

"बर्तन बाद मे धुल जाएंगे माँ, जाकर कपड़े पहन लो" अभिमन्यु का अगला कथन पूरा हुआ, तत्काल वैशाली अपनी जीभ निकालकर उसे चिढ़ाने लगी और ठीक उसी समय घर के मुख्य द्वार पर अकस्मात् हुई दस्तक से एकसाथ दोनों माँ-बेटे के पसीने छूट जाते हैं।

जाने क्या सोचकर वैशाली सहसा घर के मुख द्वार की ओर चलायमान हो गयी थी, जिसे देख अभिमन्यु बिजली की गति से दौड़ा और अपनी माँ के दरवाजे की कुण्डी की और बढ़े हाथ को कसकर थाम लेता है। उसने उसे बलपूर्वक पीछे खींचा, एतियातन उसके मुँह को दबाया मगर जैसे वैशाली अपना आपा खो चुकी थी। ज्यों-ज्यों अभिमन्यु उसे पीछे धकेलने का प्रयास करता, वह दूनी तेजी से पुनः आगे बढ़ने लगती और इसके साथ ही दरवाजे की दस्तक मे वृद्धि हो गई।

भय से कांप रहे अभिमन्यु को जब कुछ और नही सूझ पाता तो वह वैशाली को अपने साथ खींचता हुआ उसे डाइनिंग टेबल तक ले आया। टेबल पर रखे एक बड़े से चाकू को उठाकर उसने अपनी माँ के चेहरे को घूरा, जो उसे ऐसे बुरे हालात मे भी मुस्कुराता हुआ नजर आता है। वैशाली अपने हाथों से सहर्ष उसे दरवाजा खोलने का इशारा करती है और जिसे देख अभिमन्यु चाकू को अपनी मुट्ठी मे कसते हुए घर के मुख्य द्वार की ओर बढ़ जाता है। दोबारा उसने पीछे पलटकर नही देखा और दरवाजे पर हुई तीसरी दस्तक के उपरान्त दो-चार लंबी साँसें खींच वह दरवाजे को खोल देता है।

"ठक्क्क्!" दो विभिन्न ध्वनियाँ एकसाथ उसके कानों मे गूँजी तो लगा जैसे उसका सारा बोझ एकाएक हल्का हो गया हो, उसके अनुमानस्वरूप मुख द्वार को खोलने के साथ ही उसकी माँ ने अपने बेडरूम का दरवाजा बंद कर लिया था। उसके पिता को कोई शक ना हो इसलिए ना ही उसने अपने पिता के चेहरे को देखा और ना ही अपनी माँ के क्षणिक पहले बंद हुए बेडरूम के बंद दरवाजे पर अपनी नजर डाली, हॉल खाली पड़ा देख वह अनमनी प्रसन्नता से डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ जाता है।

"तैयार हो जाओ अभिमन्यु, हमसब मूवी देखने जा रहे हैं, डिनर भी बाहर ही करेंगे" अपने बेटे को डाइनिंग टेबल पर रखे फलों के ढ़ेर मे से सेब उठाते देख मणिक उसे बताता है।

"पापा कल मेरा एप्लाइड इंटरनल है, उन्होंने आज ही डिक्लेअर किया" अभिमन्यु हाथ मे पकड़े चाकू से सेब के टुकड़े काटते हुए बोला, अखंड घबराहट से वह खुद भी सेब की ही तरह लाल हो गया था।

"आप लोग जाओ, मुझे प्रेपरेशन करना है। एक्चुअली इंटरनल के मार्क्स कैरी होने हैं सो चांस नही लूँगा" उसने पिछले झूठे कथन मे जोड़ा, अपने पिता से बात करते वक्त अपने आप उसकी भाषा मे सुधार आ गया था मगर असल कारण तो कुछ और ही था और वह था अपराध बोध, अपने पिता के साथ जाने-अनजाने किया गया विश्वासघात। उसकी गैर मौजूदगी मे उसकी स्त्री के साथ किए पाप के स्मरणमात्र से अकस्मात् अभिमन्यु कुंठा से भर गया था और यकीनन तभी वह मणिक से अबतक अपनी आँखें मिला नही पाया था।

"ओह आप आ गए, मैं चाय बनाती हूँ" इसी बीच वैशाली भी अपने बेडरूम से बाहर निकल आती है, वह फौरन किचन की दिशा मे बढ़ते हुए बोली। रोटियां सेंकने के उपरान्त उसका अपने बेडरूम के भीतर जाने का शायद यही मकसद था कि वह मिनटों में कपड़े पहनकर पुनः बेडरूम से बाहर आ सकती थी।

"माँ को ले जाइए पापा, वैसे भी इन्होंने कई दिनों से थिएटर मे मूवी नही देखी और हाँ! मैं पिज्जा आर्डर कर लूँगा, आप लोग बाहर खा लीजियेगा" कहकर अभिमन्यु अपने कमरे की ओर रुख करने लगा।

"कहाँ मूवी-वूवी लेकर बैठ गए आप भी ..." किचन मे जाते-जाते अचानक रुक गई वैशाली ने ज्यों ही अपना मुँह खोला, अभिमन्यु बीच मे ही उसकी बात को काट देता है।

"अच्छा! पापा कई दिनों से माँ कह रही थीं कि आपके टूर से लौटने के बाद उन्हें मूवी देखने जाना है, आप ले जाओ माँ को मैं एडजस्ट कर लूँगा" अभिमन्यु भी अपने कमरे मे जाने के बजाए वहीं रुकते हुए बोला।

"खैर अब से मैं कभी टूर पर नही जाऊँगा, आज मैंने हेड डिपार्टमेंट को लैटर भी भेज दिया है" मणिक ऐलान करता है। उसके इस विस्फोटक फैसले से उसकी पत्नी और एकलौते बेटे पर क्या कुछ नही बीत सकती थी, वह कैसे जाना पाता क्योंकि उन दोनों के चेहरों पर ही वह घर का मुखिया सहसा बेहद मधुर मुस्कान छाती देख रहा था।

"तुम तैयार हो जाओ, अभिमन्यु के साथ मेरा नेक्स्ट वीकेंड का प्रॉमिस रहा" उसने दोबारा ऐलान किया। वैशाली अब पूरी तरह निरुत्तर थी, अपने पति के साथ तर्क-वितर्क वह पहले भी कहाँ कर पाती थी।

अपने माता-पिता के घर से बाहर निकलते ही अभिमन्यु की जो रुलाई फूटी, वह अगले आधे घंटे तक चलती रही। वह इस बात से दुखी था कि उसने अपनी माँ के साथ उनके पवित्र रिश्ते को दागदार किया था या इस बात से कि अब से वह अपनी माँ के साथ पाप करना जारी नही रख पाएगा क्योंकि उसका पिता हमेशा-हमेशा के लिए घर वापस लौट आया था, वह खुद नही जान पाता बस सोफे पर लेटा काफी देरतक सिसकता रहता है। कुछ सोचकर उसने खुद के लिए पिज्जा आर्डर किया तो जरूर मगर उसे खाने की उसकी इच्छा बिलकुल मर चुकी थी, पिज्जा वह ज्यों का त्यों डस्टबिन मे डाल देता है और डिब्बे को डाइनिंग टेबल पर छोड़ अंततः अपने कमरे के भीतर चला जाता है।

वहीं वैशाली की हालत भी कुछ कम खराब नही थी क्योंकि आज वह अपने पति के एक नए अवतार का एहसास कर रही थी। उसके जिस पति को अनुशाशन मे जीना ताउम्र पसंद आया था, थिएटर में उसके बगल मे बैठा उसका वही अनुशाशनप्रिय पति बेशर्मों की भांति उसे घड़ी-घड़ी चूमे जा रहा था। डिनर के वक्त भी कभी वह उसका हाथ पकड़ लेता तो कभी उसकी सुंदरता पर कविताएं सुनाने लगता। मणिक के भीतर आए इस बदलाव से वैशाली खुश तो थी मगर रह-रहकर उसका ध्यान उसके पति से हटकर उसके बेटे पर केंद्रित होता जा रहा था, वह चाहकर भी अभिमन्यु के विषय मे सोचना बंद नही कर पा रही थी।

घर लौटने के बाद मणिक हॉल के सोफे पर बैठ अपने जूते उतारने लगा, वैशाली अपने बेटे के बेडरूम मे झांकती है तो उसे गहरी नींद मे सोता पाती है। पति के सोफे से उठते ही उसे भी बेमन से उसके साथ उनके बेडरूम के भीतर जाना पड़ा, जिसके अंदर पहुँचते ही मणिक तत्काल उसे चूमने लगता है।

उस रात वैशाली जमकर चुदी। दिन मे तीन बार वह अपने बेटे के हाथों झड़ी थी, बाकी रही-सही कसर अब उसका पति पूरी कर रहा था। चुदते-चुदते वह पस्त हो चली थी, उसका अंग-अंग टूट चुका था, सुहागरात के बाद आज दूसरी बार उसकी चूत एकदम सुन्न पड़ गई मगर फिर भी वह तबतक चुदती रही जबतक मणिक ने उसे सचमुच संतुष्ट नही मान लिया और अंततः नग्न एक-दूसरे से चिपककर दोनों पति-पत्नी नींद के आगोश खो जाते हैं।
नयी सुबह की पहली किरण के साथ वैशाली की दैनिक गृहस्त दिनचर्या आरंभ हुई। नींद खुलने के पश्चयात तत्काल उसने मणिक की नग्न बाहों से मुक्त होना चाहा मगर एक लंबे अंतराल के उपरान्त मिले पति के शारीरिक सुख से आनंदित वह चाहकर भी उसके अंक से खुद को मुक्त नही कर पाती, बल्कि बरसों बाद पति संग बिस्तर पर पूर्ण नग्न होकर सोने के विचार ने उस अधेड़ नारी को अद्भुत रोमांच से भर दिया था।


बीती रात हुई घमासान चुदाई से जर्जर अपने बदन की कष्टप्रद पीड़ा को भुलाकर अपने पति की बलिष्ठ नग्न छाती को चूमती वैशाली कब उसके थुलथुले पेट, तात्पश्चयात उसके सुशुप्त लंड को चूमना शुरू कर चुकी थी उसे स्वयं होश ना था। बस एक चाह कि उसके पति को इस नयी-नवेली सुबह के आगमन पर नींद से जगाने का इससे उत्तम विकल्प और क्या हो सकता है, वह अपने परिपक्व होंठों से उसके मुरझाए लंड को बड़े ही प्रेमपूर्वक ढंग से चूसना आरंभ कर देती है।

अपने लंड मे भरती अकस्मात् चेतना के परिणामस्वरूप मणिक भी जल्द ही नींद की खुमारी से बाहर निकल आया और वैशाली के कंधों को थाम उसे फौरन अपनी नग्न छाती से चिपकाकर वह उसके कोमल होंठों को चूमने, उन्हें कठोरतापूर्वक चूसने लगता है। एक बार फिर पति-पत्नी सहवास के अतुलनीय आनंद में खो गए थे, कभी मणिक ऊपर तो कभी वैशाली, उनकी गुत्थम-गुत्थी से रात्रिपश्चयात दोबारा उनका बिस्तर चरमराने लगा था, उनकी उत्तेजक कराहों से पुनः उनका शयनकक्ष गूंजने लगा था।

बाथरूम मे नहाती वैशाली उस वक्त चौंक--सी गई थी जब उसके आधे-अधूरे स्नान के बीच ही मणिक ने उसे पीछे से दबोच लिया था, हमेशा एकांत मे नहाने वाली उस अधेड़ पत्नी की शर्म दूनी होते देर नही लगती क्योंकि बीते जीवन मे पहली बार उसे उसके स्नान के मध्य चोदा जाने लगा था। अतिशीघ्र पति-पत्नी के गीले बदन से भाष्प पैदा होने लगी थी, उनकी शारीरिक तपन ने एकाएक बाथरूम को मानो घने कोहरे से भर दिया था।

साथ स्नान करने के पश्चयात आज बरसों बाद जहाँ मणिक अपने पसंदीदा कुर्ते-पाजामे को पहन लेता है वहीं उसके जोर देने पर वैशाली पूरे श्रृंगार के साथ एक लाल साड़ी का जोड़ा पहन लेती है। उत्साहित दंपति अपने बेडरूम से बाहर आए तो पाया उनका बेटा हॉल के सोफे पर पूर्व से तैयार होकर बैठा था, यकीनन इस इंतजार मे कि कब उनके घर नाश्ता बने और जिसे खाकर वह जल्द से जल्द अपने कॉलेज को रवाना हो जाए।

बीती रात मनभरकर सोने की वजह से अभिमन्यु का चेहरा भी अपने माता-पिता के चेहरे की भांति खुशमय, बेहद चहका हुआ था और जिसे कुछ पल विस्मय से देख वैशाली फौरन किचन के भीतर प्रवेश कर जाती है। हॉल मे होते पिता-पुत्र के सामान्य से वार्तालाभ ने उस अधेड़ पत्नी व माँ को आश्चर्यचकित ही नही किया था, बल्कि वह इस विषय पर वह ज्यादा हैरान थी कि बीती रात और सुबह अपने पति संग बिताए अंतरंग क्षणों मे क्षणमात्र को भी उसका ध्यान अपने बेटे की ओर नही भटक पाया था। शायद उस माँ की शारीरिक व मानसिक अतृप्तता की हरसंभव पूर्ती होना शुरू होते ही उसकी संस्कारी मर्यादित छव भी स्वतः ही पुनः लौट आई थी।

आज नाश्ते मे अभिमन्यु के पसंदीदा इंदौरी पोहे बने थे और जिन पर वह किसी राक्षस सा टूट पड़ा था, खैर बीती रात का भूखा वह जवान मर्द आखिर कब तक अपनी मुख्य शारीरिक भूख को उपेक्षित कर सकता था। एक अन्य विशेष कारण था नींद से जागने के उपरान्त उसका मनन, उसका धैर्यपूर्ण चिंतन और जिसमे उसने अपनी माँ को मानसिक कष्ट ना पहुंचाने का खुद से भीष्म प्रण किया था। वह अच्छे से जानता था कि यदि वह अपनी माँ के समक्ष उदास बना रहेगा या खाने-पीने मे लैतलाली बरतेगा तो उसकी माँ यह कदापि सह नही पाएगी, लंबे अंतराल के बाद उसे मिला उसके पति का साथ भी खुद ब खुद चिंता, कष्ट व नीरसता से भरा रह जाएगा। पूरे नाश्ते के दौरान ही वह हँसता रहा था, मुस्कुराता रहा था और पिता के साथ उसने अपनी माँ को भी अपने हास्यपूर्ण वार्तालाभ मे शामिल कर लिया था।

"लेट आऊंगा माँ और लंच कैंटीन मे ही कर लूँगा" प्रसन्नता भरे स्वर मे अपनी माँ को संबोधित कर आखिरकार वह घर के मुख्य द्वार से बाहर निकल जाता है।

बेटे के विदा लेते ही मणिक एकबार फिर वैशाली पर टूट पड़ता है, यह जानते हुए भी कि अभी उनके फ्लैट का मुख्य द्वार ज्यों का त्यों खुला हुआ है जैसे उसे कोई खासा फर्क नही पड़ा था। जैसे तैसे वैशाली दरवाजे को बंद कर पाती है और पीछे पलटते ही अपने पति को उसके पाजामे के बंद नाड़े से उलझता पाती है।

"ब ...बस अब और ...और नही जी" वह आशंकित स्वर मे हकलाते हुए बोली, निकट भविष्य की सोच ने उसका चेहरा घबराहट से नीचे फर्श की ओर झुका दिया था, उसके पैर जहाँ वह खड़ी थी वहीं जमे रह गए थे।

"अरे आओ ना जान, एक-आध राउंड और हो जाए" पाजामे को उतार चुका मणिक उसे खुद से दूर उछालते हुए बोला, उसके स्वर उत्तेजना से कहीं अधिक शरारत से भरपूर थे।

"आप ...आपको देरी हो जायेगी, लौटकर कर ...." अत्यंत शर्मसार वैशाली अपना कथन तक पूरा नही कर पाती, इसकी एकमात्र वजह थी उसके ताउम्र अनुशासित रहे पति का अविश्वसनीय व्यक्तिव बदलाव। अकस्मात् उसके मन-मस्तिष्क मे अपने जवान बेटे संग पूर्व मे बिताए अमर्यादित पलों का कतरा-कतरा उमड़ पड़ा था, वह स्वयं हैरान थी कि बीती दोपहरी कैसे वह अपनी पूर्ण नंगी अवस्था मे अभिमन्यु की गोद मे बैठकर इसी हॉल मे बेशर्मों की भांति खिलखिलाते हुए खुद उसीके हाथों से दिन का खाना खा रही थी और अभी इस तात्कालिक समय मे अपने पति के सम्मुख उसकी लज्जा का कोई पारावार शेष ना था।

"अच्छा-अच्छा ठीक है डार्लिंग, पर कम से कम इसे चूसकर तो शांत कर दो वर्ना दिनभर दफ़्तर मे बेवजह तड़पता रहूँगा" कहकर निचले धड़ से नंगा हो चुका मणिक आनन-फानन मे उनके बेडरूम के भीतर प्रवेश कर जाता है, एकाएक वैशाली के मन मे टीस उठी कि क्यों ना वह उससे यहीं इसी हॉल मे अपने लंड को चुसवाने का कार्य पूरा करवाता। शायद इसी बहाने वह अपने बेटे संग बिताए रोमांचक पलों से, अपने पति संग बीतने वाले पलों का अंतर स्पष्ट कर पाती और जो यकीनन उसे भविष्य की राह चुनने का अवसर प्रदान मे सहायक सिद्ध होता।

एक नही बल्कि दो बार लगातार अपने लंड को अपनी पत्नी के परिपक्व सुन्दर मुँह से चाटने-चुसवाने के बाद मणिक भी खुशी-खुशी अपने दफ़्तर निकल गया, पीछे रह गई अपने मुँह मे पति के ताजे वीर्य को सहेजी वैशाली। प्रथम वीर्यउत्सर्जन के पश्चयात वह बाथरूम के सिंक मे उसके वीर्य को थूंक चुकी थी मगर दूसरी बार का साक्ष्य अब भी उसके मुँह के भीतर ज्यों का त्यों भरा हुआ था। बरसों बाद उसे अपने पति की बरकरार मर्दानगी का पुनः एहसास होता है और जिससे आनंदित वह पहली बार उसके वीर्य को चखने पर विचारमग्न होने लगती है मगर जल्द ही उसकी तन्द्रा टूटी और और दोबारा उसके कदम बाथरूम की ओर बढ़ जाते हैं, उसके विचारों को भंग करता अभिमन्यु का विशाल लंड व उसके जवान गाढ़े वीर्य से लबालब भरे उसके अत्यधिक प्रभावशाली टट्टे सहसा उसकी अधेड़ माँ की बंद आँखों मे विचरण कर गए थे।

"तुम जिद्दी हो मन्यु तो तुम्हारी माँ तुमसे भी ज्यादा जिद्दी है। जब तुम मेरी खुशी के लिए खुद खुश बने रहने का नाटक कर सकते हो तो मैं भी खुद से किये अपने वादे को जरूर निभाऊंगी, मर्दाने वीर्य का स्वाद कैसा होता है? यह मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे वीर्य को चखकर महसूस करूंगी। माना कि अब यह जरा भी मुमकिन नही तो तुम्हारे पापा का वीर्य भी कभी मेरे गले से नीचे उतरना संभव नही" तत्काल अपना मुँह धोकर वैशाली कुछ इसी सोच के साथ घर की साफ-सफाई मे जुट जाती है। डाइनिंग टेबल साफकर उसने किचन की ओर अपना रुख किया, लबालब भरे डस्टबिन का कचरा बड़े से पॉलीबैग मे उड़ेलते वक्त उसकी नजर एकाएक उस छोटे पॉलीबैग पर आकार ठहर जाती है जिसे उसकी सोच-अनुसार कतई भरा नही होना चाहिए था।

"जनाब ने पिज्जा मंगवाया तो जरूर पर खाने की जगह डस्टबिन मे फेंक दिया, तभी मैं सोचूँ सुबह-सुबह मेरे लाल मे अचानक कुम्भकरण कैसे घुस गया था?" वैशाली ने मन ही मन सोचा। जहाँ कई दिनों बाद नाश्ते को संतुष्टिपूर्वक खाते अभिमन्यु का जिक्र उसे प्रसन्न होने पर विवश कर रहा था वहीं पिछली रात को भूखा सोया वह अपनी माँ की आँखों को नम करने से भी बाज़ नही आया था। किचन के बाद घर मे झाडू-पोंछा कर वैशाली पुनः अपने बेटे के शयनकक्ष के भीतर प्रवेश कर जाती है, जिसे कुछ क्षणों पहले ही उसने झाड़ा-पोंछा था।

अभिमन्यु के बिस्तर पर बिछी सिलवट भरी चादर को एकटक देखते हुए वैशाली कब नग्न हो चुकी थी वह स्वयं नही जान पाती, उसके मस्तिष्क से उसके शरीर का जुड़ाव मानो पूरी तरह से टूट गया था। अपने पति के समक्ष रहकर जिस स्त्री ने बीते चार पहरों तक पलभर को भी अपने बेटे का ध्यान नही कर पाया था, पति से बिछड़ते ही पुनः खुद को तिरस्कृत महसूस करते हुए पूर्णरूप से अपने बेटे के ख्यालों मे डूब गयी थी।

"ओह मन्यु! ऐसा क्या हो गया तो एकाएक तुम अपनी माँ से इतना दूर हो गए, क्या मेरे पति का वापस लौटना तुम्हें नागवार गुजरा है?" अभिमन्यु के बिस्तर पर लेटी वैशाली उसकी तकिया मे अपना मुँह घुसाए जैसे उसकी शारीरिक मर्दाना गंध से ऐसा भाव-विह्वल प्रश्न पूछती है, उस प्राणहीन तकिया से भला उस व्याकुल माँ को क्या उत्तर मिलना था। उत्तरप्राप्ति ना होने के पश्चयात क्रोध व उद्विग्नता के सम्मिश्रण से आहत अतिशीघ्र वह बेटे की तकिया को अपनी अपनी नग्न बाँहों और टाँगों के मघ्य कसकर जकड़ इस बुरी तरह रोने लगती है, मानो उसका सर्वस्व ही लुट गया हो।

लगभग पूरी दोपहरी ही वैशाली रोती रही, सिसकती रही, मर्मस्पर्शी आहें भरती रही और जब फिर भी बेटे संग बिताई खुशनुमा यादें उसका पीछा नही छोड़तीं तब वह बोझिल भाव से अभिमन्यु के बिस्तर से नीचे उतर नंगी ही किचन के भीतर पहुँच जाती है। खाने का उद्देश्य महज पेट भरना नही माना जा सकता, तृप्ति, संतुष्टि से सिर्फ पेट ही नही बल्कि तन, मन, धन सबकुछ अपने आप ही भर जाता है और शायद इसी प्रचिलत कहावत की सत्यता से ओतप्रोत बीते दिन की भांति आज भी वैशाली अपनी पूर्ण नग्न अवस्था मे ही खाना बनाने मे तल्लीन हो जाती है। हालाकिं आज वह घर मे अकेली थी मगर उसके अपने कामुक यौन अंगों को खुजलाते, सहलाते, ऐंठते हुए अपने उन्हीं गंदे हाथों से उसका लगातार अन्न को छूते जाना नही छूटा।

खाना खाते वक्त भी वैशाली उसी कुर्सी पर बैठी जिस पर बीते कल अभिमन्यु ने उसे अपनी गोद मे बिठाकर खुद अपने हाथों से खाना खिलाया था, उस वक्त की उसके बेटे की शैतानियां व उसके ठहाकों की गूँज भले ही इस तात्कालिक समय मे उस माँ के कानों में प्रत्यक्ष रस नही घोल पा रही थी मगर वह स्वयं अपनी शैतानियों से उत्पन्न ठहाके को अवश्य ही सुन सकती थी और वहाँ हो भी कुछ ऐसा ही रहा था। खाने का हर निवाला अपने मुँह के भीतर पहुंचाने से पूर्व वैशाली अच्छी तरह उसे अपनी रज से तर करती और फिर खिलखिलाते हुए वह दूषित निवाला बड़े चाव से चबाकर उसे अपने गले से नीचे उतारना शुरू कर देती।

एकबार फिर वही साफ-सफाई। शाम के साढ़े पांच बज चुके थे, अपने कहे मुताबिक अभिमन्यु अबतक घर नही लौटा था। अभी भी नग्न हॉल के सोफे पर बैठी वैशाली घड़ी-घड़ी दीवार पर टंगी घड़ी की ओर ही देख रही थी, बार-बार उसके थरथराते होंठों से बस एक-सा स्वर फूट रहा था कि काश उसका बेटा उसके पति के लौटने से पहले घर लौट आये और अपनी माँ को उसकी याद मे क्षणमात्र को ही सही पर उसकी पूर्ण नंगी अवस्था मे देख ले, फिर चाहे अत्यंत तुरंत ही वह अपनी नग्नता को ढांक लेगी।

"तुम चाहे जो भी सोचो मन्यु, तुम्हारी माँ दोबारा तुम्हें पाकर रहेगी और फिर कभी अपने से दूर नही होने देगी" अभिमन्यु के कमरे के भीतर अपने पूर्व में उतारे वस्त्रों को पुनः पहनती वैशाली के स्वर मे दृढ़ता और सुर्ख आँखों मे विश्वास की अखंड लालिमा चमक रही थी।

पिता-पुत्र के लगभग समानांतर घर लौटने के पश्चयात आपस मे उनके अजूल-फिजूल व कुछ जरूरी वार्तालाभ, शाम की चाय और रात का खाना, सबकुछ जैसे अपने समय से निपट चुका था। अभिमन्यु से वैशाली और वैशाली से अभिमन्यु, दोनों एक-दूसरे से इस खुशनुमा अंदाज मे बातचीत कर रहे थे जिसमे मणिक क्या वह स्वयं खोट नही निकाल सकते थे। उनके नाटक को देख कौन कह सकता था कि उनके बीच कितना अधिक विस्फोक तनाव पसरा हुआ था, उनके भाव कितने अधिक विह्वल थे, उनके हृदय कितनी अधिक ज्वलंतता से जल रहे थे।

रातभर उनके बेडरूम के बिस्तर चरमराते रहे, फर्क सिर्फ इतना--सा था कि जहाँ अभिमन्यु का बिस्तर सारी रात उसके करवट बदलते रहने की वजह से चरमराता रहा था वहीं मणिक के बलिष्ठ शरीर के नीचे दबी वैशाली की चूत मे देर राततक निरंतर लगते रहे उसके पति के विशाल लंड के हाहाकारी झटकों से उनके बिस्तर के साथ खुद वह भी चरमरा उठी थी।
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मणिक की घर वापसी को पन्द्रह दिन बीत चुके हैं। वह पहले से कहीं अधिक खुश है, अपनी इस नई-नवेली दिनचर्या से बेहद संतुष्ट है। दिन मे दफ़्तर के सामजिक, शाम को पारिवारिक और रात को अपने निजी व गोपनीय विवाहित जीवन का लुफ़्त उठाना भला कितने अधेड़ों को प्राप्त होता है, जब-तब बेटी अनुभा की कुशल-क्षेम भी उसे अत्यंत आनंदित कर जाती।

अभिमन्यु एकांत मे बेहद गंभीर, मित्रों के साथ गुपचुप मगर अपने माता-पिता के सम्मुख सदा प्रसन्न बने रहने का हरसंभव प्रयत्न करता, तिहरा व्यक्तिव जीने को विवश वह नवयुवक जाने किस मिट्टी का बना था जो ऐसी अपरिपक्व उम्र मे भी वह मणिक और तो और अपनी माँ तक को भ्रमित करने मे पूर्ण सफल रहा था। हालांकि अपनी माँ के संग जुड़ी उसके जीवन की सर्वश्रेष्ठ यादें लेशमात्र भी उसके मन-मस्तिष्क से नही जा पाई थीं मगर उसके पिता की घर वापसी से उसकी माँ का अधूरापन मिट गया है, सदैव उसे खुश देखने की अपनी एकाकी चाह मे वह कभी खुद को दुखी नही होने देता। अब तो उसके आँसू भी उसे सुखद महसूस होने लगे थे, जो सोते-जागते मनमर्जी कभी भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा देते और जिन्हें पोंछे बिना ही मानो वह पहले से अधिक प्रसन्नता से भर जाता।

वैशाली की दिनचर्या मे शामिल, सुबह अपने प्रियों को घर से रुखसत करना तात्पश्चयात पूर्ण नग्न अवस्था मे घर के सभी अधूरे काम पूरे करना, नियमित अपने बेटे के बिस्तर पर उसकी तकिया से लड़ना-झगड़ना, उस मूक वस्तु से अपने अनगिनती प्रश्नों के जवाब ना मिलने पर उसे खुद में समेटकर घंटों तक रोना, नग्न ही दिन का खाना बनाना, उसे गंदगी से खाना, खाते समय खिलखिलाना जैसे उस माँ के दिल का बोझ कम करने मे बहुत सहायक भूमिका निभा रहा था। हर शाम वह अभिमन्यु को पुनः पाने की अपनी विशेष चाह को भी अवश्य दोहराती, पति से पहले बेटे के लौट आने के इंतजार मे तबतक नग्न बनी रहती जबतक उसका इंतजार उसकी विवशता मे नही बदल जाता।

इस बीच माँ-बेटे को घर मे एकांतवास कम पर मिला जरूर था और उस वक्त यकीनन दोनों का हाल एक--सा कहा जा सकता था। दोनों चाहते थे कि अपनी-अपनी नाटकीय छव का रहस्य एक-दूसरे पर तत्काल खोल दें, एक-दूसरे को अपने अंक मे भरकर खूब रोयें, एक-दूसरे को डांटें-लड़ें, बेतहाशा एक-दूसरे को चूमें मगर प्यार और तड़प जब ज्यादा बढ़ जाए, मानवीय प्रवित्ति है कि मनुष्य शब्दविहीन हो जाता है। पहले आप--पहले आप की नवाबी इच्छा में दोनों मूक ही सारा समय व्यतीत कर देते, जिस वार्तालाभ की कोई आवश्यकता नही उसकी तो झड़ लगी रहती पर असल भावना दिल मे ही दबी रह जाती।
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मणिक की घर वापसी को सत्ताईस दिन बीत चुके हैं। आज सरकारी अवकाश है मगर आज भी उसे दफ़्तर मे अर्ध दिवस के रूप मे अपनी हाजरी लगानी थी। पति की घर निकासी होते ही वैशाली का हृदय एकाएक जोरों से धड़कने लगा, क्योंकि अपने आप उसके हाथ उसके बदन पर लिपटी साड़ी को खोलने लगे थे। साड़ी के बाद ब्लाउज, पेटीकोट, ब्रा और कच्छी एक के बाद एक लगातार वह अपने कांपते हाथों को रोकने का असफल प्रयत्न करती रही थी और इसके उपरान्त ना चाहते हुए भी उसके कदम भी स्वतः ही गतिशील हो जाते हैं।

बीते इन सत्ताईस दिनों के कष्टकारी एकांतवास के बाद यह प्रथम अवसर था जो वह अपने बेटे के समक्ष एक बार फिर से पूर्ण नग्न होकर पहुँचने वाली थी, हौले-हौले आगे कदम बढ़ाती खुद पर बेहद लज्जित होती वह अधेड़ नंगी माँ उस वक्त और भी अधिक शर्मिन्दगी का अनुभव करने लगती है जब उसके रोके से भी ना रुके उसके निरंतर गतिमान कदम वास्तविकता मे उसके बेटे के कमरे के खुले दरवाजे के भीतर प्रवेश कर जाते हैं।

अभिमन्यु नींद के आगोश मे गुम था। उसके बिस्तर के समीप पहुँचते-पहुँचते वैशाली ने जाना जैसे वह मीलों दौड़कर वहाँ पहुंच पाई हो, अपने करवट लिए लेते बेटे के मासूम से सोते चेहरे को निहारती उसकी माँ सावधानीपूर्वक अपनी दोनों कोहनियां बिस्तर के बाएं छोर पर टिकाकर तत्काल अपने घुटनों के बल नीचे फर्श पर बैठ जाती है। अभिमन्यु के कमरे मे उस वक्त सिर्फ दो ही आवाज गूँज रही थीं और वह थीं उसके चेहरे को टकटकी लगाए देखती उसकी माँ की अनियंत्रित चढ़ी उसकी जोरदार साँसों की, दूसरी उसके धुकनी समान धड़कते उसके दिल की।

"भाग जा यहाँ से छिनाल! अपने बेटे के नींद से जागने का इंतजार मत कर वर्ना आज वह तुझे कुतिया नही सीधे रंडी कहकर ही पुकारेगा। उठते ही तुझसे पूछेगा कि तेरी प्यास क्या तेरा पति अब भी नही बुझा पा रहा जो तू दोबारा अपने बेटे पर डोरे डालने नंगी उसके कमरे मे चली आई? भाग वैशाली, जो पाप तू जाने-अनजाने कर चुकी है उसे और ना बढ़ा भाग जा ...भाग! भाग! अरे भाग जल्दी यहाँ से रंडी! भागऽऽ!" सहसा वैशाली के अंतर्मन ने उसे जोरों से लताड़ा और जिससे घबराकर एकाएक वह माँ अपनी गांड के बल फर्श पर लुढ़क गई, उसकी कोहनियों की रगड़ से बिस्तर के गद्दे मे हुई हलचल अचानक उसके बेटे को शारीरिक हलचल प्रदान कर जाती है।

"देख वह उठा, भाग! जल्दी निकल यहाँ से वैऽशाऽऽलीऽऽऽ" उस नग्न अधेड़ माँ को पूरी तरह झकझोरे के लिए उसके अंतर्मन की यह लगातार दूसरी फटकार काफी थी और ऊपर से उसके बेटे का नींद मे कसमसाता शरीर देख तो मानो उसके रोंगटे खड़े हो गए थे, क्षणभर भी नही बीत पाया और अपनी गांड के चोटिल पटों की पीड़ा भूल वैशाली लंगड़ाती हुई सी बेटे के कमरे से बाहर निकल चुकी थी।

कुछ आधे घंटे पश्चयात अभिमन्यु अपने बेडरूम से बाहर आया और अपनी माँ को हॉल के सोफे पर बैठा पाता है। एक छोटा मगर प्यार सा गुड़ मॉर्निंग उसे कहकर वह सीधा किचन के भीतर आ पहुंचा और जब वापस आया तो उसके हाथों मे दो कप चाय थी।

"माँ चाय ..." अपनी बीती सर्वदा नीच हरकत पर लज्जित वैशाली अपने माथे को सहला रही थी जब अभिमन्यु उसके बगल मे बैठने से पूर्व चाय का एक कप उसकी ओर बढ़ाता है।

"पापा कहाँ हैं?" सोफे पर बैठते हुए उसने अपने पिछले कथन मे जोड़ा।

"वह ...वह ऑफिस गए हैं, उन ...उनका हॉफ डे है आज" चाहकर भी अपनी घबराहट को छुपाने मे नाकाम रही वैशाली कहते हुए आखिरकर हकला ही गयी थी।

"ओह! सब ठीक है न मॉम? सर दुख रहा हो तो बाम लगा दूँ" अभिमन्यु ने सामान्य से स्वर मे पूछा।

"न ...नही सब ठीक है, तुम्हारे लिए क्या नाश्ता बनाऊँ मन्यु? तुम्हारे पापा तो सिर्फ चाय पीकर ही निकल गए" उलटे वैशाली उससे सवाल करती है।

"कुछ नही। नहा-धोकर विशाल के रूम तक जाऊंगा, वहीं नाश्ता भी कर लूँगा और कुछ नोट्स भी लेने हैं उससे" अभिमन्यु ने बताया और चाय का अंतिम घूँट पीकर वापस अपने कमरे के भीतर चला गया।

"मैं क्या करूँ मन्यु, मुझे सचमुच तुमसे प्यार हो गया है बेटा" ठंडी चाय पकड़े बैठी वैशाली के बुदबुदाते होंठ बार-बार यही रट लगा रहे थे।

दोपहर को लंच के बाद मणिक अपने बेडरूम मे सुस्ता रहा था, अभिमन्यु तो कबका अपने कमरे के भीतर चला गया था, बाकी बची वैशाली जोकि थकहारकर हॉल के सोफे पर पसरी हुई थी। अचानक सोफे के पास की रूम टेबल पर रखे अभिमन्यु के मोबाइल मे बीप हुई, अपने ख्यालों मे खोई वैशाली के कानों ने भी उस ध्वनि को सुना मगर वह अलसाई तबतक अपना ध्यान उसपर पूरी तरह से केंद्रित नही कर सकी जबतक उसके बेटे का मोबाइल बार-बार बीप नही होने लगा।

"यार तेरे जाने के बाद हमसब ने आज रात फुलऑन मस्ती करने का प्लान किया है"

"तू भी उसमे शामिल रहेगा"

"3000 एंट्री फीस है"

"बियर, दारू, खाना, लड़की सबका इंतजाम हो चुका है"

"तीन झक्कास लौंडिया हैं, फुल नाईट मस्ती करेंगे"

"रिप्लाई कर फटाफट, हुआ तो चौथी भी बुलवा लेंगे"

"सारे रंडीबाज आज खुलकर धूम मचाएंगे, वैसे भी नेक्स्ट वीक से एग्जाम्स चालू हैं तो बॉडी और माइंड का रिलैक्स करना बनता है यार"

"वेटिंग फॉर योर रिप्लाई, बता फटाफट"

बेटे के व्हाट्सएप्प पर रिसीव हुए इन विध्वंशक मैसेजस् को पढ़ते-पढ़ते वैशाली का पूरा बदन पसीने से लथपथ हो चुका था, सैंडर कोई और नही बल्कि उसका दोस्त विशाल ही था जो कानपुर से यहाँ बीटेक करने आया था और वह स्वयं भी इस लड़के को थोड़ा-बहुत जानती थी। कांपते हाथों से मोबाइल को ज्यों का त्यों टेबल पर छोड़ वह बिना पीछे मुड़े अपने बेडरूम के भीतर चली जाती है, उसके आश्चर्य और क्रोध का कोई पारावार शेष ना था।

"नही यार नही आ सकूँगा, नही माने नही"

"हाँ मैसेज पढ़ लिए थे और पैसों की भी कोई दिक्कत नही बट मेरा मन नही है, यू गाइज् एन्जॉय! मैं कल कॉलेज मे मिलता हूँ ...बाई"

बेटे के कमरे के अधखुले दरवाजे पर अपने कान लगाए खड़ी वैशाली की खुशी का कोई ठिकाना नही रहा था जब वह उसके मुँह से साफ इनकार के शब्द सुनती है। जाने क्यों एकाएक उसकी आँखें छलक आईं थी और जिन्हें पोंछती वह शाम की चाय बनाने के लिए दबे पांव किचन की दिशा मे चल पड़ती है।

"मैं जानती थी कि मन्यु मेरी बात का मान जरूर रखेगा, बाजारू रंडियों के पास फिर कभी नही जाएगा" खुशी से उछलकूद करती वैशाली बीते पिछले घंटेभर को जैसे तत्काल भूल जाती है, जिसमे बेटे के दोस्त के साथ उसने बेटे को भी अपने क्रोध मे शामिल कर लिया था।

"आज रात डिनर मे क्या खाओगे मन्यु? काफी दिन हुए तुम्हारी फरमाइश का कुछ अच्छा नही बनाया" वैशाली बेडरूम मे सोते अपने पति को चाय का न्योता देकर सोफे पर बैठे अभिमन्यु के करीब आते हुए पूछती है, उसके भाव बेहद चहके हुए थे और जिन्हें छुपाने का भी उस माँ ने अतिरिक्त कोई प्रयास नही किया था।

"रहने दो माँ, आज हम बाहर खाना खायेंगे। मेरी इस महीने की पॉकेटमनी पूरी की पूरी बची है तो आज की ट्रीट मेरी तरफ से" अभिमन्यु शांत स्वर मे बोला, बिना अपनी माँ की ओर देखे वह पुनः चाय की चुस्कियां लेने लगता है।

"वाह! अभिमन्यु तो वाकई अब बड़ा हो गया है, अपने माता-पिता को आज खुद अपनी तरफ से ट्रीट दे रहा है" पीछे से मणिक भी सोफे के नजदीक आते हुए बोला और सोफे पर बैठते ही अपने बेटे के कंधे को थपथपाना शुरू कर देता है।

"पापा नेक्स्ट वीक से एक्सटर्नल स्टार्ट है तो थोड़ा रिलेक्सेशन चाह रहा था, बाकी ऐसी कोई बात नही है" अभिमन्यु का स्वर महज शांत ही नही वरन गंभीर भी हो चुका था।

आज वैशाली ठीक उसी तरह से तैयार हुई थी जैसी कुछ दिन पूर्व वह बेटे के साथ मॉल जाते वक्त हुई थी, वही श्रंगार, वही उत्साह और बिलकुल वही खुशनुमा अंदाज। मूवी देखने जाने के बजाये वे प्रगति गार्डन घूमने चले आए थे, फरमाइश वैशाली की रही थी और जो अपने पति-बेटे का हाथ एकसाथ थामे किसी नवयुवती सी उत्साहित होकर गार्डन की नैसर्गिक सुंदरता का भरपूर लुफ्त उठा रही थी। उन्होंने फव्वारों का आनंद लिया, झूले झूले, फिसलपट्टी पर जमकर ऊधम किया और अंततः थकहारकर तीनों गार्डन की कोमल घाँस पर सुस्ताने लगे।
"उफ्फ्! मेरे तो पैर दुखने लगे" अपनी सैंडल उतारती वैशाली हांफते हुए बोली, यहाँ उसका कहना हुआ और वहाँ अभिमन्यु बिना किसी अग्रिम सूचना के उसके पैर के अत्यंत मुलायम पंजों को अपनी हथेलियों से हौले-हौले दबाना आरंभ कर देता है। अपने पति की मौजूदगी के एहसास से अचानक वैशाली की धड़कनें रुक सी गई थीं मगर जब उसने मणिक के मुस्कुराते चेहरे पर गौर किया, नौटंकी करते हुए वह जोर-जोर से दर्द भरी आँहें लेना शुरू कर देती है। जबकि सच तो यह था कि बेटे के हाथों का मर्दाना स्पर्श वह अपने पैर के पंजों से कहीं अधिक अपनी चूत के संवेदनशील मुहाने पर महसूस कर रही थी, लग रहा था जैसे अभिमन्यु उसके पंजे को नही बल्कि बारम्बार उसकी चूत को अपनी बलिष्ठ हथेली के मध्य भींच रहा हो। अपने पति की उपस्थिति मे वैशाली की यह नीच सोच एकाएक इस कदर पैश्विक हो जाती है कि मणिक के घाँस पर लेटते ही वह बेशर्मीपूर्वक अपनी मांसल जांघों को तीव्रता से आपस मे घिसने लगती है।


"सुनिये, मुझे बाथरूम जाना है" अपनी माँ के भीतर अकस्मात् आए बदलाव से हैरान हुए अभिमन्यु ने ज्यों ही उसके उत्तेजित चेहरे को देखा, वैशाली घाँस पर लेटे अपने पति से बोल पड़ी।

"अभिमन्यु, लेडीज़ टॉयलेट उधर है शायद" अपनी आँखें मूंदे लेटे मणिक ने अपनी दायीं दिशा की ओर इशारा करते हुए कहा और तत्काल वैशाली बेटे का हाथ थाम अपने संग उसे भी उठने मे मदद करने लगती है।

"मैं अब और रोक नही सकती मन्यु, मुझे ...मुझे यहीं मूतना पड़ेगा" पास ही एक बड़े से पेड़ के समीप पहुँच वैशाली सिसकी और आजू-बाजू के शांत वातावरण को देख अभिमन्यु का हाथ पकडे वह उसे भी पेड़ के पीछे खींच लेती है। एकबार फिर उस अधेड़ माँ पर उसके बेटे का खुमार पूरी तरह से हावी हो चुका था और अभिमन्यु की आँखों मे झांकते हुए ही वह खुलेआम अपनी साड़ी को अपनी कमर तक ऊँचा उठाने का दुस्साहस कर बैठी थी।

"कैसी तंग कच्छियां खरीद कर लाये हो तुम अपनी माँ के लिए, दिनभर मेरी गांड की दरार मे ही घुसी रहती हैं। तुम्हें नही पता कि कैसे मैंने अबतक इन्हें तुम्हारे पापा से छुपाया है, अगर पकड़ी गई ना तो याद रखना सीधे तुम्हारा नाम ले दूँगी" कहकर वैशाली ने वह साहसिक कार्य भी कर ही डाला जिसकी अभिमन्यु को कतई आशा नही थी।

"लो, रखो इसे अपनी पॉकेट में ...मैं बिना कच्छी पहने ही ठीक हूँ। ह्म्म्म! कितना खुला-खुला सा लग रहा है मन्यु, ऐसी ठंडी हवा मे तो मैं घंटों तुम्हारे साथ नंगी बैठी रह सकती हूँ" अपनी कच्छी को अपनी टाँगों से बाहर निकाल वह उसे अपने बेटे की दायीं हथेली पर रखते हुए बोली।

"तुम देखना मत, हाँ मन्यु ...मैं मूतने बैठ रही हूँ" बेहद अश्लीलात्मक व्यंग कसते हुए अपने निचले धड़ से यूँ सरेआम नंगी हो चुकी वह अत्यंत बेशर्म माँ वहीं घाँस पर नीचे बैठने लगी थी मगर तभी अभिमन्यु उसकी बायीं कलाई को बलपूर्वक थाम उसे खुद से बुरी तरह चिपका लेता है।

"आखिर तुम चाहती क्या हो? क्यों अपनी हँसती-खेलती जिंदगी को बर्बाद करने पर तुली है? कोई सहारा नही देगा हमें माँ ...ना तुम्हारा पति, तुम्हारी बेटी और ना ही कोई रिश्तेदार। समाज हमपर थूकेगा तो ना तुम सह सकोगी और ना ही मैं" हालाकिं अभिमन्यु द्वारा कहा गया उसका हर शब्द उसके क्रोध की थरथराहट से कांप रहा था मगर जिस प्यार से उसका हाथ उससे लिपटी उसकी माँ की पीठ को सहलाने मे व्यस्त था, उसके क्रोध की पहचान करना स्वयं उसके बस से बाहर था।

"मुझे तुम दोनों चाहिए ...बस मुझे तुम दोनों चाहिए" बेटे के सर्वदा उचित कथन के जवाब में वैशाली ने रट लगाते हुए कहा।

"हम हैं तो तुम्हारे साथ माँ, तुम अकेली कहाँ हो" अभिमन्यु अत्यधिक आश्चर्य से भरते हुए पूछता है, आखिर उसकी माँ क्यों बेवजह आशंकित है वह जानने का बेहद इच्छुक हो चला था।

"अधूरे नहीं, मुझे तुम दोनों पूरे चाहिए मन्यु। तुम्हारे पापा की तरह मुझे तुम भी पूरे चाहिए" वैशाली रुदन के स्वर मे बुदबुदाई, निश्चित वह रो पड़ने के बेहद नजदीक पहुँच चुकी थी।

"अच्छा तो क्या आज सुबह इसीलिए तुम मेरे कमरे मे नंगी-पुंगी चली आई थी?" अभिमन्यु ने जैसे विस्फोट किया, उसके विध्वंशक प्रश्न को सुन उससे लिपटी उसकी माँ क्षणमात्र मे ही उससे अलग होने का प्रयास करने लगती है मगर वह उसे खुद से लेशमात्र भी दूर नही होने देता बल्कि पहले से कहीं अधिक कसकर खुद मे समेटना शुरू कर देता है। आखिर उसे भी तो अपनी माँ से दूर हुए महीना बीतने को था, अब उसके एहसास नम नही होते तो फिर कब होते?

"तुमने चोरी छिपे मेरे मैसेज भी पढ़े माँ, बोलो क्यों किया तुमने ऐसा?" अभिमन्यु का यह लगातार दूसरा विस्फोट था और जिसे सुनने के बाद तो वास्तविकता मे वैशाली की आँखें झरने सी बहने लगी थीं।

"क्योंकि ...क्योंकि मैं चाहती हूँ कि तुम उन रंडियों को नही अपनी ...अपनी माँ को चोदो" वैशाली के रुंधे गले से अचानक बाहर आया यह विस्फोट उसकी पीठ पर कसे उसके बेटे के हाथों को भी अचानक ही शून्य मे परिवर्तित कर देता है और जो मरणासन्न हुए स्वतः ही नीचे गिर जाते हैं।

"हाँ मन्यु यह सच है बेटा, तुम्हारी माँ तुमसे चुदवाने को तड़प रही है मगर चाहकर भी वह पापी नही बन पा रही। तुम्हारी कसम खा कर कहती हूँ मेरे लाल, मैं हरपल सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे बारे मे ही सोचती हूँ। तुम्हें पूरी तरह से पाने की चाह मे मेरा तन और मन पागल सा हुआ जा रहा है, रह-रहकर मेरी चूत बस तुम्हें ही पुकारती रहती है इस आस मे की तुम वापस इसमे समा जाओ ...हमेशा हमेशा के लिए इसमे समाकर रह जाओ" वैशाली बोलती ही जाती यदि बीच मे ही अभिमन्यु के मोबाइल पर फोन नही आया होता, रिंगटोन उसके पिता के नंबर पर सेव थी और जिसे वैशाली भी खूब पहचानती थी।

"बस लौट ही रहे हैं पापा, टॉयलेट बहुत दूर था" कहकर वह कॉल कट कर देता है।

"अपने ये आँसू पोंछों माँ, तुम भी बात-बेबात रोना शुरू कर देती हो" अभिमन्यु अपने अंगूठों से अपनी माँ की नम पलकें पोंछते हुए उसे प्यार भरी डाँट लगाते हुए कहता था।

"मूतना है?" उसने पिछले कथन मे जोड़ा, जिसके जवाब मे फौरन वैशाली इनकार मे अपना सिर हिला देती है।

"कच्छी पहनोगी?" अभिमन्यु के नटखटी प्रश्न जारी रहे, उसकी माँ का इनकार भी कहाँ पीछे हटने वाला था।

"मेरा लंड चूसना है?" उसने लगातार तीसरा प्रश्न पूछा, इस बार ना चाहते हुए भी जाने क्यों वह जोरों से हँसने भी लगा था।

"धत्!" पहले बेटे का अश्लील प्रश्न तत्पश्चयात उसकी हँसी से लज्जित वैशाली उसकी बलिष्ठ छाती पर घूंसा जड़ते हुए कुनमुनाई।

"नौटंकी कहीं की ...अब चलो। दो जवान बच्चों की माँ होकर भी साड़ी के नीचे बिना कच्छी पहने यूँ सरेआम घूमती हो, शर्म तो तुम्हें आती नही वैशाली" बीते संपूर्ण जीवन मे प्रथम बार अपनी माँ के सम्मुख स्वयं उसी का नाम प्रत्यक्ष अपनी जुबान पर ला कर अभिमन्यु जितना संतोष खुद महसूस कर रहा था, वैशाली उससे कहीं अधिक संतुष्ट, बेहद हर्षित थी।

एक उच्चस्तरीय रेस्टोरेंट मे वैशाली की पसंद का खाना लग चुका था, डरते-डरते ही सही पर पहला निवाला अपने बेटे को खिलाकर वह अगला अपने पति के मुँह तक पहुंचा ही देती है। अभिमन्यु को भी ना जाने क्या सूझा और वह भी खुद ना खाकर अपने हाथों से बारी-बारी अपने माता-पिता को खिलाने लगा था, फिर तो जैसे मणिक का हाथ भी उसकी पत्नी और बेटे की तर्ज पर बस उन्हें ही खिलाते जाने मे मग्न हो चला था। वेटर तो वेटर, वह मौजूद ग्राहक भी उन तीनों के बीच चल रही अनूठी व प्रेमपूर्ण भोजनग्रहण प्रक्रिया से हैरान हुए बगैर नही रह सका था, बल्कि कुछ तो खुद ब खुद उनके रंग मे रंग गए थे। हमेशा कंजूसी करने वाली वैशाली उस तात्कालिक समय मे इतनी अधिक प्रफुल्लित थी कि बेटे से पैसे मांग उसने वेटर को एक लंबी टिप भी उपहारस्वरूप खुशी-खुशी प्रदान कर दी थी।

घर लौटते-लौटते काफी रात हो चुकी है, मणिक के स्कूटर के पीछे अभिमन्यु भी हौले-हौले अपनी बाइक चला रहा है, रास्ता सुनसान था तो वह कैसे अपने माता-पिता से आगे या उन्हें अकेला वहाँ छोड़ सकता था। घर पहुँचकर एक छोटा सा शुभरात्रि वार्तालाभ, फिर तीनों दो मे बटकर अपने-अपने शयनकक्ष के भीतर चले जाते हैं। उस रात वैशाली चुद तो अपने पति से रही थी मगर पहली बार उसके मन-मस्तिष्क मे सिर्फ और सिर्फ उसका अपना बेटा समाया हुआ था, मणिक के हर हाहाकारी धक्के पर उस अधेड़ पत्नी के मुंह से पुकार तो उसके पति की निकल रही थी मगर अंतर्मन से से वह और उसके भाव अब पूर्णतः ममतामयी हो चुके थे।
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एक और खुशनुमा सुबह का आगाज़, पति और बेटे को घर से रुखसत कर चुकी वैशाली रोज की भांति आज बेटे की याद मे नग्न नही होती।

"अब तो मैं तब अपने कपड़े उतारूंगी मन्यु, जब बिना डरे, बिना घबराहट के, अपनी मर्जी से तुम्हारे कमरे के अंदर आने का साहस जुटा लूँगी और मेरा यकीन है कि तब तुम भी अपनी माँ को खुद मे समाने से खुद को कतई नही रोक पाओगे" दर्पण के समक्ष मानो स्वयं से ही घनघोर प्रतिज्ञा करती वैशाली गंभीर, बेहद गंभीर हो चली थी। बिना नग्न हुए आज उसका अपने घर मे क्षणमात्र भी काटना मुश्किल था तो कुछ देर के सोच-विचार के उपरांत वह सुधा से मिलने सीधे उसके घर की ओर कूच कर जाती है।

दोनों अधेड़ सहेलियां एक लंबे अंतराल के बाद एक-दूसरे से मिल रही थी। वैशाली को यह जानकार बहुत दुख होता है कि आज-कल उसकी एकमात्र सखी सिर्फ और सिर्फ बीमार ही बनी रहती है, उसका बेडरूम बेडरूम सा नही उसे किसी दवाखाने सा नजर आ रहा था। सुधा के बताने पाए वैशाली ने यह भी जाना की वह निद्रा जैसी सामान्य व प्राकृतिक क्रिया भी बिना औषधि के पूरी नही कर पाने को विवश है, हालांकि वैशाली ने उसे नींद की गोलियां बेवजह लेने से प्रेमपूर्ण डाँट भी लगाई मगर स्वयं अधेड़ उम्र को प्राप्त कर चुकी वह इस उम्र की चिंताओं से अक्सर खुद भी तो जूझा करती थी, अनुभा के विवाह से पूर्व वह भी दिन-रात अनेकों आशंकाओं से घिरी रहा करती थी।

दिन का खाना दोनों ने साथ मिलकर बनाया। वैशाली की इच्छास्वरूप उसकी सखी भी इसी बहाने पेटभर कर खा लेगी, यह सोच उसके मन से उनके पिछले बैर को भी स्वतः ही भुला देता है। पूरे दिन दोनों ने बहुत गप्पें लड़ायीं, खूब हँसी-ठिठोली की, एक-दूसरे का सुख-दुख बाँटा और कई नए आश्वासनों के साथ वैशाली वापस अपने घर को लौट आती है। परिवार के संग हर किसी को एक सच्चे दोस्त की भी जरुरत अवश्य होती है, आज वैशाली इस सत्यता से भी बखूबी परिचित हो चली थी।

शाम को पति-बेटे के घर लौटने पर शुरू हुआ चाय का सिलसिला कब रात्रि भोजन पर आ ठहरा था, यह एकल मनुष्य शायद ही कभी समझ पाएं। मणिक की पसंद के राजमा-चावल, अभिमन्यु की पसंदीदा धनिया-टमाटर चटनी और भरवां मिर्च तलते वक्त तो ना जाने कितनी बार किचन मे ही वैशाली की लार टपक चुकी थी। तीनों ने छककर खाया, मणिक तो जैसे बच्चा बन गया था, लगातार जल्दी-जल्दी राजमा-चावल जबरन अपने मुँह के भीतर ठूंसे जा रहा था और अंततः दो-चार लंबी-लंबी संतुष्टिपूर्वक डकारें लेकर बारी-बारी अपनी उंगलियों को चाटने लगता है।

"भाई आज तो मजा ही आ गया, क्यों अभिमन्यु? मुझसे तो अब कुर्सी से उठा भी नही जाएगा, लग रहा है यहीं सो जाऊँ" कुर्सी पर पसरते हुए मणिक वास्तविकता मे ही वहीं अपनी आँखों को मूँदते हुए कहता है।

"अरे अरे, हाथ धोकर बेडरूम मे सोइए, यहाँ कुर्सी पर कैसे सोयेंगे आप" वैशाली प्रत्युत्तर मे बोली। अभिमन्यु चुप था, अपने माता-पिता की अभिनय से प्रचूर नोंक-झोंक पर मन ही मन मुस्कुरा रहा था।

"हाँ यह भी सही है, कुर्सी पर कैसे सोऊंगा। मैं तो चला बेडरूम मे, तुम दोनों भी टाइम से सो जाना" कुर्सी से उठते हुए मणिक अपनी पत्नी को आँख मारते हुए बोला, यह उसका एक मूक इशारा था जिसका लुफ्त केवल विवाहित दंपति ही उठा सकते हैं। लजाती वैशाली फौरन उसे अपनी आँखों से डाँटती है और फिर बेटे की नजरों से छुप-छुपाकर स्वयं भी एक मूक चुम्बन उसकी ओर उछालते हुए जोरों से चहक पड़ती है।

अर्धरात्रि के समय जब अभिमन्यु अपने बिस्तर पर बारम्बार करवटें बदल रहा था तब अचानक उसके कमरे की ट्यूबलाइट जलने से उसकी बंद आँखें भी तत्काल खुल जाती है। सर्वप्रथम जो विध्वंशक दृश्य उसकी अकस्मात् फट पड़ी आँखों ने देखा, उछलकर बिस्तर पर बैठते हुए वह बार-बार अपनी आँखों को मसलने लगता है मगर फिर भी उसकी आँखें वही विस्फोटक दृश्य देखने को विवश थीं, जो कोई सपना नही पूर्ण हकीकत था।

सिर से पांव तक पूरी तरह से नंगी उसकी माँ उसके बिस्तर के बेहद नजदीक खड़ी थी। उसके खुले केशों से झर-झर पानी चू रहा था, बल्कि उसका संपूर्ण कामुक बदन ही पानी से तरबतर था और जो कि प्रत्यक्ष प्रमाण था कि वह स्नान करने के पश्चयात बिना अपने बदन को पोंछे सीधी उसके कमरे मे चली आई थी। उसकी माँ की आँखों का अद्-धुला काजल उसकी आँखों को और भी अधिक कजरारी बनाने मे सहायक था, माथे की चटक बिंदी, नाक का छल्ला और कानों की बालियां तो स्वयं उसीकी पसंद से उसकी माँ ने खरीदी थीं, उसके गले का स्वर्ण मंगलसूत्र उसके गोल-मटोल मम्मों के बीचों-बीच धंसा और तो और उसकी माँ ने अपनी पतली कमर मे आज कई बरसों बाद अपनी मृत सास से उपहारस्वरूप मिली चांदी की करधनी भी पहनी हुई थी। उसका सपाट नग्न पेट, अत्यंत गोल नाभि और चिपकी टाँगों के मध्य का तिकोना कालापन जो की उसकी झांटों की अधिकता से उत्पन्न हुआ था, जिसे देख बिस्तर पर बैठे अभिमन्यु की आँखें सहसा चौंधिया सी गई थीं। मांसल फूली दोनों जांघें, घुटने, गुदाज पिडालियां व पानी के घेरे के मध्य उसके गौरवर्णी दोनों पैर। एक अंतिम बार इसे सचमुच का स्वप्न समझ वह तीव्रता से अपनी दायीं पहली ऊँगली को अपने दांतों से बलपूर्वक काटता है मगर उसकी माँ भी वहीं थी, वह भी वहीं था और उसकी कष्टप्रद आह से उसका शयनकक्ष भी गूँज उठा था।

"तु ...तुम, य ...यहाँ, प ...पापा?" घबराहटवश अभिमन्यु के कांपते मुँह से बस इतने ही शब्द बाहर निकल पाए थे, जबकि उसके विपरीत उसकी माँ शांत, बेहद गंभीर थी।

"तुम्हारी माँ घर मे अपने पति की मौजूदगी के बावजूद आधी रात को अपने जवान बेटे के कमरे में नंगी चली आई है, तुम्हें क्या लगता है मन्यु ...मैं क्यों यहाँ आई हूँ?" अभिमन्यु के प्रश्न को सिरे से नकार उल्टे वैशाली ने उससे पूछा। उसके भावों सामान उसका प्रश्न भी उतना ही गंभीर, उतना ही सटीक था।

"क्या तुम्हारे पापा कभी इतने जल्दी सोते हैं? मैंने खुद उन्हें सुलाया है मन्यु, ताकि हमारे मिलन मे अब अन्य कोई बाधा नही आ सके" अपने मूक हो चुके बेटे पर पुनः आघात करते हुए वैशाली ने अपने पिछले प्रश्न मे जोड़ा।

"तु ...तुम ने पर ...माँ चली जाओ, अगर ...अगर वह उठ गए ..." अभिमन्यु के भयप्रचूर स्वर फूटे मगर इस बार भी उसका कथन अधूरा रह गया था।

"मुझे मारेंगे-पीटेंगे, तुम बचा लेना। हमें घर से निकाल देंगे, तुम मजदूरी करके दो रोटी खिला देना। बोलो मन्यु, क्या कर सकोगे ऐसा? पाल सकोगे अपनी माँ को जैसे मैंने अबतक तुम्हें पाला है?" वैशाली के हृदयविदारक शब्द किसी नुकीले खंजर सामान सीधे अभिमन्यु के धड़कते सीने मे भीतर तक धंसे चले जाते हैं, आज वैशाली शांत थी मगर अभिमन्यु रुंआसा हो गया था।

"ज ...जरूर माँ। अपनी ...अपनी जान से ज्यादा प्यार करूंगा तुम्हें, मैं भले ही भूखा रह जाऊँ पर तुम्हें कभी नही रहने दूँगा, तुम्हें हर वह खुशी दूँगा जिसकी तुम वाकई हकदार हो, तुम्हें ...." एकाएक रो पड़ा अभिमन्यु आगे बोलता ही जाता यदि तत्काल वैशाली उसके बिस्तर पर चढ़कर उसे अपने नग्न सीने से नही चिपका लेती।

"सश्श्श्श्! बस बस अब चुप हो जाओ, बिलकुल ...बिलकुल चुप हो जाओ। तुम्हारे पापा से हमें कोई खतरा नही मन्यु, अब वह सीधे सुबह ही उठेंगे ...मैंने उन्हें नींद की गोली देकर सुलाया है" अपने बेटे के उद्विग्न कांपते चेहरे को पटापट चूमती वैशाली मुस्कुराकर कहती है। अभिमन्यु की आश्चर्य से बड़ी हो चुकी आँखें बार-बार उसे अत्यधिक सुकून पहुँचा रही थीं।

"तुम्हीं तो कहते थे कि तुम्हारी माँ डरपोक है, बात-बेबात रोती है, घड़ी-घड़ी घबराती है...तो आज मैंने तुम्हें झूठा साबित कर दिया" कहकर वैशाली बेटे के होंठों पर एक लघु चुम्बन अंकित कर देती है, अभिमन्यु के पूछने से पहले उसने स्वयं ही उसे बता दिया कि आज वह सुधा के घर गई थी और उसे नींद की गोलियां भी वहीं से प्राप्त हुई थीं।

"पर फिर भी माँ, मैं ...मैं तुम्हारे साथ सेक्स नही ...." अपनी माँ के इस विस्फोटक कारनामे से हैरान-परेशान हुए अभिमन्यु ने इसबार भी अपना कथन पूरा नही कर पाया था मगर इसबार उसकी घबराहट इसकी वजह नही थी बल्कि उसे बलपूर्वक बिस्तर पर धकेल क्षणमात्र में ही उसकी माँ उसके ऊपर सवार हो चुकी थी।

"उसे चोदना कहते हैं निहायती बेशर्म लड़के और अब तुम क्या तुम्हारे फरिश्ते भी वही करेंगे, जो तुम्हारी यह औरत तुमसे करवाना चाहेगी" अपने बेटे की वृहद दोनों कलाइयों को अपनी छोटी-छोटी हथेलियों मे जकड़े ठीक उसके तने विशाल लंड पर बैठी वैशाली की मंत्रमुग्ध कर देने वाली हँसी से उसका पूरा घर गूँज उठता है, कुछ पलों बाद ही जिसमे अभिमन्यु की खिलखिलाहट शामिल हो जाती है।

लुका-छिपी से शरू हुआ माँ-बेटे का यह नया-नवेला रिश्ता पहले खुलेपन मे बदला, फिर उसमे आकर्षण मिश्रित हुआ, थोड़ी अश्लीलता बढ़ी तो अपने आप रोमांच ने भी अपनी उपस्थति दर्ज करवा दी, हौले-हौले प्यार, वासना, भाव, सुख-दुख भी आपस मे मिलने लगे और अंततः सभी के सम्मिश्रण से दोनों "दो जिस्म से एक जान हो ही जाते हैं।"
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समाप्त


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