पापा कमाने मे और मम्मी चुदवाने मे व्यस्त
"हैविंग फन मॉम, हुंह!" वैशाली के कानों मे जब यह मर्दाना आवाज गूंजी, एकाएक उसका सम्पूर्ण शरीर सुन्न पड़ जाता है। जिस विशेष नाम से उसे पिछले बाईस सालों से पुकारा जा रहा था, वह मर्दाना आवाज उसके इकलौते बेटे के अलावा और किसकी हो सकती थी?

"इसका मतलब पापा फिर से टूर पर चले गए, हम्म! तभी स्वीट ममा मैस्टबेट करके अपना गुस्सा जता रही हैं, वह भी यूं खुलेआम" अपनी माँ को सम्बोधित करता अभिमन्यु का यह लगातार दूसरा अश्लील कथन था और अपने इस दूसरे कथन को कहकर फौरन वह अपनी आँखें वैशाली के चेहरे से हटाकर उसकी नंगी जांघों की जड़ से जोड़ देता है। उसकी माँ के बाएं हाथ की तीन उंगलियां उसकी झांटों से भरी चूत की गहराई मे भीतर तक घुसी हुई थीं और बाएं हाथ के अंगूठे और प्रथम उंगली के बीच उसकी माँ ने ब्लाउज के ऊपर से ही अपने दाहिने निप्पल को मरोड़ा हुआ था, जो कि साफ दर्शा रहा था कि ब्लाउज के अंदर उसने कोई ब्रा नही पहन रखी थी।

अपने जवान बेटे की आश्चर्य से फट पड़ी आंखों को अपने नंगे निचले धड़ से चिपके देख अकस्मात वैशाली होश मे आई और तत्काल अपने बाएं हाथ को अपने दाहिने निप्पल से हटाकर उसने सर्वप्रथम अपनी अधखुली साड़ी को पेटीकोट समेत नीचे खींचने का प्रयत्न किया मगर हड़बडी़ मे यह भूल गई कि उसके दाएं हाथ की तीनों उंगलियां अब भी उसकी चूत के भीतर घुसी हुई थीं।

"त ...तु ...तुम घर के अंदर कैसे आए? कॉलेज! क ...कॉलेज से इतने जल्दी" तीव्रता से अपने सिर को ऊपर उठाकर वैशाली अपने निचले धड़ की वर्तमान हालत पर गौर करते हुए हकलाई। अपने पहले ही प्रयत्न मे बिस्तर पर लेटी वह माँ अपने निचले नंगे धड़ को अपनी मांसल जाघों के अंत तक ढांकने मे सफल रही थी, साथ ही इसके उपरान्त उसने अपने उसी बाएं हाथ की मदद से अपना पल्लू भी अपने ब्लाउज पर रख लिया था।

"अचानक तुम इतनी घबरा क्यों गईं? अपनी माँ के प्रश्नों के जवाब ना देकर अभिमन्यु उलटा उसीसे सवाल पूछ लेता है, उसके चेहरे पर एक ऐसी दुष्ट हँसी पनप चुकी थी जिसे देखकर वैशाली शर्म से पानी-पानी हो जाती है। वह अपने जवान बेटे के समक्ष यूं खुलेआम मुट्ठ मारते हुए पकड़ी गई थी और ऐसी शर्मनाक परिस्थिति मे भी जानबूझकर बेटे द्वारा माँ की घबराहट के विषय मे पूछना उसके लिए उस शर्मनाक परिस्थिति से भी कहीं अधिक शर्मसार कर देने वाला क्षण था। वह गूंगी हो गई थी, एक शब्द तक उसके मुंह से बाहर नही आ सका था।

"घबराने की कोई जरूरत नही माँ, वैसे भी यह पहली बार नही जो मैंने तुम्हें मैस्टबेट करते हुए देखा है" अपनी माँ का हलक चिपकता महसूस कर अभिमन्यु ने अत्यंत-तुरंत एक और विस्फोट कर दिया और हँसते हुए वह बिस्तर पर वैशाली की अधनंगी टांगों के समीप ही बैठ जाता है।

"कब देखा? नही! नही! ऐसा नही हो सकता। आज से पहले नही ...तुम झूठ बोल रहे हो मन्यु" बेटे के दूसरे विस्फोट पर वैशाली ने चौंकते हुए कहा और साथ ही वह उससे उसके पिछले कथन का स्पष्टीकरण भी मांगती है। हालत का खेल था जो महज एक गलती पर आज बेटा स्वयं अपनी माँ पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहा था, उसे प्रत्यक्ष शर्मिंदा कर रहा था मगर फिर भी वैशाली पूरी तरह से आश्वस्त थी कि अभिमन्यु साफ झूठ कह रहा है।

"घर-घर की यही कहानी है मम्मी! पति को पैसे कमाने से फुर्सत नही, बीवी उंगलियों से काम चला रही है और मजे कोई तीसरा शख्स आकर ले जाता है। खी ..खी ..खी ..खी" पुनः अपनी माँ के प्रश्न का उत्तर देने की बजाय अभिमन्यु ने नया राग अलाप दिया, उसकी दुष्ट हँसी बिलकुल उसके अश्लील संवादों की ही परिचायक थी।

"बेशर्म! ऐसा कहीं नही होता, अपनी माँ के सामने इस तरह की गंदी बात कहते हुए तुम्हें ....." क्रोध से तिलमिते हुए वैशाली अपना यह कथन पूरा कर पाती, इससे पहले ही अभिमन्यु उसे टोक देता है।

"हाँ मॉम! लज्जा आज कॉलेज नही आई वर्ना उसे तुमसे मिलवाने आज मैं घर लाने वाला था। अम्म! ठीक ही हुआ जो वह ऐब्सन्ट थी, नही तो ...." हँसते हुए अपने दांए हाथ से उसने अपनी माँ की अस्त-व्यस्त हालत की ओर इशारा किया और कहीं ना कहीं उसका यह नटखटी संकेत वैशाली की समझ मे भी आ जाता है मगर इस बार उसके चेहरे पर ना ही क्रोध था और ना ही शर्म, वह हौले से मुस्कुरा उठी थी।

"हँसी तो फँसी! हे ..हे ..हे ..हे, खैर गुस्सा ना करो तो तुम्हारे पिछले सवाल का जवाब देता हूँ। मैं पहले भी कई बार तुम्हें मैस्टबेट करते हुए देख चुका हूँ पर शायद आज की तरह उन बीते शोज़ को कभी अॉडियन्स का इंतजार नही रहा था" कहने को अभिमन्यु ने अपना यह कथन पूरा तो कर दिया था मगर साथ ही एकाएक उसके टट्टे भी कड़क हो गए थे। कुछ उत्तेजना कि उसके ठीक सामने बिस्तर पर लेटी उसकी माँ का दायां हाथ अब भी उसकी नंगी चूत से चिपका हुआ है या ऐसा भी हो सकता है कि उसकी तीनों उंगलियां अबतक ज्यों की त्यों उसकी चूत के भीतर घुसी हुई हों। कुछ स्वीकारने का भय कि वह छुप-छुपकर अपनी माँ को मुट्ठ मारते हुए देखता है और उसने उसपर पर यह इल्जाम भी लगा दिया कि उसकी माँ आज जानबूझकर यूं खुलेआम मुट्ठ मार रही थी ताकि अपने जवान बेटे के हाथों पकड़ी जा सके।

"चोर-उचक्के कहीं के! तुम मेरी जासूसी करते हो, अपनी माँ की जासूसी, जिसने तुम्हें पैदा किया अपनी उस सगी माँ की जासूसी। उफ्फ! क्या करूँ मैं इस बेशर्म का। मन्यु! यू हर्ट मी, यू रियली हर्ट योर मदर" वैशाली जैसे बरस पड़ी, अपने बेटे को चमाट लगाने के लिए वह फौरन बिस्तर से उठना चाहती थी पर उसे यह भी ख्याल था कि उठकर बैठने से पूर्व उसे अपने दाहिने हाथ को उंगलियों समेत अपनी नंगी चूत की पहुंच से दूर करना पड़ेगा, यहां तक कि हाथ अपनी साड़ी से भी बाहर निकालना होगा। कहीं उसके ऐसा करने से उसके बेटे को यह आभास ना हो जाए कि उसकी माँ उसके साथ बातचीत जारी रहने के दौरान भी अपनी चूत से खेल रही है, उंगलियों के अलावा उसका पूरा दाहिना पंजा उसकी चूत से उमड़े कामरस से भीगा हुआ था और जो उसके हाथ के साड़ी से बाहर आने के उपरान्त निश्चित ही उसके समीप बैठे अभिमन्यु को नजर आ जाता।

"चलो यह जासूसी वाली बात तुमने खुद ही मान ली तो मैंने तुम्हें माफ किया मगर तुम मुझपर, अपनी माँ पर ऐसा दोष कैसे लगा सकते हो कि मैंने तुम्हें, अपने सगे बेटे को रिझाने के लिए अपने कपड़े उतार फेंके?" अभिमन्यु के चेहरे की हवाइयां उड़ी देख वैशाली अपना अगला कथन और उसमे शामिल प्रश्न बेहद शांत स्वर मे पूरा करती है।

अभिमन्यु भी उन्हीं अनगिनती जवान होते मर्दों मे शामिल था जिनसे विपरीत लिंग का आकर्षक जरा-सा भी नही झेला जाता, जिनके मन-मस्तिष्क मे जनाना अंगों के सिवाय कुछ अन्य घूमता ही नही है। एक पढ़ी-लिखी समझदार औरत होने के नाते वैशाली अपने बेटे के इस लाइलाज मर्ज को बहुत पहले ही समझ चुकी थी, उस माँ की चौकस व परिपक्व आँखों को अभिमन्यु की बेचैनी की मुख्य वजह दर्जनो बार सबूत सहित देखने मिली थी। न्यूड मैगजीन्स, इंटरनेट पॉर्न, रोलप्लेज़, सैक्स चैट यहां तक की कई बार उसने अपने बेटे की मौजूदगी को परदे के पीछे, बंद दरवाजे की निचली सांस और की-होल आदि से महसूस किया था और वह भी तब जब वह मुट्ठ मारने या नहाने-धोने जैसे एकांत कार्यों मे व्यस्त रहा करती थी।

"और सैक्स की जिन गंदी-गंदी कहानियों को पढ़कर कुछ देर पहले तुम अपनी माँ को अपने बहतरीन सामाजिक ज्ञान का एक बढ़िया--सा एक्जाम्पल दे रहे थे, तो बेटा जी! वह पति, उसकी बीवी और उस तीसरे शख्स को तुम्हें उन्हीं कहानियों मे जाकर दोबारा खोजना चहिए क्योंकि इस घर की कहनी तुम्हारे ज्ञान के मुताबिक कभी नही होगी" जब अभिमन्यु उस शर्मसार हालत मे पहुँच गया जिस हाल से कुछ वक्त पीछे उसकी माँ जूझ रही थी तब वैशाली अपने बाएं पैर के अंगूठे से उसकी कमर को गुदगुदाते हुए बोली।

"एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी, हम्म! तो तुम्हें बारे मे पूरी जानकारी है। सॉरी मम्मी! पर मैंने सोचा था कि लाइफ मे पहली बार मौका लगा है तो क्यों ना मैं भी तुमसे माफी मंगवा लूं" अभिमन्यु गुदगुदी के अहसास से बिस्तर पर लोट लगाते हुए बोला।

"कैसी माफी और किस बात की माफी?" बिस्तर पर लोट लगाते अभिमन्यु के चूतड़ के नीचे वैशाली की काली कच्छी दबी हुई थी और जिसपर नजर पड़ते ही यौवन से भरपूर उस अत्यंत कामुक माँ की रुकी हुई उत्तेजना मे एकाएक पुनः उबाल आ गया, एक ऐसा अमर्यादित क्षण कि सभ्य और संस्कारी वैशाली बिना कच्छी के अपने जवान बेटे के समक्ष विचरण कर रही है।

"तुम्हारी दोस्त मिसिज मेहता की झूठी शिकायत को शायद तुम भूल गई मॉम, जिसकी वजह से तुमने बेवजह मेरी पॉकेटमनी बंद कर दी और घर से बाहर जाना बंद किया सो अलग" अभिमन्यु ने उसे बीस दिनों पहले बीती घटना को याद दिलाते हुए कहा।

"झूठी वह नही तुम हो, वह तो शुक्र करो कि तुम्हारी गंदी करतूत तुम्हारे पापा तक नही पहुँची वर्ना हमेशा के लिए तुम्हें घर से बाहर निकाल देते" बोलते हुए वैशाली की नजर अब भी बेटे के चूतड़ के नीचे दबी अपनी कच्छी पर थी।

"तुम ऐसी गलत हरकत कैसे कर सकते हो मन्यु? हम बहुत पुराने दोस्त है, तुम्हारी माँ समान है वह" उसने अपने पिछले कथन मे जोड़ा और इस पूरे घटनाक्रम मे पहली बार बेटे की मौजूदगी मे ही उसके दाएं हाथ की तीनों निर्जीव उंगलियां उसकी नंगी चूत के भीतर एकदम से सजीव हो उठती हैं।

"मैंने नही चुराई उनकी पेंटी, मैं पहले भी कई बार सफाई दे चुका हूँ" अभिमन्यु की तेज व उत्साहित मर्दाना आँखें तुरंत ताड़ जाती हैं कि साड़ी के भीतर घुसे उसकी माँ के दाहिने हाथ मे अचानक से हलचल होनी शुरू हो गई है, जिसके परिणाम स्वरूप वह बिना किसी अतिरिक्त झिझक के अपनी माँ के अधनंगे बाएं पैर को उठाकर उसे सीधे अपनी गोद के बीचोंबीच रख लेता है

"बिलकुल ठीक कहा तुमने, उसी सफाई के कारण ही तुम्हारी मेहरा आंटी की पेंटी आज मुझे तुम्हारे स्टडी ड्रॉअर मे मिल गई" वैशाली के कथन को सुन अभिमन्यु के पसीने छूट गए। अपने जिस तने हुए लंड की कठोरता का स्पर्श वह अपनी माँ के बाएं तलवे से करवाने का इच्छुक था, उसकी कठोरता शीघ्रता से घटने लगती है।

"चलो इस गलती के लिए भी मैंने तुम्हें माफ किया पर क्या तुम मुझे यह समझाओगे कि तुम्हें अपनी उम्र की लड़कियों मे दिलचस्पी क्यों नही है?" वैशाली ने पूछा और अपना बायां हाथ वह पुनः अपने दाएं मम्मे पर रख लेती है। शिकार और दाना! यह दोनो शब्द अर्थ मे भले ही एक-दूसरे से कितने अलग क्यों ना हों मगर फिर भी इन्हें समानार्थक शब्दों मे गिना जाता है, ठीक उसी तरह यदि अभिमन्यु के मन-मस्तिष्क को भेदना था तो उसके लिए वैशाली को सीधे उसकी जवान फितरत पर वार करना था और जो वह हौले-हौले करने भी लगी थी।

"हर किसी की अपनी अलग फैंन्टसी होती है। मुझे अपनी एज की गर्ल्स पसंद नही यह तुम्हें किसने कहा? मुझे लड़कियां पसंद है मगर भाभी टाइप और खासकर मॉम्स टाइप मे मेरे दिलचस्पी थोड़ी ज्यादा है। यू नो मम्मी, 'एम आई एल एफ' टाइप्स?" अभिमन्यु के चेहरे पर पसरा भय पलभर मे हवा हो गया जब उसकी माँ ने उसकी इस गंदी हरकत के लिए भी उसे फौरन माफ कर दिया और तभी वह अपनी कल्पना, अपनी निजी फैन्टसी को वैशाली के साथ सांझा करने से पीछे नही हट पाता।

"मॉम आई वुड लाइक टू फक" वैशाली अत्यंत तुरंत बेशर्मी से बोली मगर अंदर ही अंदर उसे कितनी अधिक शर्म का अनुभव हो रहा था यह उसकी कामुक अवस्था या वह स्वयं ही जान सकती थी।

"सही कहा मम्मी! कभी-कभी तुमपर मुझे बहुत ज्यादा प्यार आ जाता है। यू नो! मेरे किसी दोस्त की मॉम इतनी समझदार नही और हमारे जैसा कूल रिलेशनशिप भी किसी और का नही हो सकता" अपनी माँ के मुंह से 'फक" शब्द का उच्चारण सुन अभिमन्यु के सम्पूर्ण शरीर मे सुरसुरी छूटने लगी थी। वाकई उसकी माँ उसके सभी दोस्तों की माओं से बैस्ट थी और इस बात से हमेशा ही उसे खुद पर फक्र होता आया था।

"सो! तुम्हारी फैन्टसी मे तुम्हारी अपनी माँ का क्या रोल है" वैशाली अपनी साड़ी के पल्लू को अपने ब्लाउज पर से हटाते हुए पूछती है, उसके दाएं हाथ का अंगूठा उसकी चूत के फूले हुए भांगुर को छेड़ने लगा था।

"क्या तुम मेरे साथ, अपनी सगी माँ के साथ सैक्स करना चाहते हो? क्योंकि मुझे पता है मिसिज मेहरा की पेंटी तुमने किस कारण से चुराई थी। मैं भी तो उसी की तरह ही एक 'एम आई एल एफ' हूँ, अगर तुम्हें ऐसा लगता हो तो वर्ना मैं कितनी बूढ़ी हो चुकी हूँ मुझे पता है" अभिमन्यु के साथ वैशाली भी अपने तात्कालिक कथन पर चौंक उठी थी। वह हैरत से अपनी साड़ी के भीतर छुपे अपने दाहिने हाथ की हलचल को घूरती है, जोकि सचमुच साड़ी के ऊपर से उसके द्वारा अपनी चूत सहलाने का स्पष्ट दृश्य दर्शा रहा था। उस कुंठित माँ की उत्तेजना उस वक्त एकदम से शीर्ष पर पहुँच जाती है जब अपनी बेशर्मी को सफा त्यागकर वह अपने बाएं हाथ के अंगूठे और प्रथम उंगली के बीच खुल्लम-खुल्ला ब्लाउज के अंदर कैद अपने दाहिने निप्पल को बलपूर्वक जकड़ लेती है, अपने बेहद ऐंठे चुके निप्पल को तेजी से मसलने लगती है।

अपनी माँ के कथन और उसमे शामिल प्रश्न को सुन अभिमन्यु गहरी सोच मे पड़ जाता है। कैसे उसकी मर्यादित माँ उसकी आँखों के समक्ष ही अपने अधनंगे बदन से खेल रही थी, वह चाहकर भी वैशाली की अश्लील हरकत पर से अपनी अचरज भरी नजरें हटा नही पाता। सच कितना कड़वा होता है, वह स्वयं भी तो अपनी उत्तेजना के हाथों हमेशा हारता आया था फिर उसकी माँ कौन--सी दूसरे किसी ग्रह की प्राणी थी? मनुष्य चाहे कितनी तरक्की कर ले, लाख रोगों के इलाज ढ़ूँढ़े जा चुके हैं पर कामरोग का इलाज कोई ढ़ूँढ़ सका है भला? वह पुनः वैशाली के अधनंगे पैर को बिस्तर से उठाकर अपनी गोद के बीचोंबीच रख लेता है ताकि अपनी माँ के नंगे तलवे से अपनी पेंट के भीतर फड़फड़ाते अपने बेहद तने हुए लंड का स्पर्श करवा सके, उसके ऐसा करते ही जहां उसका लंड क्षणमात्र मे ही ठुमकी पर ठुमकी लगने लगता है वहीं वैशाली फौरन अपनी आँखें मूंद लेती है।

अपने बेटे की इन्हीं बेशर्म व ओछी हरकतों से आज वैशाली को सरेआम लज्जित होना पड़ रहा था। वह अभिमन्यु से उम्रदराज थी, परिपक्व थी, रिश्ते मे उसकी सगी माँ थी और यह अच्छे से जानती थी कि अपनी जिस निर्मल, निष्कलंक छवि का वह प्रत्यक्ष हनन कर रही है उसे कदापि उचित नही ठहराया जा सकता है। अपनी कामुत्तेजना को ढ़ाल बनाकर वह अपने इकलौते पुत्र के अंतर्मन को खंगालने की प्रयासरत थी, यह विध्वंश्क सत्य जानने की इच्छुक कि उसकी जन्मदात्री उसकी अपनी माँ के प्रति उसके विचार कितने निष्छल, निष्कपट और निस्वार्थ है। अपनी आँखें मूदकर उसने अपने मुट्ठ मारने की धीमी गति को एकाएक तीव्रता प्रदान कर दी ताकि अभिमन्यु की रही-सही झिझक का भी पूर्ण रूप से अंत हो जाए, बस उसके द्वारा पूछे गए प्रश्न का जवाबभर उसे मिल जाए फिर वह निर्णय ले सकेगी कि भविष्य मे उसे और क्या-क्या व कैसे-कैसे बदलावों से गुजरना होगा। वह यह भी सोच चुकी है कि यदि उसका बेटा सचमुच उसके साथ कौटुंबिक व्यभिचार करने का इच्छुक हुआ तो परिणामस्वरूप उसके अपना मुंह खोलते साथ ही उसे अपनी माँ के करारे थप्पड़ का सामना करना पड़ेगा और जो निश्चित उसकी घरनिकासी तक भी जा सकता था।

"मैं तुम्हारे साथ सैक्स नही करना चाहता मम्मी मगर ......" काफी सोच-विचारने के उपरान्त अभिमन्यु ने अपना अंतिम और निर्णायक फौसला सुना दिया, जिसे सुनकर वैशाली भी तत्काल अपनी मुंदी हुई आँखें खोल देती है। उसकी प्रसन्नता का कोई पार नही था जब उसे उसके बेटे द्वारा सकारात्मक उत्तर की प्राप्ति हुई लेकिन ज्योंहि उसकी नजर बेटे के चूतड़ के नीचे पूर्व से दबी अपनी कच्छी पर पड़ी उसकी प्रसन्नता मानो हवा हो गई। उसके अपनी आँखें मूंदने के पश्चात अभिमन्यु उसकी कच्छी को गायब कर चुका था और अपने इस घ्रणित कार्य को उसने बड़ी सफाई से अंजाम दिया था, जिसकी जरा--सी भी भनक आँखें मूंदे लेटी वैशाली को नही हो पाई थी।


"मगर क्या? हूं!" अपने नंगे बाएं तलवे पर अपने जवान बेटे के पूर्ण विकसित कठोर लंड का घिसाव वैशाली को अजीब-सी संसनाहट से भरने लगा था पर उस घिसाव और उससे पैदा होती संसनाहट को भुलाकर वह बेटे से ऊसके अधूरे उत्तर का स्पष्टीकरण मांगती है। अपनी तीन उंगलियों से निरंतर तेजी--से अपनी चूत को चोदती उस अत्यंत सुंदर माँ ने अपनी आँखें खेलने के उपरान्त भी अपनी अश्लील कार्यवाही को बंद नही किया था अपितु अपने दाएं निप्पल को भी वह लगातार बलपूर्वक उमेठे जा रही थी।

"मगर मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ, तुम्हें अपना सबसे करीबी दोस्त बनाना चाहता हूँ" कहते हुए अभिमन्यु वैशाली के बाएं अधनंगे पैर की घुटनों तक मालिश करना शुरू कर देता है। उसकी जवान आँखें अपनी माँ के प्रत्यक्ष मुट्ठ मारने का लुफ्त उठ रही थीं, ऐसा आनंद तो उसे तब भी कभी नही आया था जब वह छुप-छुपाकर उसे पूरी तरह से नंगी होकर मुट्ठ मारते हुए देखता था। विपरीत लिंगाकर्षण के अद्भुत प्रभाव ने उस नये-नवेले मर्द को यहां तक गिरा दिया था कि वैशाली को नग्न देखने का वह कोई मौका अपने हाथ से जाने नही देता था, फिर चाहे उसकी माँ बाथरूम मे नहाए या जबतब अपने पति से चुदवाए।

"क्या मैं तुम्हें माँ रूप मे अच्छी नही लगती जो तुम मुझ बूढ़ी को अपना सबसे खास दोस्त बनाना चाहते हो?" बेटे के बलिष्ठ हाथों की मालिश से हौले-हौले खुद को चरम पर पहुँचते महसूस कर वैशाली ने पूछा।

"इश्श्श्श्! यह क्या कर रहे हो मन्यु? उफ्फ! माँ को ...माँ को दर्द हो रहा है बेटा" हस्तमैथुन और बेटे की मालिश से उत्पन्न होती उत्तेजना को पीड़ा का नाटकीय रूप देती वह कामुक अधेड़ माँ जोर-से सिसियाते हुए बोली।

"नाटक मत करो मॉम, मुझे पता है कि तुम्हें कोई दर्द-वर्द नही हो रहा। खैर हम अगर बैस्ट फ्रेंड बनते है तो उससे हमे बहुत फायदे होंगे। एक-दूसरे से हमारी शर्म खत्म हो जाएगी, अपनी बॉडी की जरूरतों को हमे छुप-छुपाकर पूरा नही करना पड़ेगा। हम दोनो अडल्ट हैं, तुम भी जानती होगी कि मैं भी मैस्टबेट करता हूँ। तुम जानती हो ना माँ?" वैशाली के बाएं पैर को दाएं से दूर खींच अभिमन्यु ने उनके बीच एक निश्चित चौड़ाई उत्पन्न करते हुए पूछा। उसकी इस शर्मनाक हरकत के नतीजन उसकी माँ की साड़ी उसके पेटीकोट समेत उसकी ढ़की हुई मांसल जांघों के काफी ऊपर तक पहुँच जाती है, इतने ऊपर कि अब वह अपनी माँ के दाएं हाथ की तीव्रता से हिलती हुई कलाई को साफ देख सकता था।

"रुक जा वैशाली, यहीं रुक जा अब भी कुछ नही बिगड़ा। तेरे बेटे के विषय मे तू पहले से ही वह सबकुछ जानती है, जिसे जानने का स्वांग रचकर बस तू अपनी शारीरिक कामिच्छा की पूर्ति करने का उद्दंडित प्रयास कर रही है" सहसा वैशाली के कानों मे उसके अंतर्मन की यह नैतिक आवज गूंजने लगी मगर अब उस आवाज से मोल-भाव करने का वक्त बीत चुका था, तेजी-से अपनी चूत के भीतर अपनी उंगलियां हिलाती अपने पति द्वारा तिरस्कृत वह विवाहित माँ अपने अंतर्मन को यह सोचकर फौरन झुठला देती है कि उसके बेटे से उसकी पूछताछ अभी पूरी नही हो पाई है।

"उन्ह! तुम एक निहायती बेशर्म और गंदे लड़के हो मन्यु, जब तुम जानते हो कि तुम्हारी माँ तुम्हारे रग-रग से वाकिफ है फिर भी तुम यदि उसके ही मुंह से सुनना चाहते हो तो सुनो। हाँ मुझे तुम्हारी मुट्ठ मारने की घिनौनी हरकत का पता है ...ओह! उन्ह! और यह भी पता है ...उन्ह! कि मेरा बद्तमीज बेटा कभी-कभार अपनी माँ को सोचकर ही मुट्ठ मारा करता है" अब वैशाली नही मात्र उसकी उत्तेजना बोल रही थी। सिसकियां लेते हुए वह पहले से कहीं ज्यादा तीव्रता से अपनी उंगलियां अपनी निरंतर रस उगलती चूत के अंतर-बाहर करने लगी थी, जिसकी संकीर्ण गहराई मे एकाएक अधिक से अधिक गाढ़ कामरस उमड़ने लगा था। उसके निप्पल बुरी तरह से ऐंठ गए थे और साथ ही उसकी गांड के छेद मे अविश्वसनीय सिरहन की लंबी-लंबी लहरें दौड़ना शुरू हो गई थीं, कुल मिलाकर वह स्खलन से पूर्व महसूस होने वाली आनंदमयी तरंगों मे पूर्णरूप से खो चुकी थी।

"हाय मम्मी! तुम मेरे, अपने इकलौते बेटे के बारे मे इतना गलत सोचती होगी, मुझे बिलकुल नही पता था लेकिन कोई बात नही, अब हम बैस्ट फ्रेंड जो बन गए हैं। इसके अलावा मुझे लगता है कि हमें अपनी न्यूडिटी को भी कोई खासी वेल्यू नही देनी चाहिए बल्कि मैं तो कहूंगा कि अगर हमारे बीच अच्छी अंडरस्टेंडिंग है तो हम अपने मनमाने ढंग से घर मे रह सकते हैं" अपनी माँ की कामुक सिसकियों से भड़के जवान अभिमन्यु ने बेखौफ उसे अपनी उम्र मुताबिक ही अपनी कामलुलोप इच्छाएं बतना जारी रखा। फिलहाल तो बस उसे वैशाली से गहरी दोस्ती निभाने की चाह थी, एक इतनी गहराई युक्त दोस्ती जिससे वह दोनों एक-दूसरे से अपना कोई राज ना छुपा सकें और उनके मर्यादित रिश्ते मे हर संभव खुलापन आ सके। वह उसके साथ कोई जबरदस्ती नही करना चाहता था, वह चाहता था कि उसकी माँ खुद उसे आमंत्रित करे, उसे ललचाए और अगर वह स्वयं ऐसा करती है तब वह उसकी मर्जी से उसे जरूर चोदेगा।

"तो क्या ...तो क्या न्यूडिटी से तुम्हारा यह मतलब है कि घर पर मैं तुम्हारे सामने नंगी रहा करूं? तुम्हारी अपनी सगी माँ। ओह मन्यु! तुम सच मे एक घटिया सोच रखने वाले लड़के हो, उन्ह! उन्ह! अपनी मॉम ...आह! अपनी मॉम को घर मे नंगी होकर काम करते देख तुम्हें शर्म नही आएगी बेशर्म लड़के। उफ्फ! मैं घर मे नंगी घूमूं, जबकि मेरे साथ मेरा अपना जवान बेटा भी घर मे मौजूद हो। आह! मन्यु आह! क्या बेहुदा चाहत है तुम्हारी" वैशाली स्खलन के बेहद करीब पहुँचते हुए फुफकारी। एक तो बेटे की उपस्थिति और ऊपर से उसकी वर्जित व निषिद्ध चाहतों ने उस अबतक रही संस्कारी माँ को स्वयं निर्लज्ज बना दिया था। अभिमन्यु की सुर्ख लाल आँखों मे खुद अपनी आँखों समान तैरती वासना देख बिस्तर पर लेटी खुल्लम-खुल्ला मुट्ठ मारती वह शिष्ट माँ घबराहटवश अपना बाएं हाथ अपने कड़क निप्पल से हटाकर अत्यंत-तुरंत उसे अपने बेटे की ओर बढ़ा देती है।

"ओह! मन्यु, जब तुम्हारी बेशर्म माँ को तुम्हारे सामने यू खुलेआम मुट्ठ मारने मे शर्म महसूस नही हो रही तो क्या पता कल से वह सचमुच ही घर मे नंगी ना घूमने लग जाए और क्या पता कि आह! आह! आह! कि आगे वह तुमसे चु ......" अभिमन्यु ने ज्यों ही अपनी माँ के बाएँ हाथ को थामा, उसकी आँखों मे देखते हुए वह तीव्रता से झड़ पडी़।

"उफ्फ! मन्यु उफ्फ! आहऽऽऽऽऽऽ! आहऽऽऽऽ! अभिमन्यु मैं गई" पूरा बेडरूम वैशाली की सीत्कारों से गूंज उठा।

"कोई नही मॉम, कोई बात नही। मैं हूँ ना यहाँ, तुम्हारा बेटा तुम्हारे पास ही है घबराओ मत" कहते हुए अभिमन्यु अपनी माँ का कांपता बाएँ हाथ अपने दोनो पंजों से सहलाने लगता है।

"फिकर मत करो, मैं तुमसे सैक्स नही करना चाहता। आहां! नेवर मॉम और तुम कोई बेशर्म नही हो, बेशर्म तो मैं हूँ देखो जिसने तुम्हें रुला दिया, अपनी बैस्ट फ्रेंड को रुला दिया" कुछ मनभावन स्खलन और कुछ आंतरिक लज्जा के प्रभाव से वैशाली की आँखे बहने लगी थीं जिन्हें देख अभिमन्यु भी लगभग रोने-सा लगता है। भले ही वह जवान था, कई बार चुदाई कर चुका था मगर जिस तरह के अद्भुत, अकल्पनीय स्खलन को वह अभी तत्काल मे देख रहा था मानो उसका सम्पूर्ण शरीर एक अनजाने भर से थरथरा उठा था। उसके लंड की कठोरता सुन्न-सी हो चुकी थी, माथे से बहकर पसीना उसके गालों से होता हुआ उसकी शर्ट भिगोने लगा था।

स्खलन के दौरान वैशाली की पीठ एकाएक बिस्तर से ऊपर को उठ गई, उसके चेहरे पर गहन पीड़ा के भाव उमड़ आये थे, चीखते हुए वह रोने लगी थी, उसके शारीरिक कंपन की तो कोई सीमा ही नही रही थी और जिसे प्रत्यक्ष इतने नजदीक से देख सहसा अभिमन्यु के जबड़े जोरों से भिंच गए जैसे अपनी माँ के स्खलन के आनंद को वह दर्द स्वरूप स्वयं महसूस करने लगा था।

कुछ देर तक हांफते रहने के उपरान्त वैशाली का ऐंठा हुआ शरीर स्थिर हो गया और ज्यों ही वह शांत हुई, अभिमन्यु फौरन उसकी साड़ी को नीचे खींच उसके घुटनों तक ढांक देता है ताकि स्खलन के साथ बाहर आए अपने कामरस को देख पुनः उसकी माँ को लज्जा का सामना नही करना पड़े। वैशाली ने जब यह देखा तो उसकी नम आँखें उसके बेटे की नम आँखों से जा टकराईं और यही वह क्षण था जब क्रोधित या शर्मिंदा होने की बजाए वह अभिमन्यु को अपने बाएं हाथ से अपनी ओर खींचते हुए उसे अपने सीने से चिपका लेती है।


"लो जी करलो बात! मै तो तुम्हें काफी डेरिंग लड़का समझती थी जो कुछ दिनों पहले मेरी दोस्त, यानी कि अपनी माँ समान औरत के बाथरूम से उसकी यूस्ड पेंटी तक चुरा लाया था पर तुम तो चूहा निकले" वैशाली अपने बाएं हाथ से अभिमन्यु की पीठ सहलाते हुए बोली, उसके चेहरे पर बेहद सुंदर--सी मुस्कान छा गई थी।

"और पता है इस चूहे की सजा क्या है? उसने उसे अपने सीने से हल्का सा दूर करते हुए पूछा।

"हम्म! क्या है सजा बोलो?" अभिमन्यु धीरे से फुसफुसाया, वह अबतक अपनी माँ के उस अद्भुत स्खनल के अलावा कुछ भी अन्य सोचने-विचारने मे असमर्थ था और उसके चेहरे पर छाई परेशानी व घबराहट देख वैशाली के मन मे एकदम से कुछ ऐसा अजीब कार्य करने की इच्छा जाग्रत हुई, जो उसके माँ होने की छवि को पुनः दागदार कर दे। उसने अभिमन्यु के होंठों को चूमने का निर्णय लिया पर फिर अचानक दूसरा ख्याल मन मे आते ही उसके चेहरे पर व्याप्त उसकी सुंदर--सी मुस्कान एक दुष्ट मुस्कान मे परिवर्तित हो जाती है।

"तुम्हें तुम्हारी यह शर्ट अपने हाथों से धोनी पड़ेगी, मंजूर?" वैशाली ने पूछा तो अभिमन्यु हैरत मे पड़ गया।

"यह कैसी सजा हुई मॉम? मैंने तो सोचा था कि इसबार तुम मुझे सीधे घर से बाहर निकाल देने से कम सजा नही दोगी या फिर मेरे अगले महीने की पॉकेटमनी पर भी रोक लगा दोगी" अभिमन्यु ने उल्टा उससे प्रश्न किया।

"ऊंहूं! यह सजा उससे भी बड़ी है शैतान लड़के" हँसते हुए ऐसा कहकर वैशाली अपने दाएं हाथ को अपनी साड़ी से बाहर निकाल लेती है। उसका पूरा पंजा उसके गाढ़े व चिपचिपे कामरस से भीगा हुआ था और जिसे अपने बेटे की अचरच से फट पड़ी आँखों मे झांकते हुए वह नई-नवेली बेशर्म माँ उसकी शर्ट से पोंछने लगती है। दाईं छाती पर अपनी लिसलिसी उंगलियों को रगड़ने के उपरान्त बाकी बचा कामरस उसने दाईं छाती से पोंछ डाला।

"उफ्फ मम्मी! तुम कितनी डर्टी हो। छी! छी! छोड़ो मेरी शर्ट को यू नॉटी बिच" अभिमन्यु भी हँसते हुए बोला, वह फौरन वैशाली के गीले दाएं हाथ से दूर होने का झूठा प्रयास करने लगता है। उसकी नाक के दोनों नथुए उसकी माँ के कमरस की मादक सुगंध से तुरंत फूल गए थे, स्खलन के चरम को छू लेने के बाद उसका चेहरा पूरनमासी के चाँद--सा दमक उठा था जिस कारण अभिमन्यु की खोई उत्तेजना दोबारा लौट आती है और अपनी उसी उत्तेजना के मद मे वह कब अपनी माँ के संबोधन मे 'बिच' जैसे गंदे शब्द को शामिल कर लेता है इसका ख्याल जबतक उसे हो पाता तब तक काफी देर हो चुकी थी

"तो मैं कुतिया हूँ? घटिया इंसान, चलो अब जाओ यहाँ से, माफ किया" वैशाली ने मुस्कान के साथ कहा। उसके लगातार अभिमन्यु की छोटी-बड़ी गलतियों को यूं ही हमेशा से माफ करते जाने का परिणाम था जो आज उसे अपने इकलौते बेटे के मुंह से एक कुतिया की संज्ञा प्राप्त हुई थी और इसपर भी जैसे फौरन उसने उसे माफ भी कर दिया था, अजीब तो था मगर जानकर भी वह उस अजीब शब्द के हँसी-हँसी मे भुला देती है।

बिस्तर से नीचे उतरने से पूर्व अभिमन्यु ने वैशाली के माथे का एक छोटा--सा चुम्बन लिया और फिर बिना उसकी ओर देखे तेजी से उसके बेडरूम के खुले हुए दरवाजे से बाहर जाने लगता है।

"मुझे मेरी पेंटी धुली हुई वापस चाहिए" वह दरवाजे से मात्र दो कदम आगे निकल पाया था कि सहसा अपनी माँ की आवाज और हँसी सुनकर वहीं ठिठक जाता है।

"तुम्हें पता था माँ। ओह मॉम! यू डेम फकिंग नॉटी बिच। खैर तुमने मेरे स्टडी ड्रॉअर से मेहता आंटी की पेंटी चुराई तो मैंने तुम्हारी चुरा ली, हिसाब बराबर। अब यह पेंटी मेरी है" कहकर अभिमन्यु अपनी पैंट के अगले हिस्से के भीतर हाथ डालकर वैशाली की कच्छी को बेशर्मों की तरह वहीं उसके सामने बाहर निकाल लेता है और अपने दाएं हाथ की प्रथम उंगली के ऊपर उसे लपेट गोल-गोल घुमाते हुए हँसकर उसकी नजरों से ओझल हो जाता है। वैशाली स्तब्ध है कि उसके बेटे ने उसकी कच्छी को बिलकुल अपने लंड के ऊपर छुपाया था या शायद उसने उसे सीधे अपनी अंडरवेयर के अंदर रखा था।

"बिच! तूने अपनी इज्जत खुद अपने ही हाथों गवां दी और जो अब कभी वापस नही आएगी" वैशाली बिस्तर पर बैठे हुए यही सोच रही थी।
अपने कमरे के भीतर आकर अभिमन्यु ने दरवाजा लॉक किया और उसी दरवाजे से अपनी पीठ रगड़ते हुए नीचे फर्श पर बैठ जाता है। तत्पश्चात उसने अपने दाएं हाथ मे पकड़ी अपनी माँ की काली कच्छी जोर से फर्श पर दे मारी और अपने दोनों हाथ से अपना चेहरा ढ़ांक कुछ समय पीछे घटे पूरे घटनाक्रम पर सोचने-विचारने लगता है।


"वह बिलकुल सही कहती है, मैं एक निहायती बेशर्म और घटिया इंसान हूँ" वह खुद को कोसते हुए बुदबुदाया।

वैशाली का स्वभाव हमेशा उसके गर्व का कारण रहा था, उसके साथ ही उसकी माँ ने उसकी बड़ी बहन की भी एक--सी परवरिश की थी, कभी कोई अंतर नही। हाँ यह अवश्य था कि बेटा घर का चिराग माना जाता है और इस वजह उसे भी अपने माता-पिता का अतिरिक्त स्नेह प्राप्त था पर इसका यह अर्थ कतई नही कि उन्होंने अपनी बिटिया को कभी अनदेखा किया हो, बल्कि अनुभा की भव्य शादी की गूंज सालभर बाद भी घर की चारदीवारी मे सुनाई देती थी।

पिता मणिक चंद्र जैन! जिसे कभी-कभार अभिमन्यु और अनुभा माणिकचंट गुटखा के नाम से भी संबोधित कर देते थे मगर तब, जब दोनों भाई-बहन एकांत मे वार्तालाप कर रहे हों वर्ना तो पिता के क्रोध मात्र से ही दोनों को अक्सर दस्त लग जाया करते थे। वैशाली को जब अपने पति के बिगड़े हुए नाम का पता चला तो अपने बच्चों पर गुस्सा करने से पहले वह भी दिल खोलकर हँसी थी और जब हँसते-हँसते उसके पेट मे बल पड़ गया तब वह चाहकर भी उन्हें डांट नही पाई क्योंकि अधेड़ उम्र की वह हँसमुख माँ खुद अपने बच्चों की शैतानी मे शामिल हो गई थी।

सिलसिला आगे बढ़ा और देखते ही देखते कब अनुभा अपने ससुराल रुखसत हो गई, घर मे बाकी बचे तीनो सदस्यों को पता ही नही चल पाया। मणिक सरकारी नौकर था, बीटीसी का एक पीजीटी प्रॉफेसर जिसे अक्सर ट्रेनिंग प्रोग्राम्स के चक्करों मे अन्य सरकारी विभागों मे आना-जाना होता था। पहले-पहल इन विजिटों से उसे कोई लगाव नही था, अॉफिस से सीधे घर, घर पर उसकी सुंदर--सी बीवी और दो प्यारे बच्चे, मानो यही उसका पारिवारिक और सामाजिक संसार था। अनुभा की महंगी शादी का खर्च और घर का लोन दोनों से जूझते मणिक को नये पाठ्यक्रम मे एकाएक यह खबर लगी कि बीटीसी के ट्रेनिंग प्रोग्राम की हर छोटी-बड़ी विजिट पर अब अलग से खर्च मिलेगा। टीए डीए, खाना-रहना खर्चा पहले से अधिक था और फर्जी बिल भी जो कि लगभग हर सरकारी विभाग मे मान्य हो जाते है, मणिक ने तब से एक भी विजिट अपने हाथ से नही जाने दी और पिछले सात-आठ महीनों से वह लगातर सिर्फ कमाई करने मे व्यस्त था।

बेटी की विदाई और पति की कमाई से घर सूना सा रहने लगा, सही मायने मे अब घर मे सिर्फ माँ और बेटे ही बचे थे। वैशाली को पति के प्यार की असल कमी भी तभी खलनी शुरू हुई जब मणिक के बगैर उसकी रातें बिस्तर पर महज करवट बदलते रहने मे बीतने लगीं। हर विजिट पर जाने से पहले पत्नी का मुंह लटकते देख चुदाई के शौकीन मणिक का भी कुछ यही हाल था मगर शर्मवश कि मात्र चुदाई के चलते वह हाथ आए पैसे कमाना छोड़ दे, वैशाली ने उसके आने-जाने पर कभी कोई रोक नही लगाई और मणिक भी पत्नी की इस समझदारी को समझ संतोष कर गया। वाकई मणिक पर बहुत कर्जा हो चुका था, उसका आधा जीपीएफ भी उसने अपनी सेवानिवृत्ति से पहले ही निकाल लिया था।

चार से बचे तीन और तीन से बचे दो, जब माँ-बेटे घर पर अकेले रह गए तब वैशाली का पूरा ध्यान अपने बेटे की देखरेख पर केन्द्रित हो गया और तभी से उसे अभिमन्यु की गलत हरकतों के विषय मे पता चलने लगा, गलत हरकतें क्या वही जवान होते हर मर्द की नई-नवेली ख्वाहिशें और उन ख्वाहिशों की खानापूर्ती के जरिए को खोजने की हर संभव तलाश।

जल्द ही वैशाली को बेटे के रोजाना क्रम से मुट्ठ मारने की भनक लगी, नहाने के बाद वह अक्सर लापरवाही से अपने अंदरूनी कपड़े गीले ही बाथरूम के फर्श पर छोड़ जाया करता था और जिन्हें धोते वक्त वह हमेशा ही उन्हें चिपचिप--सा होते पाती थी। उसके बिस्तर की बेडशीट और ओढ़ने की चादर पर भी उसे पीले-पीले गाढ़े दाग लगे नजर आते थे जिसकी सत्यता आसानी से समझना उस विवाहित स्त्री के लिए कोई बड़ी समस्या नही थी। समस्या थी तो सिर्फ अभिमन्यु के नियम से मुट्ठ मारने की गंदी आदत जो की बीतते समय के साथ खुद भी तीव्रता से बढ़ती ही जा रही थी।

एक रोज वैशाली ने मल्टी की छत पर उसे पड़ोस की कामवाली के नंगे मम्मे दबाते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया पर बेटे को समझाने के अलावा वह ठीक से डांट तक नही सकी। उसकी जवान उम्र की प्यास और दोनो मेल-फीमेल की रजामंदी ने उस क्रोधित माँ के क्रोधित मुंह को एकाएक मानो सिल--सा दिया था और परेशान सी वह वापस अपने फ्लैट मे लौट आई थी। कुछ दिनों बाद उस कामवाली ने स्वयं वैशाली से शिकायत की कि अभिमन्यु उसे राह चलते छेड़ता है, जबतब उसके गुप्तांगों को बुरी तरह से मसलना शुरू कर देता है और एक-दो दिन ही पहले पैसों का लालच देकर चुदाई करवाने का प्रस्ताव भी उसने उसके समक्ष रखा, वह कामवाली यहीं नही रुकी बल्कि खुली धमकी देकर गई कि अगली बार परेशान करने पर वह अभिमन्यु की सीधे पुलिस कमप्लेन कर देगी। उस सारी रात वैशाली अपने बिस्तर पर लेटी मात्र रोती रही थी, बेटे से इस अश्लील विषय मे बात करने मे उसे बेहद संकोच हो रहा था और अंतत: यह बात भी आई-गई सी हो गई।

अकेले रात नही काट सकने की अपनी गंभीर बीमार का इलाज वैशाली को भी जल्द से जल्द ढ़ूंढ़ना था और इस मर्ज की दवा उसे मिली उसके बेटे की पॉर्न देखने की दूसरी नियमित गंदी आदत से। पढ़ी-लिखी वैशाली जबतब घर के इकलौते कम्प्यूटर पर गेम आदि खेलकर अपना उबाऊ समय काटा करती थी और साथ ही इंटरनेट पर खाना बनाने की नई रेसेपीज देखना भी उसे काफी पसंद था। एक रोज दोपहर मे वह एकदम से दौड़कर किचन से बाहर आई और बीते दिन देखी करेले की व्यंजनविधि कम्प्यूटर की हिस्ट्री मे तलाशने लगी, जल्दबाजी मे वह यह भूल गई थी कि बीती देर रात तक कम्प्यूटर को अभिमन्यु ने यूज किया था। किचन मे बनते करेले जलकर खाक हो गए और वैशाली को रेसेपी की जगह दर्जनों पॉर्न वेबसाइट्स की लिंक देखने मिली, कौतुहल और जिग्यासावश वह उन पॉर्न वेबसाईट्स को देखने से खुद को रोक नही पाई और तभी से उसे भी मुट्ठ मारते वक्त अपने मोबाइल पर हर तरह का पॉर्न देखने की आदत सी हो गई। इसी के जरिए अभिमन्यु पर उसकी जासूसी शुरू हुई जो अबतक जारी थी, उसे पता चल चुका था कि उसके बेटे को 'एम आई एल एफ' और 'बी बी डब्ल्यू' पॉर्न देखने मे 'टीन' पॉर्न से कहीं ज्यादा रुचि है।

आगे एक रोज वह हॉल मे बैठा खुलेआम मुट्ठ मारते हुए पकड़ा गया था मगर वैशाली ने अपने आगे बढ़ते कदमों को रोक बिना कोई हलचल किए फौरन वापसी की राह पकड़ ली थी। इसके अलावा बीते कुछ महीनों से उसे संदेह था कि अभिमन्यु उसके एकांत कार्यों को छुप-छुपाकर देखने का उद्दंड करने लगा था, बाथरूम मे नहाते वक्त उसने बंद दरवाजे की निचली सांस से किसी व्यक्ति के पैरों द्वारा अवरुद्ध होती रोशनी से यह अनुमान लगाया था और उसके साथ घर मे सिर्फ उसका बेटा ही रहता है तो ऐसे मे संदेह करने की तो अब कोई गुंजाइश ही नही गई थी। यही नही अपने बेडरूम के भीतर भी उसने उसे लगातार तांका-झांकी करते हुए देखा था, पहले क्रोध फिर शर्म और अंत मे टूटकर वैशाली उसकी हरकतों की जैसे आदी-सी हो जाती है।

हाल-फिलहाल मे बीते पिछले बीस दिनों पहले वैशाली की सबसे अभिन्न महिला मित्र मिसिज मेहता अचानक से उसके घर आ धमकी और उसने वैशाली को अभिमन्यु की एक नई घ्रणित करतूत से परिचित करवा दिया की उसके घर हालचाल पूछने का बहाना बनाकर वह बाथरूम से उसकी कच्छी चुराकर ले गया है। अपने बेटे के बचाव मे मिसिज मेहता से उसकी काफी तूतू-मैंमैं हो गई थी मगर अंत तक उसने मिसिज मेहता की शिकायत को अपना विश्वास नही दिया था बल्कि उल्टे वह अपनी सबसे अच्छी दोस्त पर ही बेगैरत होने का इल्जाम लगा देती है। हालांकि उसने तत्काल अपने बेटे की पॉकेटमनी पर रोक लगा दी थी, उसका कॉलेज के अलावा कहीं और घूमने-फिरने जाना भी तब से बिलकुल बंद था और आज सुबह जब सफाई के दौरान उसे अभिमन्यु के स्टडी ड्रॉअर से वाकई मिसिज मेहता की कच्ची बरामद हो गई अत्यंत तुरंत वह खुद की ही परवरिश पर शर्मिंदा हो जाती है।

मणिक उस वक्त घर पर मौजूद था, वैशाली ने निर्णय लिया कि आज वह अपने बेटे की सभी गंदी करतूतों को अपने पति के साथ सांझा करके ही रहेगी क्योंकि पानी अब सिर के पार जा चुका था। कुछ यही सोचते हुए वह तेजी से अपने बेडरूम की दिशा मे चल पड़ी मगर चाहकर भी बेडरूम के भीतर कदम नही रख पाती और इसके दो मुख्य कारण थे :-
१) मणिक के घोर गुस्से से अभिमन्यु कहीं का नही रहता, क्या पता आज वह अपने लाडले को एक अंतिम बार देखती? या तो उसका पति उसके बेटे को जान से ही मार देता या फिर हमेशा-हमेशा के लिए उसे घर से बेदखल कर देता।
२) अभिमन्यु को बिगाड़ने मे सबसे बड़ा हाथ खुद वैशाली का ही था। यदि समय रहते वह अपने बेटे पर सख्ती करती, उसे उसके पिता का झूठा भय दिखाती या स्वयं भी उसकी पिटाई कर सकती थी मगर इन तीनों मे से वैशाली ने कुछ नही किया बल्कि बेटे की देखादाखी खुद भी रोजाना नियम से मुट्ठ मारने लगी और पॉर्न तो जैसे अब उसकी रग-रग मे बस चुका था। जैसे वह अबतक अपने बेटे की जासूसी करती आई है अब वक्त बदल गया था, उल्टा अभिमन्यु अपनी माँ की जासूसी करने लगा था और एक तरह से उसकी जासूसी मे वैशाली की सहमति भी शामिल थी वर्ना अबतक या तो वह पूरी तरह से नंगी होकर मुट्ठ मारना छोड़ चुकी होती या ठीक उसी पूर्ण नंगी हालत मे उसने बाथरूम के भीतर नहाना बंद कर दिया होता।

मणिक के घर से चले जाने के बाद वैशाली ने रोजमर्रा के सभी काम निबटाए और खुद के लिए दो परांठे बनाकर, कम्प्यूटर पर पॉर्न देखते हुए उन्हें खाने लगी। अभिमन्यु अपना लंच कॉलेज मे ही करता था तो घरपर उसके लिए सिर्फ रात का खाना बनाया जाता था। मिसिज मेहता की पेंटी वाकई बेटे द्वारा चुराए जाने को लेकर और पति के इस बार पिछले टूर से भी लंबे टूर पर चले जाने से परेशान वैशाली बिना हॉल का दरवाजा चैक किए अपने बेडरूम मे आ गई। यह सोचकर कि हॉल का दरवाजा बंद है, बिना अपने बेडरूम का दरवाजा लगाए उसने अपनी पेंटी को उतरकर फौरन अपनी गीली चूत से खेलना शुरू कर दिया। अगर अभिमन्यु अचानक से बीच मे नही आता तो कुछ ही पलों बाद हमेशा के जैसे वैशाली का पूरी तरह से नंगी होकर मुट्ठ मारने का इरादा था और जो एकाएक बाधा उत्पन्न हो जाने के कारण अधूरा रह गया था।

"शिट मैन! कितना बड़ा गधा हूँ मैं जो जानबूझकर मॉम के प्राइवेट मोमेन्ट को तबाह करने उनके बेडरूम मे चला गया था। शिट! शिट! शिट!" अपने कमरे के बंद दरवाजे से टिककर नीचे फर्श पर बैठा अभिमन्यु खुद को लताड़ते हुए बोला।

"क्या सोच रही होंगी वह मेरे बारे मे, वैसे भी मैं पहले से ही अपनी काफी इज्जत उनकी आँखों मे खो चुका हूँ और आज तो मैंने हद ही कर दी" उसने पुनः अपना चेहरा अपने दोनों हाथों से ढांक लिया।

यह बिलकुल सत्य था कि अभिमन्यु के मन-मस्तिष्क मे अपनी माँ के प्रति कोई गलत भावना नही थी, बस जबतब उसे वैशाली को देख अपनी सबसे पसंदीदा 'एम आई एल एफ' विक्की वेट्टे की याद आ जाती थी। हाँ यह जरूर सत्य था कि उसकी माँ का अत्यंत कामुक नंगा बदन उसके दिल के भीतर तक घर कर चुका था मगर इसके बावजूद उसने वैशाली पर कभी कोई जबरदस्ती नही की थी, बल्कि उसके मुट्ठ मारने या नहाने के अद्भुत दृश्य को छुप-छुपाकर देखने के उपरान्त वह भी अपनी तृष्णा को अपने मनमाने ढ़ंग से शांत कर लिया करता था।

"उनके तलवे को अपने खड़े लंड पर रगड़ा, उनकी टांगें चौडा़ईं ताकि उन्हें और शर्मिंदा कर सकूं, उन्हें भला-बुरा कह जबकि वह मे माँ हैं और तो और उनकी पेंटी तक चुरा ली मैंने" अपनी गलतियों को सोचकर वह बेहद गंभीर व भावुक हो चुका है।

"मेरे सामने नंगी होकर रहो मम्मी, छि! खुल्लम-खुल्ला मेरे सामने मुट्ठ भी मारो क्योंकि हम बैस्ट फ्रेंड हैं" खुद की निकृष्ट इच्छाओं पर अब उसे क्रोध भी आने लगा था।

"बिच, मेरी मॉम बिच। अच्छा तो फिर मैं क्या हूँ? एक कमीना, बड़ा हरामखोर बेटा" उसका सिर दर्द से फटने लगा है।


"दूरी, हाँ दूरी। बस यही मेरी सजा है कि मैं अब उनसे दूरी बना लूं ताकि उन्हें मेरा यह बेशर्म चेहरा दोबारा ना देखना पड़े" वह फर्श से उठकर सीधे अपने बिस्तर पर जा गिरा, उसे एक लंबी व गहरी नींद की सख्त आवश्यकता थी और चंद पलों मे वह सो भी गया था।


इस चूतिया से समाधान को ठीक उसी की उम्र के नौजवान निकाल सकते है क्योंकि एक ही घर मे रहते हुए वह अपनी माँ से और कितनी अधिक दूरी बना सकता था।
अभिमन्यु के आँखों से ओझल होने के पश्चात वैशाली भी बिस्तर से नीचे उतरने लगती है कि सहसा उसकी नजर बेडशीट के उस बड़े--से गीले धब्बे पर पडी जो उसके कामरस के उसकी साड़ी व पेटीकोट से रिसने के बाद बेडशीट पर अंकित हुआ था। खैर यह कोई विशेष बात नही कि उसके स्खलन ने आज सुबह ही उसके द्वारा बदली गई नई बेडशीट को इतने जल्दी गंदा कर दिया था, बल्कि वैशाली को अचरज इस बात पर हुआ कि इस तरह के लंबे व अधिकाधिक रिसाव के स्खलन उसे उसकी बीती हुई जवानी मे हुआ करते थे। चूंकि अब वह जवानी की दहलीज पार कर एक अधेड़ उम्र को पा चुकी है फिर क्या कारण रहा जो एकाएक उसके स्खलन ने पुनः उसे उसकी बीती हुई जवानी मे वापस पहुँचा दिया था?


"इन्सेस्ट होता हो या ना होता हो मगर उसका असर जरूर होता है" वह धीरे से फुसफुसाते हुए खुद से बोली और अपने ही व्यभिचारिक कथन पर बुरी तरह से लजा जाती है। वह इतनी नादान व अपरिपक्व स्त्री नही थी जो यह जान ना सके या मान ना सके कि उसके इस मनभावन स्खलन और अधिकाधिक रिसाव का एकमात्र कारण उसका अपना सगा जवान बेटा था। बेटे की मौजूदगी मे यूं खुल्लम-खुल्ला मुट्ठ मारना सचमुच एक ऐसा विचित्र रोमांचकारी क्षण था जिसकी अकल्पनीय रोमांचकता को दुनिया की कोई भी माँ नकार नही सकती थी और फिर यह कार्य सर्वदा अनुचित भी तो था, खुद वैशाली की चूत झड़ने के उपरान्त अब भी कुलबुला रही थी जैसे दोबारा उसे अभिमन्यु की प्रत्यक्ष उपस्थिति मे झड़ने का बेसब्री से इंतजार हो।

अपने चेहरे पर शर्म और कामुकता के मिलेजुले भाव लिए वह दो अत्यंत सुंदर जवान बच्चों की अधेड़ माँ अपनी अस्त-व्यस्त साड़ी को संभालते हुए अपने बेडरूम के अटैच बाथरूम के भीतर घुस जाती है। उसने तीव्रता से खुद को नग्न किया और फिर सीधे शॉवर के नीचे आकर खड़ी हो गई, ठंडे पानी की फुहार उसके तपते बदन पर गिरते ही मानो भाष्प मे तब्दील होने लगी थी। किसी अमुक विद्वान ने बिलकुल सही कहा है कि तन की ज्वाला, काम की अग्नि से ज्यादा ज्वलनशील अन्य कुछ भी नही, जिसने अच्छे-अच्छे ब्रह्मचारी, ऋषि-मुनियों के वर्षों के तप को भी पलभर मे जलाकर राख कर दिया। फिर वैशाली तो एक स्त्री है, हालात की मारी एक ऐसी तिरस्कृत स्त्री जिसकी कामग्नि बीते कई महीनों से शांत नही हो पाई थी, जो पति के जीवित होते हुए भी किसी विधवा की भांति बिस्तर पर लगभग अपना पूरा दिन बिता देने को बाध्य थी।

"मन्यु क्या सोच रहा होगा मेरे बारे मे? कहीं वह मेरी पेंटी को अपने लंड पर लपेटकर मुट्ठ तो नही मारने लगा होगा? वैसे लड़का है तो बड़ा बेशर्म, बद्तमीज! अपनी सगी माँ को कुतिया कहकर बुला रहा था" अपनी चूत और उसके आसपास उगी बड़ी-बड़ी घुंघराली झांटों को धोते वक्त भी वैशाली सिर्फ अपने बेटे के ही विषय मे सोच रही थी। एक अजीब--सी संनसनाहट भरा अहसास कि अपने कामरस को छुटाते हुए भी उस माँ का ध्यान अपने जवान बेटे पर से हट नही पा रहा, उस माँ की मर्यादित छवि के लिए कितना अधिक लज्जातृन था।

"क्या कोई माँ अपनी नंगी चूत को छूने के दौरान कभी अपने बेटे का ख्याल अपने मन-मस्तिष्क मे ला सकती है?" अचानक खुद से ऐसा अशिष्ट प्रश्न पूछ वैशाली की आँखें मुंद जाती हैं और सर्वप्रथम जो चेहरा उसकी बंद पलकों मे उभरा, उस चेहरे और उसपर व्याप्त हँसी को देखते ही वह तेजी से अपना हाथ अपनी नंगी चूत से दूर झटक देती है। उसने अपनी मुंदी आँखें भी तत्काल खोल लीं, निरंतर मलते हुए उन्हें ठंडे पानी से धोया मगर खुली आँखों से भी चहुं ओर उसे अपने बेटे अभिमन्यु का ही हँसता हुआ चेहरा नजर आ रहा था।

"तू अब उसकी माँ नही रही वैशाली। तेरी स्थिति वाकई तेरे बेटे के नीच संबोधन, सड़क की उस बेबस बूढ़ी कुतिया समान हो गई है जिसे जवान होकर जबतब उसका अपना पिल्ला ही चोद जाया करता है। तेरी उच्चतम पदवी, शीर्शतम रिश्ता, मान और सम्मान जैसे सबकुछ तूने स्वयं ही अपनी बेशर्मी से गंवा दिया। आज अभिमन्यु ने तेरे मुंह पर प्रत्यक्ष तुझे कुतिया कहकर पुकारा है, वह दिन दूर नही जब भविष्य मे तुझे रंडी कहकर भी पुकारेगा" अतिशीघ्र वैशाली अपने दोनों हाथ बलपूर्वक अपने दोनों कानों पर दबा देती है। यह उसके अंतर्मन की वही आंतरिक आवज थी जिसने उस वक्त भी उसे कचोटा था जब मुट्ठ मारते हुए वह बेटे के मुंह से, अपने प्रति उसके अंदरूनी गंदे व निषिद्ध विचारों को जानने की इच्छुक थी। वैशाली उससे वर्जित पर वर्जित सवाल पूछे जा रही और अपनी माँ के समान ही बेशर्म बनकर अभिमन्यु उसे अनैतिक से अनैतिक उत्तर देते हुए बारंबार अपनी पापी इच्छाएं भी उसे बेझिझक बतलाए जा रहा था।

"कुछ ...कुछ गलत नही हुआ, सिर्फ एक छोटा--सा बदलाव ही तो आया है। पहले वह छुप-छुपाकर मुझे मुट्ठ मारते हुए देखा करता था, आज प्रत्यक्ष देख लिया। उसने सही कहा था कि हम अडल्ट हैं, एक-दूसरे केयसभी रहस्यों से पूर्ण परिचित फिर छुप्पन-छुपाई का यह बचपना खेल कबतक खेलते रहेंगे?" वैशाली ने अपने अंतर्मन से तर्क-वितर्क करना शुरू कर दिया।

"माना उसकी माँ होकर मैं उसकी एकमात्र इच्छा का समर्थन नही कर सकती, उसे कतई उचित नही ठहरा सकती, जरा--सा भी स्वीकार नही कर सकती मगर अपनी धूमिल छवि मे जरूर सुधार कर सकती हूँ। हाँ! मुझे उसकी दोस्ती के प्रस्ताव पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है और बस अब मैं खुद को उसी नये रूप मे ढा़लने की कोशिश करूंगी" अपने अंतर्मन को अपना अंतिम व निर्णायक निर्णय सुनाकर वह बिना कुछ और सोचे, बेहद शांति से अपना नहाना पूरा करती है और बाथरूम मे पहले से ही मौजूद तौलिए को अपने अधगीले मांसल नंगे बदन पर लपेटकर बाथरूम से बाहर निकल जाती है।

अपने बेडरूम के पूर्व से खुले हुए दरवाजे को देख सहसा वैशाली की हँसी छूट जाती है कि कैसे वह एक छोटे--से तौलिए को अपने गदराए अध्उघड़े बदन पर लपेटे सरेआम अपनी निजता को स्वयं तारतार कर रही है। अभिमन्यु घर पर मौजूद है और यह जानते हुए भी अबतक संस्कारी रही उसकी माँ यूं खुल्लम-खुल्ला अपने अधनंगे बदन का निर्भीक प्रदर्शन कर रही है, जैसे उसे इस बात का कोई डर नही कि उसके बेडरूम का दरवाजा खुला हुआ है और उसका जवान बेटा किसी भी क्षण उसके कमरे के अंदर सरलतापूर्वक झांककर उसे उसकी इस अधनंगी कामुक हालत मे देख सकता है।

"हमें अपनी न्यूडिटी को कोई खास वैल्यू नही देनी चाहिए मॉम। ऐसी गंदी सोच रखने वाले गंदे लड़के, उफ्फ! जिसने तुम्हें पैदा किया, अपनी उसी सगी माँ को पूरी तरह से नंगी देखकर तुम्हें शर्म नही आएगी भला?" अपने खुद के विध्वंशक प्रश्न पर लंबी सीत्कार भरते हुए वैशाली फौरन अपना तौलिया अपने अधनंगे बदन से अलग कर देती है, तत्पश्चात पूर्णरूप से नंगी हो चुकी भव्य यौवन की स्वामिनी वह विवाहित माँ अपने उस छोटे--से तौलिए को एक बहुत ही निम्न स्तर की बेहुदा अदा के साथ नीचे फर्श पर गिराकर, तत्काल अपने बेडरूम के खुले दरवाजे को निहारने लगती है।

"तुम्हारी घटिया बात को मानकर तुम्हारी माँ सचमुच नंगी हो गई मन्यु। मौका है बेटा, देख सको तो देख लो" ओछी हँसी हँसते हुए इस अश्लील कथन को कहकर वैशाली ने अपने लंबे काले बालों को जोर से झटका, जिसके प्रभाव से एकाएक उसके पूर्णविकसित मम्मे भी जोरों से उछल पड़ते हैं। अपने मम्मों की अत्यंत सुंदर बनावट पर उसे शुरुआत से गुमान रहा था, लगभग हर स्त्री की भांति उसे भी अपने मम्मो का बेहद फूला व तराशा हुआ गोलाईयुक्त आकार हमेशा से भाता आया था। अपने दाएं हाथ को सीधे अपने धुकनी समान धड़कते दिल पर रखकर वह हौले-हौले बेडरूम के खुले दरवाजे की ओर अपने कंपकपाते कदम बढ़ाने लगती है, अपने जवान बेटे की घर मे मौजूदगी के कारण उसकी मंत्रमुग्ध कर देने वाली चाल सामान्य से कहीं अधिक मादक व मतवाली हो चुकी थी। उसकी गदराई मांसल गांड कुछ इस तरह से थिरक रही थी जैसे मांस की नही पारे की बनी हो और साथ ही ज्यों-ज्यों वह खुले दरवाजे के नजदीक आती जा रही थी, उसकी चूत से निरंतर बाहर उमड़ता कामरस बहकर उसकी हृष्ट-पुष्ट जांघों को भिगोने लगा था।

आजादी, उन्मुक्तता, खुलापन आदि शब्दों का सही अर्थ व मूल्य महज वही समझ सकता है, जो जन्म-जन्मांतर से बेड़ियों के अटूट बंधन मे जकड़ा रहा हो फिर वह बेड़ी और जकड़न से भरा उसका अटूट बंधन समाजिक हो, रिश्तों का हो, हैवानियत का हो, मर्यादा का हो या फिर किसी लालसा का हो। बीते जीवन मे पहली बार वैशाली स्वयं उस स्वच्छंदता, खुलेपन को प्रत्यक्ष महसूस कर रही थी, उसे लग रहा था जैसे इसी स्वतंत्रता की उसे बरसों से तलाश थी।

दरवाजे से बाहर झांकते वक्त उसका सम्पूर्ण बदन गनगना उठा और उसके मुखमंडल पर प्रसन्नता ही प्रसन्नता छा जाती है, जीवन मे प्रथम बार उसने खुलकर आजादी का स्वाद चखा था और वह पकड़ी नही गई थी। मन बावरा होता है, संतोष की प्राप्ति अमरता के वरदान की तपस्या से भी कहीं दुर्लभ है और वैशाली के संग भी तत्काल कुछ ऐसा ही हुआ। अपनी सफलता के मद मे चूर वह अपने बेडरूम के दरवाजे की निषेध दहलीज को भी पार करने का दुस्साहस कर बैठी मगर जाने क्या सोचकर वह फौरन पलटी और बेडरूम के भीतर आकर दरवाजे को लॉक करते हुए गहरी-गहरी सांसें लेने लगती है।

"धत्! तू पागल है, पूरी तरह से पागल है। पकड़ी जाती तब क्या होता?" अपनी गुलाबी जीभ को अपने मूंगिया रंगत के भरे हुए होंठों से बाहर निकालकर वैशाली अपनी गलती पर अपना माथा ठोकते हुए चहकी।

"कुछ भी कहो लेकिन मजा बहुत आया" किसी नवयुवती समान उछल-कूद करते हुए वह अपने वॉड्रोब तक आ पहुँची और रोजमर्रा मे पहने जाने वाले अपने वस्त्रों को पहनने लगती है। लाल ब्रा और बैंगनी कच्छी के पश्चात उसने उनके ऊपर अपने हल्के फ्रोजी रंग की कॉटन की मैक्सी पहन ली। अपने खुले बालों का जूड़ा बनाकर उसने ड्रेसिंग के कांच पर पहले से चिपकी एक छोटी--सी काली बिंदी को खींच, उसे अपने माथे के बीचोंबीच चिपकाया और मांग मे सिंदूर धारण कर कांच मे अपनी अधेड़ छव को घूरने लगती है।

"शायद पेटीकोट की जरूरत पड़ सकती है। हुंह! हमेशा तो इसे बिना पेटीकोट के पहनती आ रही है" कांच के सामने गोल-गोल घूमते हुए अचानक वैशाली को अहसास हुआ जैसे उसकी कच्छी की बनावट उसकी मैक्सी के ऊपर से नुमाइंदा हो रही है, खास उसकी गदराई गांड का कामुक उभार उसकी कच्छी समेत मैक्सी के ऊपर से स्पष्ट नजर आ रहा है। एकपल को उसने मैक्सी के भीतर पेटीकोट पहनने का विचार बनाया मगर अगले ही पल वह अपना विचार त्याग भी देती है, यह उसकी दैनिक वेशभूषा थी और एकदम से उसमे अंतर करना उसे अपने पागलपन का शुरुआती लक्षण समझ आता है।

"मन्यु आज जल्दी कॉलेज से लौट आया था, क्या पता लंच किया भी है या नही" अपनी कामग्नि मे पिछले दो घंटों से लगातार जलने वाली वह तिरस्कृत स्त्री सहसा एक ममतामयी माँ मे तब्दील हो गई और तीव्रता से अपने बेडरूम के बाहर निकलकर वह अभिमन्यु के कमरे के बंद दरवाजे पर दस्तक देने लगती है।
"मन्यु! दरवाजा खोलो बेटा, मम्मी कितनी देर से खटखटा रही है" जब चार-पाँच बार दरवाजे पर थाप देने के बावजूद अभिमन्यु ने दरवाजा नही खोला तब वैशाली हाथ के थापों के साथ उसे आवाज भी देने लगी।


"वैसे तो दिन मे कभी नही सोता, जरूर मुट्ठ मारने की थकान से नींद लग गई होगी बेचारे की। हाय रे मेरी पेंटी, आज बुरी फंसी तू" अपनी ही ठरकी सोच पर वैशाली की हँसी छूट जाती है, अब इसे ठरक नही कहेंगे तो और क्या कहेंगे कि बीते पिछले दो-तीन घंटे के घटनाक्रमों ने एक बेहद संस्कारी माँ को कितना अधिक बदल दिया था। तत्काल वह अपना बायां कान दरवाजे से चिपका देती है ताकि अगर उसका बेटा जानबूझकर दरवाजा नही खोल रहा हो तो वह कमरे के अंदर की हलचल सुनकर इस बात का अनुमान लगा सके।

"बेटा सो गए क्या?" अपने कान मे कोई हलचल सुनाई ना देने के उपरान्त वह फौरन अपने घुटनों के बल नीचे फर्श पर बैठ गई और की-होल से कमरे के भीतर का जायजा लेने लगती है, अभिमन्यु बिस्तर पर औंधा डला था। एकपल को बेटे की नींद का ख्याल कर उसने उसे जगाने का विचार त्याग दिया मगर उसकी भूख के विषय मे सोच फर्श पर बैठे-बैठे ही वह उसे जोरों से पुकारने लगती है।

"क्या है मॉम, मैं सो रहा हूँ यार" अभिमन्यु नींद मे कसमसाते हुए बोला, वाकई वह बहुत गहरी नींद मे था।

"यार के बच्चे, दरवाजा खोलो। मुझे तुमसे बात करनी है" जवाब मे वैशाली चिल्लाकर बोली और अपनी उसी चिल्लाहट की आड़ मे हल्के हाथों से दरवाजे का नॉब घुमा देती है।

"बाद मे मम्मी, बाद मे" अभिमन्यु पुनः कसमसाया।

"मैंने कहा ना मुझे तुमसे बात करनी है। अभी, इसी वक्त खोलो दरवाजा" वैशाली ने सहसा क्रोधित होने का नाटक किया और जिसके असर से अभिमन्यु तुरंत ही उठकर बैठ गया।

"खोलता हूँ, खोलता हूँ" एक लंबी जम्हाई लेते हुए वह बिस्तर से नीचे उतरकर आड़े-टेढ़े कदमों से दरवाजे के समीप आने लगा और तभी वैशाली भी फर्श से उठकर खड़ी हो जाती है।

"गेट शायद बाहर से लॉक है माँ" वह दरवाजा खींचने का प्रयास करते हुए बोला।

"मैंने ही लॉक किया था बाहर से" वैशाली जवाब मे बोली।

"क्यों? फिर क्यों नींद खराब की मेरी, जब गेट खोलना ही नही था? फौरन अभिमन्यु ने चिढ़ते हुए पूछा।

"भाई तुम्हारा क्या भरोसा, अंदर किस हाल मे हो। कपड़े तो पहने हैं ना तुमने या फिर नंगे हो?" वैशाली ने अपनी रोके ना रुकाए हँसी को काबू मे करने की कोशिश करते हुए पूछा, यकीनन अब ठरक उसके सिर चढ़कर बोल रही थी।

"नंगा!" अपनी माँ के इस अजीब से प्रश्न पर अभिमन्यु जैसे चौंक सा जाता है, उसके हैरत से खुल चुके मुंह से मात्र इतना ही बाहर आ सका।

"अरे दिन मे तुम कुछ न्यूडिटी-व्यूडिटी की बात कर रहे थे ना तो मुझे लगा कि तुम कहीं ....." वैशाली ने अपने कथन को अधूरा छोड़ते हुए कहा।

"खोलू दरवाजा? सच मे नंगे नही हो ना?" उसने पिछले कथन मे जोड़ा और बेटे के जवाब की प्रतीक्षा किए बगैर ही झटके से दरवाजा खोल देती है।

"हाय! अपनी माँ की कच्छी का यह क्या हाल कर दिया तुमने? पापी!" दरवाजा खुलते ही वैशाली की नजर सर्वप्रथम नीचे फर्श पर पड़ी अपनी कच्छी पर गई तो उसने तत्काल अपने मुंह पर हाथ रखकर आश्चर्य से भरने का नाटक करते हुए पूछा, वह जानबूझकर 'पेंटी' की जगह पूर्णदेशी शब्द "कच्छी' का इस्तेमाल करती है और साथ ही उसने कच्छी शब्द के संग 'माँ' शब्द को भी जानकर जोड़ा था।

कुछ नींद की खुमारी और कुछ अपनी माँ के प्रश्नों से हतप्रभ हुए अभिमन्यु का ध्यान फर्श पर पहले से पड़ी वैशाली की कच्छी पर नही जा सका था और अपनी माँ के तात्कालिक प्रश्न को सुनकर तो मानो जैसे उसकी सांस ही गले मे अटक जाती है।

"वो माँ ...वो मैं ...." जवाब देते हुए वह मिमियाने लगता है, उसका हलक चिपक चुका था।

"एक तो तुमने माँ की कच्छी चुराई, दूसरे उससे मजे किए और जब मजा पूरा हो गया तो आखिर मे दुत्कारकर उसे फर्श पर फेंक दिया। वाह रे मर्द! तुम सब एक जैसे होते हो" वैशाली मनमसोसने का अभिनय करते हुए बोली और एक लंबी आह भरकर कमरे से बाहर जाने लगती है। वहीं अभिमन्यु ठगा सा, एकटक फर्श पर पड़ी अपनी माँ की कच्छी को ही घूरे जा रहा था, चाहता तो था कि वैशाली को बीती सत्यता से परिचत करवा दे मगर शर्मवश वह ऐसा कर नही पाता।

"खाना लगा रही हूँ, फ्रैश होकर सीधे बाहर आओ और हाँ! जाओ माफ किया" वैशाली कमरे से बाहर जाते-जाते बोली। अभिमन्यु ने फौरन अपना सिर उठाकर उसके चेहरे देखा, पलभर को मुस्कराकर वह तेजी से आगे बढ़ गई थी।

कुछ आधे घंटे पश्चात दोनो माँ-बेटे हॉल की डाइनिंग टेबल पर साथ बैठकर खाना खा रहे थे। हमेशा बकबक, हो-हल्ला करने वाले अभिमन्यु को यूं चुपचाप खाना खाते देख वैशाली को दुख हुआ। खाने को खाने की तरह खाता तब भी ठीक था, वह तो जैसे खाना चुग रहा था।

"मन्यु" जब हॉल मे पसरा मानवीय सन्नाटा वैशाली के बस से बाहर हो गया तब वह स्वयं ही उस सन्नाटे को भंग करते हुए बेटे को पुकारती है।

"हुं!" जवाब मे अभिमन्यु अपना मुंह तक खोलना पसंद नही करता, अपने गले के स्वर से बस इतना ही गुनगुनाकर वह अपनी माँ के चेहरे को देखने लगता है। उसे एकाएक अचरज तब हुआ जब हैरत से बड़ी होती जाती उसकी आँखों मे झांकते हुए वैशाली अपने बाएं की उंगलियों की मदद से अचानक अपनी मैक्सी के ऊपरी बटन को खोलने लगती है, पहले उसने एक बटन खोला तत्पश्चात दूसरे को खोलने लगी।

अभिमन्यु की घिग्घी बंधी देख वैशाली को कुछ संतोष हुआ, संतोष इसलिए नही कि उसे अपने बेटे की परेशानी, घबराहट, उसकी मायूसी से कोई अतिरिक्त खुशी मिल रही थी बल्कि इसलिए कि उसे प्रत्यक्ष प्रमाण मिल चुका कि उसके बेटे की नजरों मे उसकी इज्जत अब भी बरकरार थी, वह तो हालात का खेल था जो एक ही वक्त मे दोनो माँ-बेटे एकसाथ बेशर्म बन गए थै। अपनी मैक्सी के दूसरे बटन को खोलते समय वैशाली ने यह भी स्पष्ट देखा कि भले ही अभिमन्यु ने अत्यंत-तुरंत अपनी आँखें अपनी माँ से हटाकर विपरीत दिशा मे मोड़ दी थीं मगर उनकी किनोर से अब भी वह उसकी उंगलियों की हरकत पर ही गौर फरमा रहा था। मैक्सी के दूसरे बटन के खुलते ही वैशाली अपने उसी बाएं हाथ की उंगलियां हौले-हौले अपने मम्मों के ऊपरी फुलाव पर रगड़ते हुए पहले उन्हें अपनी मैक्सी और फिर सीधे अपनी ब्रा के दाहिने खोल के भीतर घुसेड़ देती है।

"तुम्हारी पॉकेटमनी" वैशाली बेटे का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए बोली मगर अपना बाएं हाथ उसने अबतक अपनी ब्रा से बाहर नही निकाला था। दोनो माँ-बेटे की आँखें आपस मे जुड़ चुकी थीं और फिर कुछ ऐसा जताते हुए कि उसकी ब्रा बेहद तंग है, वह अजीब सा आड़ा-टेढ़ा मुंह बनाने लगती है।

"वो काफी दिनों से शॉपिंग नही की ना तो थोड़ा साइज इश्यू है" वैशाली अपनी हरकत के समर्थन मे बोली।

"मेरी कच्छियों का भी यही हाल है" मायूसी से उसने पिछले कथन मे जोड़ा।

"कोई बात नही मॉम और वैसे भी मुझे पॉकेटमनी नही चाहिए, मेरी पनिशमेंट अभी पूरी नही हुई" अपने ठीक सामने बैठी अपनी माँ को उसकी तंग ब्रा से जूझते देख अभिमन्यु हौले से बुदबुदाया। वैशाली की लाल ब्रा उसकी बेवजह की खींचा-तानी के कारण उसकी मैक्सी के खुले गले से आधी बाहर निकल आई थी और उसके गोल-मटोल मम्मों का प्रभावशाली ऊपरी उभार अभिमन्यु को तत्काल उत्तेजना से भरने लगा था। अपनी माँ की बोली मे आए खुलेपन से भी वह थोड़ा सकते मे था।

"बस हो गया। हाँ ये लो, पूरे सात हजार हैं" वैशाली नोटों के बंडल को बेटे की ओर बढ़ते हुए बोली मगर अपने पिछले कथन पर अटल अभिमन्यु फौरन ना के इशारे मे अपना सिर हिला देता है।

"पनिशमेंट जारी थी और जारी ही रहेगी, पॉकेटमनी तुम अपने पास रख सकते हो पर तुम्हारा घर से बाहर आना-जाना बंद ही रहेगा" वह रुपयों का बंडल टेबल पर उसके सामने रखते हुए बोली।

"थेंक्स मॉम, खाली जेब मुझे कैसा फील हो रहा था मैं ही जानता हूँ" अभिमन्यु अत्यंत तुरंत बंडल पर झपटते हुए बोला, बिन पैसों के एक जवान लड़के की कैसी हालत होती है स्वयं वैशाली को भी प्रत्यक्ष समझ आ गया। अपने दोनों हाथ कैंची के आकार मे ढा़ल वह उन्हें अपनी अधखुली छाती के इर्द-गिर्द लपेटकर बैठ गई थी, जिसका दबाव उसके पुष्ट मम्मों के निचले भाग पर हो रहा था। अकस्मात् उसके मम्मों का ऊपरी उभार पहले से अधिक नुमाइंदा हो गया, जिसके नतीजतन एसी की मनभावन ठंडक वह अपने तेजी से ऐंठते जा रहे निप्पलों पर भी साफ महसूस करने लगी थी।

"मुझे लगता है कि मुझे सुधा से माफी मांगनी चाहिए, आखिर यह कोई छोटी-मोटी बात नही कि तुमने बहाने से उसके घर जाकर जानबूझकर उसकी कच्छी को चुराया था" अपने बेटे की चोर नजरों को बरबस अपने अधनंगे मम्मों पर गड़ते देख वैशाली बोली।

"वह मम्मी ... वह, तुम उस बात को भूल क्यों नही जातीं, अबतक तो मिसिज मेहता भी उसे भूल ही चुकी होंगीं" आंतरिक शर्म से बेहाल अभिमन्यु हकलाते हुए बोला, उसकी शर्माहट का एक मुख्य विषय यह भी था की अपनी माँ के मम्मों की सुंदरता को निहारने का इतना करीबी मौका उसे पहली बार प्राप्त हुआ था ऊपर से वैशाली का लगातार देशी भाषा प्रयोग उसे बेहद अटपटा-सा लग रहा था, रह-रहकर उसके संपूर्ण बदन मे फुरफुरी सी छूटती जा रही थी।

"तुम्हारी माँ होने के नाते भूल जाऊँ तो मैं वाकई उसे भूल चुकी हूँ और तुम्हें माफ भी कर दिया है मगर एक औरत होकर दूसरी औरत की बेज्जती कैसे सह लूं। तुम्हें पता नही मन्यु कि तुम्हारे बचाव मे मैंने उसे क्या-क्या गलत-शलत नही बोला, यह जानते हुए भी कि गलत वह नही मेरा अपना बेटा है" वैशाली एक लंबी आह भरते हुये बोली, अपना चेहरा नीचे को झुकाकर वह अपने मम्मों के अधनंगे ऊपरी उभार और उनके बीच की खुली दरार का स्वयं अवलोकन करने लगी। उस अत्यधिक कामुक माँ ने उस वक्त अपने बेटे को जैसे चौंका ही दिया जब अपने अंगप्रदर्शन को जानकर भी कोई विशेष महत्व दिए बगैर वह तत्काल अपना चेहरा ऊपर उठाकर पुनः उसकी आँखों मे झांकने लगती है।

"अगर तुम्हारी ही उम्र का कोई लड़का इस तरह की बेहूदगी से तुम्हारी अपनी माँ की कच्छी को चुरा ले जाए तब तुम्हारी माँ के दिल पर क्या बीतेगी, कभी सोचा है तुमने? फिर सुधा ने तो तुम्हारे और उसके अपने बच्चों की बीच कभी कोई फर्क नही किया" वैशाली ने शांत स्वर मे पूछा। अपनी माँ के कथन मे शामिल प्रश्न और उसमे उसका स्वयं का उदाहरण देना अभिमन्यु को स्पष्ट दर्शाता है कि वाकई अपने कथन को लेकर वह कितनी अधिक गंभीर थी। उसने सहसा निर्णय लिया कि वह अपनी माँ की अधनंगी छाती को अब और नही घूरेगा मगर पलभर भी नही बीत सका और दोबारा उसकी आँखें उसी उत्तेजक दृश्य पर वापस लौट आईं।

"तुम्हें उनसे माफी मांगने की कोई जरूरत नही, गलती मैंने की है तो माफी भी उनसे मैं ही मागूंगा" अभिमन्यु ने जवाब मे कहा, मानो अपनी बीती गलती और तात्कालिक गलती की वजह से खुद को लताड़ने का प्रयास कर रहा हो। स्वतः ही वह यह भी महसूस करता है कि उसकी सगी माँ के प्रति उसके मन-मस्तिष्क मे कितनी अधिक गंध भर चुकी है और जो वह चाहकर भी उस गंध को मिटा नही पाता। जहां संसार इस उदाहरण से पटा पड़ा है कि एक पुत्र का सही स्थान सदैव उसकी माँ के चरणों मे ही होता है और एक पुत्र वह स्वयं है जो अपनी माँ के चरण तो दूर, दिन-रात बस उसके नंगे बदन की ही वर्जित कल्पनाओं मे खोया रहता है।

"सॉरी आंटी! मैंने आपकी कच्छी चुराई और फिर भी आपसे माफी मिलने की चाहत लिए आपके पास आया हूँ। क्या यह कहोगे उससे? वाट इज रॉंग विद यू मन्यु। माला के साथ भी तुम जबरदस्ती कर रहे थे, जबकि तुम्हें अच्छे से पता है कि वह मोहल्ले के अॉलमोस्ट हर घर मे काम करती है। तुम्हें पता नही मगर उसने मुझे खुद बताया था कि तुम उसके साथ छेड़छाड़ करते हो, उसके प्राइवेट पार्ट्स को छूते हो और पैसे का लालच देकर तुमने उससे साथ सैक्स करने की डिमांड भी की थी। तुम्हारी माँ होकर भला मैं कबतब लोगों के गंदे-गंदे ताने सुनती रहूँगी? जबकि खोट मेरी परवरिश मे नही खुद तुममे है" कहने को तो वैशाली इतनी विस्फोटक बातें कह गई मगर फौरन कुर्सी खिसकाकर वह बेटे के नजदीक आ जाती है और सीधे उसने अभिमन्यु का चेहरा अपनी अधनंगी छाती से चिपका दिया।

"मैं तुम्हारी टीन एज को नेगलेक्ट नही कर रही, मुझे सचमुच पता है बेटा कि तुम जवानी के किस नाजुक दौर से गुजर रहे हो। तुम अपनी माँ को अपना बैस्ट फ्रैंड बनाना चाहते थे तो चलो, मैंने तुम्हारा प्रपोजल ऐकसेप्ट किया लेकिन तुम्हें भी मुझसे प्रॉमिज करना होगा कि तुम अपनी इस बैस्ट फ्रैंड से कुछ भी नही छुपाओगे। नाउ कमअॉन टेल मी द ट्रुथ, तुम्हारे दिल और दिमाग मे क्या चल रहा है?" वह प्यार से बेटे के बालों मे अपनी उंगलियां घुमाते हुए बोली। माना कि इस मार्मिक क्षण मे भावुकता उत्तेजना पर भारी थी मगर कहीं ना कहीं उनके शारीरिक सम्पर्क से दोनो माँ-बेटे रोमांचित भी थे। अपने मम्मों की गहरी घाटी के बीचोंबीच अपने बेटे की गर्म सांसों के अहसास मात्र से वैशाली का दिल जोरों से थड़कने लगा और साथ ही वह अपनी चूत की अंदरूनी गहराई मे एकाएक स्पन्दन शुरू होता महसूस करने लगती है। उनका यह शारीरिक सम्पर्क वह माँ तब झटके तोड़ने पर मजबूर हो गई जब अभिमन्यु की गीली जीभ का स्पर्श अचानक से वह अपने बाएं मम्मे के ऊपरी फूले उभार से होता पाती है।

"आई एम ... आई एम जस्ट क्यूरियस मॉम। जस्ट क्यूरियस, नथिंग एल्स" अभिमन्यु हकलाते हुए बोला, वह भी समझ गया था कि क्यों उसकी माँ ने एकदम से उसका चेहरा अपने मम्मो से दूर ढ़केला था। उसकी माँ की मैक्सी उसके बाएं कंधे से लगभग पूरी ही सरक चुकी थी और जिसके कारण उसकी लाल ब्रा का बायां स्ट्रैप भी अब स्पष्ट दिखने लगा था, यहां तक कि अगर आगामी समय मे वह थोडा--सा भी हिलती-डुलती तो उसकी ब्रा का सम्पूर्ण बाएं हिस्सा फौरन बेपर्दा हो जाना था।

"क्यूरियस अबाउट वाट? अबाउट दिस, हम्म?" अपने सगे जवान बेटे की बेशर्म आँखों को यूं खुलेआम अपने अधनंगे मम्मों गडी़ पाकर वैशाली बहुत उत्साहित थी, उसने बिना किसी अतिरिक्त झिझक के अपने दाएं हाथ से सीधे अपने अधनंगे मम्मों की ओर इशारा करते हुए पूछा।

"मॉऽऽम!" अपनी माँ के प्रश्न और उसके दाएं हाथ के इशारे को समझ सहसा अभिमन्यु कुर्सी से उछल पड़ता है, इस पूरे वार्तालाप मे मानो पहली बार उसे शर्म महसूस हुई थी।

"अरे! अरे! अरे! नाउ वाट हैप्पन टू योर दोज वर्ड्स? वी बोथ आर अडल्ट मम्मी और अगर हम दोस्त बने तो हमारी शर्म खत्म हो जाएगी" वैशाली हँसते हुए बोली तो साथ मैं अभिमन्यु भी हँसने लगता है।

"तुम वाकई बहुत गंदे लड़के हो मन्यु पर क्या करूं, मेरे इकलौते बेटे हो तो मैं ठीक से तुम्हें डांट भी नही पाती" उसने पिछले कथन मे जोड़ा।

"आई नो मम्मी एण्ड देट्स वाए आई लव यू सो मच। उम्मऽऽ मुआऽऽ" अभिमन्यु ने फौरन उसकी ओर एक चुम्बन उछाल दिया।

"तो मैं सही हूँ, तुम्हारी क्युरीआसिटी औरतों के बदन से है" वैशाली ने अंधेरे मे तीर चलाते हुए कहा, हालांकि पूरी तरह से इसे अंधेरे मे तीर चलाना नही कहेंगे मगर उनके बीच चलते इस सामान्य से वार्तालाप को अब दूसरी दिशा मे मोड़ने हेतु उसे अभिमन्यु की भी सहमति की विशेष आवश्यकता थी। एक ऐसी सहमति जिसमे ना कोई शर्म हो, ना कोई हया हो महज सत्य ही सत्य हो।

"अब मैं बोलूंगा तो कहोगी मैं बेशर्म हूँ" अभिमन्यु दांत निकालते हुए कहता है। वह तो इस वक्त की प्रतीक्षा ना जाने कब से कर रहा था, जब उसकी माँ और वो दोनो ही खुलकर बातचीत कर सकते थे।

"जो लड़का किसी मजबूर कामवाली के साथ जबरदस्ती कर सकता है, अपनी माँ की बैस्ट फ्रैंड के घर से उसकी कच्छी चुरा सकता है और आज तो तुमने अपनी माँ की ही कच्छी चुरा ली। ऐसे बेशर्म को बेशर्म नही बोलूं को क्या शब्बाशी दूं" वैशाली का स्वर क्रोधित था मगर उसके भाव चहके हुए थे।

"मैं खुद को बिलकुल नही रोक पाता मम्मी, जब एक बेहद सैक्सी एण्ड हॉट एम आई एल एफ दिनभर मेरे करीब रहती है। जो मुझे अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करती है, मुझे खाना खिलाती है, मेरा ख्याल रखती है, मुझे कभी नही रोने देती, टाइम से पॉकेटमनी देती है, मेरे गंदे कपड़े धोती है, मेरे ...." वह आगे बोलता ही जाता यदि वैशाली बीच मैं उसे नही टोकती।

"बस बस, बहुत मक्खन लगा लिया तुमने और मैं कोई एम आई एल ...." इस बार अभिमन्यु अपनी माँ को बीच मे टोक देता है।

"मुझे बोलने दो मम्मी। जिसे पता है कि मैं चोरी छिपे उसे नहाते देखता हूँ, उसे मुट्ठ मारते हुए देखता हूँ। जिसे पता है कि मैं खुद उसके नाम की मुट्ठ मारता हूँ, जिसे पता है कि मैं पॉर्न देखता हूँ, जिसे पता है मैं वर्जिन नही। जो मेरी रग-रग से वाकिफ है मगर फिर भी मेरी हर छोटी-बड़ी गलती को हमेशा माफ कर देती है ....." अपने बेटे के अश्लील कथन को सुनकर अकस्मात् वैशाली का सम्पूर्ण बदन कांप उठा, चेहरे पर लहू उतर आया, कमर चरमरा गई, निप्पल ऐंठ गए, कामरस से भीगी कच्छी थरथराती चूत के मुख से बुरी तरह चिपक गई और तत्काल वह झटके से कुर्सी से उठकर खड़ी हो जाती है। अभिमन्यु अब भी बोले ही जा रहा था, उसका हर शब्द वैशाली के कानों मे पिघले शीशे सा घुसता महसूस हो रहा था।

"मुझे ...मुझे काम है" कहकर वह सीधे किचन की ओर दौड़ पड़ती है।

"मैंने सिर्फ फ्रेंडशिप का प्रपोजल नही रखा था मॉम और भी बहुत से प्रपोजल थे मेरे। तो क्या मैं उन्हें भी मंजूर समझूं?" दौड़ लगती अपनी माँ को देख अभिमन्यु ने जोर से चिल्लाते हुए पूछा और उसके प्रश्न को सुन वैशाली बिना पीछे मुड़े अपने दाएं हाथ से अपना माथा ठोकते हुए मुस्कुराकर किचन के भीतर घुस जाती है।
कुछ क्षणों तक किचन के बर्तनों की मिथ्या ध्वनि से खुद को व हॉल मे बैठे अभिमन्यु को भ्रमित करने का सफल अभिनय करती वैशाली जोरदार हंपाई लेती रही, अपने सगे जवान बेटे के मुंह से यूं खुल्लम-खुल्ला अपनी अश्लील प्रशंसा सुनना संसार की किस माँ को हंपाई से नही भरेगा? अपनी प्रशंसा पर प्रसन्न हो उठना तो स्त्री स्वभाव का पहला प्रमुख गुण है मगर प्रसन्न होने के साथ ही उसपर लजा भी जाना, यह अवश्य स्त्री विशेष की अत्यंत मर्यादित छवि को प्रदर्शित करता है। वैशाली उन चुनिंदा स्त्रियों मे से एक है जिसकी मर्यादित छवि के कारण उसकी लज्जा उसकी प्रसन्नता पर सदैव भारी पड़नी चाहिए और ऐसा वह प्रत्यक्ष महसूस कर भी रही थी।


"हाँ मुझे पता कि तुम अपनी माँ, अपनी सगी माँ, जिसने तुम्हें पैदा किया अपनी उसी सगी माँ के नाम की मुट्ठ मारते हो। तुम इतने बेशर्म कैसे हो सकते हो मन्यु? अपनी माँ के विषय मे सोच अपने लंड से खेलते हुए क्या तुम्हें जरा सी भी शर्म नही आती बेटा?" किचन की स्लैब पर अपने दोनो हाथ टिकाए खड़ी उस मर्यादित, संस्कारी माँ के अनैतिक बोल उस वक्त उसे और भी अधिक लज्जा से भर देते है जब चलचित्र की भांति चहुं ओर उसे मुट्ठ मारता हुआ उसका जवान बेटा अभिमन्यु ही नजर आने लगता है। माँ शब्द की रट लगाए जोरदार सिसकियां भरता हुआ वह अपने दोनो हाथों से अपने अत्यंत सुंदर व तने हुए लंड को तीव्रता से मुठिया रहा था जिसके काल्पनिक चित्रण मात्र ने कब वैशाली की लज्जा को उसकी कामुत्तेजना मे परिवर्तित कर दिया, वह नही जान सकी।

अपने आप वह स्लैब पर झुक गई, कपकपती टांगें फैलने लगीं, दायां हाथ बिना किसी अतिरिक्त रुकावट के टागों की जड़ से जोंक--सा चिपक गया, उंगलियां मैक्सी समेत कच्छी को चूतमुख पर बलपूर्वक घिसने लगीं, सूखा मुंह नमी तलाशने हेतु खुल गया, कमर धनुषाकर तन उठी, पैर के पंजे फर्श मे धंसने लगे और अंततः इन सभी लक्षणों से जोड़ से वैशाली को समझ आ गया कि जीवन मे दूसरी बार वह यूं खुलेआम मुट्ठ मारने लगी थी। अभिमन्यु हॉल मे है और किचन का दरवाजा भी खुला है, पुनः बेटे द्वारा रंगे हाथों पकड़े जाने का भय और उस भय से पैदा होता असीमित रोमांच जैसे तत्काल उस कामुक माँ को अधिकाधिक उत्साह से भरने लगा था।

"हाय रे बेशर्म, आखिरकार तुम अपनी माँ से भी तुम्हारे नाम की मुट्ठ मरवाने मे सफल हो गए। उफ्फ! आओ उन्ह! आओ मन्यु, खुद अपनी आँखों से देख लो। अब हमारे बीच कोई अंतर नही रहा, आहऽऽऽऽ! तुम्हारी माँ, उन्ह! तुम्हारी अपनी माँ भी तुम्हारी ही तरह बेशर्म, आह! सफा बेशर्म बन चुकी है मन्युऽऽ" अपने जबड़ों को भींच अपने स्वर दबाने की प्रयासरत वैशाली अगले ही क्षण स्खलन के चर्मोत्कर्ष को पाने लगती है, उसके पापी काल्पनिक चित्रण मे अभिमन्यु भी उसके साथ ही झड़ रहा था। अंतर बस इतना--सा कि वह स्वयं के स्खलन को महसूस भर कर सकती थी मगर बेटे के लंड के फूले हुए सुपाड़े से लगातार बाहर आती उसके वीर्य की लंबी-लंबी धारें वह स्पष्ट देख पा रही थी, मानो प्रत्यक्ष उसका बेटा उसके समक्ष ही स्खलित हो रहा हो।
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अपने कमरे के अटैच बाथरूम मे बंद शॉवर के नीचे खड़ा अभिमन्यु अब से कुछ वक्त पहले बीती घटना पर बड़ी गंभीरता से गौर कर रहा है। हालांकि अपनी माँ के किचन मे जाते ही वह भी फौरन कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया था, वह स्वयं वैशाली के पीछे जाना चाहता था मगर चाहकर भी अपना कदम आगे नही बढ़ा पाया और इसके ठीक उलट अपने कमरे के भीतर लौट आया था।

"तुम बदल गई हो मॉम, सचमुच बदल गई हो" अपने दाएं हाथ की मुट्ठी में कैद वह अपनी माँ की कच्छी को घूरते हुए बड़बड़ाया और फिर एकाएक मुट्ठी खोलने के पश्चात कच्छी को सीधे अपनी नाक से सटाकर बारम्बार गहरी-गहरी सांसे लेने लगता है।

"उफ्फऽऽ! कहीं मैं पागल ना हो जाऊँ" अपनी माँ के बदन की सच्ची मादकता से परिचित होकर अभिमन्यु चहक उठा था, कच्छी मे रची-बसी वैशाली के तन की सुगंध सूंघते हुए वह बाएं हाथ से अपने पत्थर समान कठोर लंड को तीव्रता से मुठियाने लगता है। बीते चार-पांच घंटो से उसकी जवानी लगातार उससे रहम की भीख मांग रही थी, अब वह चाहकर भी अपने शरीर के भीतर निरंतर उबल रहे लावे को और अधिक उपेक्षित नही कर सकता था।

"मैं जानता हूँ माँ कि यह गलत है, बिलकुल गलत है पर मैं तुम्हारे इल्जाम को झूठा साबित नही होने दूंगा, आई एम सॉरी मम्मी" अपनी इसी सोच के साथ कामलुलोप अभिमन्यु फौरन अपनी माँ की कच्छी को उत्तेजना की मार से थरथराते अपने लंड के इर्द-गिर्द लपेटकर, अत्यंत आक्रमकता से मुट्ठ मारना शुरू कर देता है। अपने सूख चुके होठों पर तेजी से जीभ फिरते हुए वह अपने बाएं हाथ से, गाढ़े वीर्य से लबालब भरे अपने टट्टों को भी सहलाने लगा था।

कहते हैं पाप करना और पाप मे भागीदार बनना, दोनो की एक सी सजा होती है। एक तरफ वैशाली है जो खुलेआम किचन के भीतर पाप करने मे व्यस्त थी और ठीक उसी वक्त दूसरी तरफ अभिमन्यु है जो एकांत मे बाथरूम के अंदर उसी पापी कृत्य मे लिप्त है, सबसे बड़ी समानता यह कि दोनो ही अबोध नही बल्कि पूर्ण समझदार पापी हैं। माँ-बेटे के लिए हाथ से मिलने वाला सुख नितांत अनूठा है मगर संभोग की तृप्ति महज हाथों से मिलने लगे तो कोई पापी ही क्यों बने?

"आहऽऽ! इतना मजा तो उस भैन की लौड़ी सुधा की कच्छी भी नही दे पाई थी जितना मजा तुम्हारी कच्छी दे रही है माँ। आई एम सॉरी मम्मी, ओह! आई एम सॉरी" कपकपाती टांगें बीच मे कहीं उसका साथ ना छोड़ दें इस कारण अभिमन्यु दीवार से टिक गया था, रह-रहकर उसकी सुर्ख आँखों मे उसकी माँ की लाल ब्रा के भीतर कैद उसके गोल-मटोल अधनंगे मम्मे घूमने लग जाते जिसके प्रभाव से उसका दायां हाथ और तेजी से उसके लंड को पीटने लगता।

"मैं लाऊँगा तुम्हारे लिए नई ब्रा और कच्छी, उन्ह! उन्ह! तुम उन्हें पहनोगी ना माँ? आहऽऽऽऽ पहनोगी माँ, तुम उन्हें जरुर आहऽऽऽऽऽऽ!" अभिमन्यु की नीच इच्छा के समर्थन मे तत्काल उसके बेहद सूजे बैंगनी रंगत के सुपाड़े ने गाढ़े वीर्य की लंबी-लंबी फुहार उगलनी शुरू कर दी और जो तीव्रता से सीधे सामने की दीवार से टकराने लगती हैं। उसकी आंखों के समक्ष जैसे पलभर को अंधेरा सा छा गया था, निचला धड़ एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली ऐंठन से जकड़ा हुआ और साथ ही लगातार लगते हर झटके पर उसके टट्टे पहले से कहीं अधिक मात्रा व गति से वीर्योत्सर्जन करने लगते। ग्लानिस्वरुप जो वह बार-बार अपनी माँ से माफी मांगे जा रहा था इस मनभावन स्खलन को पा लेने के उपरान्त धीरे-धीरे उसका तन और मन दोनो ही शांत होते जा रहे थे।

"उफ्फ! तुम ...तुम जरूर उन्हें पहनोगी माँ" जोरदार हंपाई लेते हुए अभिमन्यु ने एक अंतिम नजर अपने अधसिकुड़े लंड और उसके घेरे पर लिपटी वैशाली की कच्छी पर डाली तो अपने आप उसके चेहरे पर पूर्व संतुष्टि के भाव उमड़ आते हैं। कच्छी की काली रंगत पर उसके सफेद वीर्य की बूंदे उसे चांद पर दाग समान नजर आती हैं जबकि असलियत मे चांद सफेद और उसपर लगा दाग काला होता है।

"हे हे ... हा हा ...हू हू" अपनी मूर्ख तुलना पर अजीब-अजीब आवाजों मे जोर से हँसता हुआ वह पागल अपने पूरी तरह से सिकुड़ चुके लंड को अपने उसी दाएं हाथ से गोल-गोल घुमते हुए फौरन नाचना शुरू कर देता है।

नहा-धोकर धुले कपड़े पहन अभिमन्यु बेझिझक सीधा वैशाली के कमरे के खुले दरवाजे के भीतर प्रवेश कर गया। बिस्तर की पुश्त से अपना सिर टिकाए लेटी उसकी माँ के माथे पर उसके दाएं हाथ की उलटी कलाई रखी देख, वह अपने चलायमान कदमों की गति मे परिवर्तन लाया और हौले-हौले कदमों से ठीक उसके बगल मे जाकर खड़ा हो जाता है। उसकी माँ ख्यालों मैं गुम थी, उसके ख्यालों की गहराई वह इस वजह से माप गया कि वह उसके बिस्तर के बेहद करीब खडा़ था और उसकी माँ को अबतक इसकी भनक तक नही लग पाई थी।

"मॉम! मैं थोडी़ देर को बाहर चला जाऊं, टाइम से लौट आऊँगा" अभिमन्यु ने ज्यों ही कहा वैशाली चौंकते हुए उठ बैठी, आखिर वह क्यों ना चौंकती? जिसके दिल मे चोर बसा हो उसका बात-बेबात चौंकना कोई विशेष बात नही और यह भी सत्य था कि चौंकने से पूर्व वह अपने बेटे के ही ख्यालों मे गुम थी।

"क ...क्यों?" वैशाली ने हकलाते हुए पूछा फिर एकाएक अपनी मैक्सी की अस्त-व्यस्त हालत को सुधारने मे अपनी हकलाट को छुपाने लगती है।

"कुछ नोट्स लेने हैं और बाइक मे पेट्रोल भी भरवाना था वर्ना कल कॉलेज टाइम से नही पहुँच पाऊंगा" अभिमन्यु ने बताया।

"कैसे नोट्स? और पेट्रोल के लिए तो मैं तुम्हें लगभग रोज ही पैसे देती हूँ। कहीं नही जाना, जाओ अपने कमरे मे वापस" वैशाली अपने दाएं हाथ की प्रथम उंगली का इशारा कमरे के खुले दरवाजे की ओर करते हुए क्रोधित स्वर मे बोली, अब चौंकाने की बारी उसके बेटे की थी। हालांकि यह उसका झूठ-मूठ का क्रोध था, वह अभिमन्यु को जताना चाहती थी कि भले ही उनके रिश्ते के बीच अमान्य--सा खुलापन आया था मगर इसका प्रभाव बेटे की सजा पर जरा सा भी नही पड़ा था।

"कम अॉम मम्मी, मैं कोई छोटा बच्चा नही जिसे तुम इस बुरी तरह डांटोगी" अपनी माँ की क्रोध पर अभिमन्यु के तेवर भी एकदम बदल गए और वह वैशाली को पुनः चौंका देता है।

"सॉरी माँ, रियली सॉरी। मैं तो बस हमारे लिए रिजर्वेशन करवाने जा रहा था" उसने पिछले कथन मे जोड़ा, इस बार उसका स्वर शांत था।

"कैसा रिजर्वेशन? हम कहाँ जा रहे हैं?" वैशाली ने तत्काल पूछा, यह तीसरी बार था जो वह लगातार चौंकी थी।

"आज मेरी तरफ से ट्रीट है, पिज्जा हट मे" अभिमन्यु मुस्कुराते हुए बोला और बिस्तर पर बैठ जाता है।

"ओह! पैसे मिले नही की बर्बादी शुरू" बात वैशाली की समझ मे आते ही वह भी मुस्कुरा उठी, जाने कितना अरसा बीत गया था जब वह आखिरी बार बाहर किसी रेस्तरां मे खाना खाने गई।

"मैं माणिकचंद जी के पैसों से तुम्हें ट्रीट नही दे रहा, मैं तुम्हारे ही पैसों को तुम्हारे साथ शेयर करना चाहता हूँ। मेरी पॉकेटमनी है पाँच हजार और तुमने लेट इंटरेस्ट लगाकर मुझे दिये सात हजार, तुम कितनी बड़ी मक्खीचूस हो मम्मी मैं अच्छे से जानता हूँ। यह एक्सट्रा दो हजार तुम्हारे जोड़े हुए पैसे हैं और जो पता नही तुमने मुझे क्यों दे दिए?" अभिमन्यु कुछ मजाक और कुछ प्यार मिश्रित स्वर मे बोला, जानना तो वह भी चाहता था कि हमेशा पाई-पाई जोड़ने वाली उसकी माँ ने अपने खुद के जोड़े हुए पैसे आखिर उसे क्यों दे दिए।

"इधर आओ, कान मे बताती हूँ" वैशाली प्रेमपूर्वक उसे अपने पास आने का इशारा करते हुए बोली तो फौरन अभिमन्यु अपना दायां अपनी माँ के करीब ले आता है।

"मेरे पति की बेज्जती, मेरे ही मुंह पर बेशर्म और मैं कंजूस। हम्म!" बेटे के कान मे कुछ कहने की बजाए वैशाली उसका कान मोरोड़ते हुए बोली।

"आहऽऽ मम्मी छोड़ोऽऽ" अभिमन्यु दर्द होने का नाटक करते हुए कराहा जबकि उसकी माँ ने उसका कान उतना ही मरोड़ा था जितना वह आराम से सह सकता था।

"सबकुछ तो तुम्हारा ही है मन्यु। यह घर, जायजाद, रुपया-पैसा सबकुछ तुम्हारा है बेटा" कहकर वैशाली उसके मरोड़े हुए कान को पटापट चूमने लगती है, उसकी उंगलियां हौले-हौले बेटे के बालों मे घूम रही थीं।

"और माँ तुम?" अभिमन्यु ने एकाएक अपना चेहरा मोड़ते हुए पूछा, जिसके नतीजतन उसकी माँ के होंठ उसके कान से फिसलते हुए उसके दाएं गाल और होंठों के अंत पर आकर ठहर जाते हैं। यह ना बेटे ने जानबूझकर किया था और ना ही उसकी माँ ने, तो उतने जल्दी दोनो संभल भी नही पाते।

"बोलो ना माँ, और तुम?" इसी बीच अभिमन्यु ने पुनः अपना प्रश्न दोहरा दिया, जिसे पूछते वक्त उसकी गरम सांस के झोंके सीधे वैशाली की नाक के बाएं नथुएे के भीतर प्रवेश कर जाते हैं।

"वीको वज्रदंती? मी टू" जाने क्यों और कैसे अकस्मात् वैशाली ने खुद को संभाला और अपना चेहरा बेटे के चेहरे से दूर ले जाते हुए बोली।

"हा हा हा हा" बेडरूम एकसाथ दोनो की खिलखिलाहट से गूंज उठता है।


"नौटंकी नही मॉम, प्लीज आन्सर मी ना" अभिमन्यु ने अपनी रुकाय ना रूकने वाली हँसी को जबरन रोकने की कोशिश करते हुए कहा, मानो जैसे कोई जिद पकड़ गया हो। कुछ देर तक तो वैशाली अपने पेट पर हाथ रखे जोरों से हँसती रही मगर जब अचानक ही उसके बेटे ने हँसना बंद कर दिया, वह स्वयं उसकी आँखों मे झांकने लगती है।

"जवाब दो माँ, और तुम?" अभिमन्यु का वही प्रश्न जारी था। अपना पेट पकड़ कर हँसने के कारण वैशाली की आँखें नम हो गई थी और उसके खुले बात तितर-बितर होने से उनकी कुछ लटें उसके चेहरे पर भी लटक आई थीं। अभिमन्यु को तो जैसे सांप सूंघ गया, वह अपलक बस अपनी माँ के अक्लपनीय सौन्दर्य को ही घूरने लगा था। उसकी माँ उसे सुंदरता की मूरत ही नही बल्कि साक्षात कामदेवी नजर आने लगी थी और ज्यों ही उसकी माँ ने अपने बालों की एक लंबी लट अपने चेहरे के बाएं भाग से हटाई, घबराकर वह झटके से अपना दायां हाथ सीधे अपने धड़कना भूल गए दिल पर रख देता है।

"मैं ...अम्मऽऽ" अपने बेटे की तात्कालिक स्थिति की प्रत्यक्ष गवाह वैशाली की अधेड़ आँखें बिन बोले ही सबकुछ समझ गई थीं और मुस्कुराकर वह भी अपना दायां हाथ अपने दिल पर रख लेती है।

"हाँ माँ तुम?" दिल मे उठे दर्द से बेहाल अभिमन्यु ने अब भी हार नही मानी थी, अत्यंत तुरंत पूछता है। अपने बेटे की उत्सुकता ने वैशाली को अंदर तक हिलाकर रख दिया था पर वह परिपक्व स्त्री अपने अंतर्मन का हाल अपने चेहरे पर कतई नही आने देती। एकपल को उसने सोचा क्यों ना बेटे को वही सुना दे जिसे सुनने को वह इतना बेकरार था मगर चाहकर भी वह खुद को तोड़ नही पाती।

"मैं हूँ अपने पति माणिकचंद जी की" कहकर एक बार फिर से वैशाली ने हँसना शुरू कर दिया और टूटे दिल के संतोष के साथ अभिमन्यु भी झूठी हँसी हँसने लगता है। उसकी माँ ने कुछ गलत कहाँ कहा, वह सचमुच अपने पति की ही तो थी और ऐसा सोचकर वह तेजी से बिस्तर से नीचे उतर जाता है।

"तुम तैयार रहना माँ, मैं घंटे भर मे आ जाऊंगा" कहकर अभिमन्यु बिना अपनी माँ के चेहरे को देखे उसके बेडरूम से बाहर निकल जाता है, वह जानता था कि यदि कुछ पल और वह वहाँ रुकता तो पक्का रो देता। शायद यही सोचकर वैशाली ने भी उसे नही रोका वर्ना उसका बेटा जरूर उसकी आखों से झर-झर बहने लगे आँसुओं को देख लेता।
घर के मुख्य द्वारा से बाहर निकलकर अभिमन्यु सीधे अपनी बाइक के पास पहुँचा और उसपर बैठ क्षणिक पलों तक कुछ सोचने-विचारने मे लगा रहता है, उसके दोनो हाथ उसकी सोच के साथ ही हिलने-डुलने लगे थे जैसे उसकी सोच से मूक वार्तालाप कर रहे हों।


"हम्म! यह मस्त रहेगा, बिलकुल ठीक। हाँ यही मस्त रहेगा" वह अचानक से बड़बडा़या और सहसा उसके मायूस चेहरे पर पुनः मुस्कान लौट आती है। तत्पश्चात उसने बाइक दौड़ा दी, यकीनन उसकी सोच पूरी हो चुकी थी।
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अपने बेडरूम के बिस्तर पर बैठी वैशाली काफी देर तक अपने आँसुऔं मे ड़ूबी रही, उसे इस बात पर रोना नही आ रहा था कि उसने अभिमन्यु की चाह को अपना समर्थन नही दिया था बल्कि वह इसलिए दुखी थी कि पलभर मे कैसे एक बेटा अपनी सगी माँ की ओर इतनी गम्भीरता से आकर्षित हो गया था? स्त्रियां तो ऐसे लघु आकर्षणों पर फूली नही समातीं, काश! कि वह सिर्फ एक स्त्री ही होती तो कितना अच्छा होता मगर स्त्री होने के साथ-साथ एक विवाहित माँ होने का भी गौरव उसे प्राप्त था और ऐसे मे उसका बेटा चाहे कितना भी अधिक उसकी ओर आकर्षित हो जाता, रहता तो वह एक पराया मर्द ही।

"माँ भी तुम्हारी है अभिमन्यु क्योंकि वह भी इस घर की जायजाद मे शामिल है और जिसके इकलौते वारिस तुम ही हो बेटा, सिर्फ तुम ही हो" खुद से ऐसा बारम्बार कहते हुए वैशाली तत्काल अपने आँसुओं के पोंछ लेती है, निश्चित उसके शब्दों से उसके ममतामयी दिल का वह बोझ कम होने लगा था कि जाने-अंजाने जीवन मे पहली बार उसने स्वयं अपने बेटे का दिल तोड़ा था।

चेहरे पर टूटी-फूटी मुस्कान लिए वैशाली फौरन बिस्तर से नीचे उतरी और सर्वप्रथम उसने घर के मुख्य द्वार को लॉक किया, फिर वापस अपने बेडरूम मे लौटकर सीधे अटैच बाथरूम के भीतर घुस जाती है। अभिमन्यु ने उसे तैयार रहने को कहा था और पिछला आधा घंटा वह अपनी सोच मे ही बिता चुकी थी। अच्छे से मुंह हाथ धोकर वह अपने वार्डरोब मे भरी पड़ी साड़ियों मे से अपनी सबसे पसंदीदा साड़ी का चुनाव करने लगती है और जल्द ही उसने उस मेहरुन रंगत की साड़ी को चुन लिया जिसे बीते मदर्स डे पर उसे उसकी बेटी अनुभा ने तोहफे मे दिया था।

"ओह हो! इस साड़ी का पेटीकोट तो मैच ही नही हो रहा और फिर पहनने को साफ-सुथरी कच्छी भी तो नही बची" वैशाली पेटीकोट का रंग साड़ी के रंग से हल्का पाकर मायूसी से बुदबुदाई, उसने सहसा गौर किया कि कैसे अब वह 'कच्छी' जैसे देशी शब्द का स्वतः ही उच्चारण करने लगी थी। शर्माते हुए पेटीकोट को बिस्तर पर फेंक उसने मैक्सी अपने गदराए बदन से अलग कर दी और ड्रेसिंग टेबल के सामने जाकर खडी़ हो जाती है।

जीवन मे दूसरी बार उसे अपने बदन मे एक अजीब-सा बदलाव नजर आ रहा था, ठीक वैसा बदलाव जैसा उसने अपनी बीती जवानी मे महसूस किया था जब वह अपने कुंवारेपन से मुक्त होने को पल-पल तड़पा करती थी। आज पुनः उसी तड़प से उसका सम्पूर्ण बदन टूट रहा है, उस तड़प के टूटने की प्रतीक्षा मे आज फिर उसका अंग-अंग बिन छुए ही फड़कने लगा है मानो किसी जवान, बलिष्ठ मर्द के नीचे दब जाने की उसकी इच्छा दोबारा जीवंत हो गई हो जिस इच्छा के तहत उसने कभी अपने भावी पति की कल्पना की थी।

कांच मे अपने अक्स को देख वह अपने बाएं हाथ की उंगलियां ब्रा के भीतर कैद अपने गोल-मटोल मम्मों के ऊपरी फुलाव पर घुमाने लगती है, उसे तत्काल वह क्षण याद आ गया जब डाइनिंग टेबल पर बैठा अभिमन्यु कितनी बेशर्मी के साथ उसके मम्मों के इसी फुलाव को खा जाने वाली नजरे घूरे जा रहा था।

"माँ के मम्मों पर बेटे का हक नही होगा तो क्या किसी माणिकचंद का होगा?" खुद के ही सवाल पर वैशाली हँसने लगी, अपने दोनो हाथ पीठ पर ले जाकर उसने अपनी ब्रा का हुक खोल दिखा और उसे हाथों से बाहर निकाल बिस्तर पर उछाल देती है।

"ऐसे मत घूर बिच, अब तेरी ही बारी है" कांच मे देखते हुए वह अपने बदन पर बचे आखिरी वस्त्र, अपनी कच्छी से बोली और बड़ी अदा के साथ फौरन उसे सकराकर नीचे फर्श पर गिरने के लिए छोड़ दिया।

"बेशर्म निगोड़ी तू है मेरा मन्यु नही, मरोड़ना तुझे चाहिए उस बेचारे का कान नही। पूरे दिन से बह रही है, मेरी तीनो कच्छियों को गंदा कर डाला। अब क्या पहनूं पेटीकोट के नीचे? तेरे कारण आज पहली बार मुझे बिना कच्छी पहने घर की चौखट के बाहर कदम रखना पड़ेगा" अपने अश्लील कथन अनुसार ही वैशाली ने अपने दाएं हाथ के अंगूठे और प्रथम उंगली के बीच दिनभर से निरंतर रिस रही अपनी चिपचिपी चूत के दोनो स्पंदनशील होंठ एकसाथ भींच लिए और सिसियाते हुए बलपूर्वक उन्हें मरोड़ने लगती है, मानो सत्यता मे ही उन्हें सजा दे रही हो। उसकी कामुक हँसी का तो कोई पारावार शेष ना था, किसी भयानक मनोविकार से ग्रस्त पागल की भांति लगातार खिखियाते हुए पूरे जोशो-खरोश से वह अपनी चूत के अत्यंत सुंदर मुख को तीव्रता से उमेठे जा रही थी।

"उन्ह! उन्ह! तेरी गलती भी नही मुनिया। उफ्फ! रो-रोकर तू ...तू तो बस अपनी स्वभाविक चाह जता रही है, गूंगी जो है ठहरी। उन्ह! बोल नही सकती ना कि तेरी एक मोटे और लंबे--से लंड से चुदने की इच्छा है मगर किसके लंड से? तेरा मालिक माणिचंद तो यहाँ है नही, फिर किसके? बोल! बोल! किसके?" जो विध्वंशक, पापी शब्द उस मर्यादित माँ ने अपने सम्पूर्ण बीते जीवन मे कभी अपने होंठों पर नही आने दिए थे, सहसा उनके एकाएक मुंह से बाहर आते ही वैशाली अपने बाएं हाथ के अंगूठे और प्रथम उंगली के बीच अपने वास्तविक होंठों भी कसकर जकड़ लेती है। यह सोचकर कि अब उसके स्त्री शरीर के वह दोनो मुख्य अंग उसने हर संभव तरह से दबा दिए हैं हमेशा जिनके ही कारण यह धरती अनगिनत बार लहुलुहान हुई थी, मगर मन का क्या? वह तो पूर्व स्वतंत्र है।

"आहऽऽ! अभिऽऽमन्युऽऽऽऽ" अपने चंचल मन के हाथों विवश सचमुच पापी बनने को उत्सुक, चुदाई की प्यासी वह अत्यंत कामलुलोप माँ दिन मे तीसरी बार अपने सगे बेटे के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्मरण मात्र से ही स्खलित होने लगती है।

कहते हैं कि पहली बार कोई पापी कृत्य करने के उपरान्त मनुष्य ग्लानी भाव से तड़प उठता है, दूसरी बार मे उसकी ग्लानी कुछ कम हो जाती है और जब वह बारम्बार पाप करने का आदि हो जाए तब उसके भीतर किसी भी प्रकार की कोई ग्लानी शेष नही रहती। अपनी कच्छी से अपनी स्खलित चूत का गाढ़ा रस पोंछते हुए वैशाली का मन-मस्तिष्क बेहद शांत था बजाए इसके कि वह रोए, दुखी हो; वह पूर्णरूप से संतुष्ट, निश्चिंत बिलकुल मस्त मलंग थी।

धुली ब्रा, ब्लाउज और बिना कच्छी के पेटीकोट पहनकर वैशाली अपनी नई महरुन साड़ी भी पहन चुकी थी, पेटीकोट का हल्का रंग साड़ी को एक नया व काफी शानदार फेन्सी लुक दे रहा था। अपने प्राकृतिक सुंदर चेहरे के श्रृंगार के नाम पर अधिकतर वह काजल और मैचिंग लिपस्टिक का ही प्रयोग करती थी, अपनी अत्याकर्शक बड़ी-बड़ी आँखों मे काजल लगाकर उसने मूंगिया रंगत के अपने भरे हुए होंठ गहरे महरुन रंग की लिपस्टिक से रंग लिए। तत्पश्चात वार्डरोब के लॉकर से उसने अपने उन गहनों का बॉक्स बाहर निकाला जिन्हें उसने अपनी बेटी अनुभा की शादी मे स्वयं के लिए बनवाया था, खैर ज्यादा कुछ उस बॉक्स मे नही था, मणिक की आर्थिक हालत को देख एक जिम्मेदार पत्नी होने का फर्ज निभाते हुए उसने स्त्री मोह की मुख्य वस्तु का सिरे से त्याग कर दिया था। पूर्व से अपनी दायीं नाक के नथुए मे जड़ी लौंग की जगह उसने उसमे सोने का छल्ला पहन लिया, अपने कानों के टॉप्स बदलकर सोने की लटकनदार बालियां भी धारण कर लीं, शायद इसलिए क्योंकि यह छल्ला और बालियां अभिमन्यु के विशेष आग्रह पर उसने बनवाए थे। पूरी तरह से तैयार होकर एक नजर कांच मे खुद को निहारने के उपरान्त उसने अपनी मैक्सी व अन्य कपड़ो को यथोचित स्थान पर रख दिया और बेडरूम से बाहर निकल जाती है।

वैशाली को हॉल के सोफे पर बेठे-बैठे तयशुदा समय से पैंतालीस मिनट ज्यादा बीत चुके थे मगर अभिमन्यु अबतक नही लौटा था ना ही देरी होने के संबंध मे उसका कोई फोन आया था और वह खुद अपने बेटे को कॉल करना नही चाहती थी। वह नही चाहती थी कि अभिमन्यु अपनी माँ की बेसब्री का ज्ञाता हो जाए, वह जान ना ले कि उसकी माँ उसके साथ ट्रीट पर जाने के लिए मरी जा रही थी।

पैंतालीस मिनट से एक घंटा और होते-होते ढ़ाई घंटे बीत गए पर अभिमन्यु की वापसी के विषय मे उसे कुछ भी पता नही चल पाया था। पल-पल दीवार घड़ी को ताकती वैशाली की नम आँखें ना जाने कितनी बार बह जाने की कगार पर पहुँच चुकी थीं मगर एक आस कि उसका बेटा उसे ट्रीट पर जरूर ले जाएगा और कहीं आँसू बहकर उसकी आँख के काजल को धो ना दें, वह जरा भी नही रोई थी मगर उसका धैर्य अब जवाब देने लगा था। अपने बेटे की रश ड्राइविंग की जानकर वह माँ अकस्मात घड़ी से अपनी नजर हटाकर सामने की टेबल पर रखे अपने मोबाइल को घूरने लगी।

"तू तो ऐसे कर रही है जैसे यह कोई आम--सी ट्रीट नही बल्कि तेरी पहली डेट हो" अपनी सोच के समर्थन मे फीकी हँसी हँसते हुए वैशाली ने तत्काल कपड़े बदल लेने का निश्चय किया, चूंकि उसका दिल भी खट्टा हो चुका था और आगामी इंतजार उसकी सहनशक्ति से बाहर था मगर अपने बेडरूम मे जाने से पहले वह एकबार अभिमन्यु से बात अवश्य करना चाहती थी ताकि जान सके कि ऐसा कौन--सा जरूरी काम आन पड़ा था जो वह अपनी माँ से झूठ बोलकर घर से बाहर गया था। उसे यह चिंता भी थी कि कहीं वह किसी मुसीबत मे ना पड़ गया हो, उसने टेबल से अपना मोबाइल उठाया और बेटे का नम्बर डायल कर देती है।

"सॉरी! सॉरी! सॉरी! सॉरी! बस दो मिनट, बस दो मिनट" पहली ही घंटी मे कॉल पिक कर अभिमन्यु ने बिना हैलो बोले सीधे माफी मांगनी शुरू कर दी और फिर फौरन कॉल कट भी कर देता है। लगभग दस मिनट बाद घर की बैल बजी तो वैशाली झूठे क्रोध के साथ दरवाजे की ओर बढ़ गई, जबकि सत्य तो यह था की एकाएक उसका रोम-रोम खिल उठा था।

"मैं खाना बनाने जा रही हूँ" बेटे के हॉल मे प्रवेश करते ही वैशाली गुस्से से बोली और मुड़कर किचन की दिशा मे चलने लगी।

"मॉम मैं इस गिफ्ट की तलाश मे लेट हो गया। आई एम सॉरी, माफ कर दो प्लीज" अपनी माँ के क्रोध को समझ अभिमन्यु उसे रोकते हुए बोला।

"कैसा गिफ्ट? और किसके लिए?" क्षणिक समय भी नही बीता कि वैशाली ने झटके से पलटते हुए पूछा, अभिमन्यु भी तबतक उसके करीब आ चुका था।

"अ रोज फॉर द मोस्ट ब्यूटिफुल एण्ड केयरिंग मदर अॉफ दिस वर्ल्ड" वह तुरंत अपने घुटनों पर बैठते हुए बोला, अपने दोनो हाथों मे पकड़ा लाल गुलाब उसने अपनी माँ की ओर बढ़ा दिया था।

"इसकी ... तलाश मे तुम्हें पूरे साढ़े तीन घंटे लग गए?" वैशाली का नकली क्रोध जारी था, गुलाब को अपने हाथ मे लेने की बजाय वह अपने दोनो हाथ कैंची के आकार मे ढ़ालकर उन्हें अपनी अपनी छाती के ऊपर रखते हुए पूछती है।
"ऐसा है और नही भी मम्मी, गुलाब तुम्हारी टक्कर का मिल सके इसी कारण मुझे देरी हो गई। वैसे एक और गिफ्ट भी लिया है मैंने" अभिमन्यु बेहद शरारती अंदाज मे बोला, अपनी माँ के भीतर आए बदलाव को समझने मे अब वह काफी तेजी से परिपक्व होता जा रहा था।

"अपनी माँ की टक्कर का, हुंह! शर्म करो शर्म पाखंडी कहीं के" वैशाली तुनकते हुए बोली तभी सहसा उसकी नजर उसके बेटे के बगल से नीचे फर्श पर रखे पॉलीबैग पर पड़ी, जिसपर भूल से पहले उसने गौर नही कर पाया था।

"उसमें क्या है मन्यु?" उसने फौरन उत्सुकता से पूछा।

"लड़कियों की यही गंदी आदत मुझे बिलकुल अच्छी नही लगती मॉम, गिफ्ट मे भी हमेशा साइज को ही प्रिफ्रेंस देती है" अभिमन्यु मायूसी से भरते हुए बोला, वह जानबूझकर अपनी माँ को एक लड़की की संज्ञा देता है और जिसका प्रभाव भी उसने तुरंत देखा, उसकी माँ सचमुच किसी नवयुवती की भांति चहक उठी थी।

"तुम जैसे लफंगों को मैं अच्छी तरह से जानती हूँ जिन्हें बात-बात पर बात निकालना आता है। लाओ इसे मुझे दो और अगर तुम्हारी नौटंकी खत्म हो गई हो तो मैं अब जाऊँ किचन मे" वैशाली गुलाब को छीनते हुए बोली, खैर था तो यह उसका नाटक मात्र। जीवन मे पहली बार किसी मर्द ने उसे अपने घुटनो पर बैठते हुए गुलाब भेंट किया था और जिसके नतीजन भीतर ही भीतर उसकी प्रसन्नता का कोई पारावार शेष ना था। एकाएक वह गुलाब की सुगंध सूंघने के लिए उसे अपनी नाक के करीब ले जाने लगी मगर ज्यों ही अभिमन्यु से उसकी नजरें टकराईं, वह अपने हाथ को तीव्रता से वापस नीचे ले आती है।

"इतना इंतजार तो कभी मुझे तुम्हारे पापा ने भी नही करवाया और तुम्हारी चिंता से घिरी रही सो अलग" वह पिछले कथन मे जोड़ती है। अभिमन्यु को अपनी माँ के मुंह से जो विशेष बात सुनने की चाह थी, वह चाह अपने-आप वैशाली ने पूरी कर दी थी।

"चलो ठीक है, गुलाब के लिए शुक्रिया नही कहा तो कोई बात नही मगर यह दूसरा गिफ्ट मेरे दिल के बेहद करीब है मम्मी" पॉलीबैग को पकड़कर अभिमन्यु फर्श से खड़ा हो जाता है, उसने अपने प्यार भरे शब्दों से वैशाली की उत्सुकता को काफी अधिक बढ़ा दिया था।

"पहले तुम बेशर्म थे, फिर पाखंडी, लफंगे और अब आशिकाना अंदाज मे बात करने लगे हो, जरूर इस पॉलीबैग मे कुछ तो अजीब है" कहकर वैशाली पॉलढीबैग को घूरकर देखने लगी मगर उसका रंग गहरा नीला था तो वह कोई खास अनुमान नही लगा पाती है।

"खुद ही देख लो इसमे ऐसा क्या है मम्मी जो तुम्हारे बेटे के दिल के इतना करीब है" लगभग अपने पिछले कथन को ही पुनः दोहराते हुए अभिमन्यु पॉलीबैग अपनी माँ के सुपुर्द कर देता है और उसके हाथ से गुलाब खुद ने ले लिया। वैशाली पहले पॉलबैग को ऊपर से टटोलने लगी, उसके हल्के वजन से उसे अहसास हुआ जैसे उसके भीतर कोई वस्त्र था। साड़ी का विचार मन मे आते ही वह तत्काल उसे नकार देती है क्योंकि साडी़ पहनने वाली हर स्त्री को उसके विषय मे बारीक से बारीक जानकारी रहती है। फिर इसमे क्या हो सकता है? वह अपने ही सवाल पर थोड़ा झल्ला सी गई और अंततः पॉलीबैग का मुंह खोलकर उसके भीतर झांकने लगती है।
"नही! नही! नही! नही! यह नही, बिलकुल ...यह बिलकुल नही मन्यु" पॉलीबैग के भीतर झांकते ही वैशाली मानो उछल--सी पड़ती है और फौरन पॉलीबैग के खुले मुंह को उसने लगभग चीखते हुए बंद कर दिया था।


"तुमने दिन मे कहा था कि तुम्हारी ब्रा और क ...क्च ...कच्छियों को पहनने मे तुम्हें दिक्कत होती है, कुछ साइज इश्यू के बारे मे बताया था तुमने" अभिमन्यु पूरा साहस जुटाते हुए कहता है पर फिर भी 'कच्छी' शब्द का उच्चारण करने मे वह हल्का--सा हकला ही जाता है। चलो एक बात की तसल्ली तो उसे जरूर हुई थी कि उसकी माँ ने एकाएक उसे थप्पड़ नही मारा वर्ना संसार की ऐसी कौन सी माँ होगी जो बेटे द्वारा तोहफे मे दिए गए अंतर्वस्त्रों को हँसकर कबूल कर ले।

"उससे तुम्हें कोई मतलब नही होना चाहिए अभिमन्यु" वैशाली अपने पेट मे एकदम से उठनी शुरू हुई मरूढ़ को दबाते हुए बोली। वह सकते मे तो थी मगर जाने क्यों अंदरूनी तौर पर उसे जरा--सा भी क्रोध नही आ रहा था, कोई ग्लानी महसूस नही और ना ही भय, घबराहट या झिझक का कोई अतिरिक्त अहसास। यकीनन यह उसके लगातार तीन बार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही सगे बेटे के बारे मे सोचते हुए मुट्ठ मारने का भीषण परिणाम था जो अनाचार की ओर तेजी से अग्रसित होती जा रही उस माँ के भीतर सिवाय शर्म मात्र के कोई अन्य भाव बिलकुल उत्पन्न नही हो रहा था।

"अगर मेरा वाकई उससे कोई मतलब नही होता तो तुम मुझसे ऐसा झूठ कभी नही बोलती" अपनी माँ की ओर से मिले सकारात्मक संकेत को महसूस कर अभिमन्यु दुष्ट हँसी हँसते हुए बोला। जाने कितने अरसे बाद उसकी माँ ने अपनी नाक और कान मे अपने बेटे के सबसे पसंदीदा आभूषण पहने थे जिन पर से अपनी नजरें हटा पाना उसके बस से बाहर हो चला था।

"कैसा झूठ? म ...मैं क्यों बोलने लगी तुमसे झूठ" वैशाली हकलाते हुए पूछती है, जितनी हैरत उसे बेटे के इस अश्लील तोहफे पर नही हुई थी उससे कहीं अधिक वह उसके कथन को सुनकर चौंक पड़ी थी।

"मैं उसी साइज की ब्रा और कच्छी के तीन सेट खरीदकर लाया हूँ मॉम जिस साइज के फिलहाल तुम पहन रही हो। तुम्हें तो झूठ बोलना नही आता माँ" अभिमन्यु फौरन उसे आँख मारते हुए बोला, अब वह पूरी तरह से भय मुक्त हो चुका था।

"तुम जैसे बेशर्म लोगों की सबसे खास बात यही है मन्यु कि वह बात-बात पर बात पकड़ते हैं। अभी इसी वक्त जाओ और इन्हें वापस करके आओ, अपनी माँ को उसका बेटा इस तरह का गंदा तोहफा कभी नही दिया करता" अपनी चोरी पकड़ी जाने पर वैशाली लाज से दोहरी होती हुई बोली और पॉलीबैग तुरंत बेटे की ओर बढ़ा देती है।

"मॉम अब ये रिटर्न नही होंगे, डायरेक्ट एनामोर के आउटलेट से लाया हूँ" अभिमन्यु ने बताया।

"एनामोर? इतनी ब्रांडेड कंपनी? कहीं तुमने सारे पैसे तो खर्च नही कर दिए? फिर पॉलीबैग क्यों बदला?" वैशाली ने एकसाथ कई सवालों की झड़ी लगाते हुए पूछा। वह इस महंगे ब्रांड से तब परिचित हुई थी जब अनुभा ने अपने ससुराल जाने से पहले अपने नये अंडरगारमेंट्स एनामोर से ही खरीदे थे, वह अपनी बेटी के साथ वहाँ मौजूद थी और मात्र चार सेट का कैश मेमो लगभग साढ़े आठ हजार का बना था वर्ना इससे पहले दोनो माँ-बेटी कोई भी सस्ते अंडरगारमेंट्स पहन लिया करती थीं जैसे मिडिल क्लास की हर औरत पहनती है।

"तुम्हें बिलीव नही होगा मम्मी, आउटलेट मे बाय टू गैट वन फ्री का अॉफर चल रहा था और उसमे भी थर्टीफाइव परसेंट अॉफ था। तीन सेट सिर्फ ट्वेंटी सेवन हंड्रेड मे, है ना कूल? और हाँ मैंने पॉलीबैग इसलिए बदला ताकि एकदम से तुम्हारी मार ना खा जाऊँ और फिर यह जालिम समाज, यह मल्टी वाले मुझे बेशर्म नही समझते जो मैं अपनी ही माँ के लिए ब्रा-कच्छी खरीदकर ले ले जा रहा था" कहते वक्त अभिमन्यु की शैतानी अदा देखने लायक थी, उसका अपने दांत बाहर निकालकर बेहूदगी से खिखियाना उसकी माँ को हया से गड़ा देता है। उसने एक नजर ऊपर से नीचे तक बेटे को देखा और पाया कि उसकी जींस के भीतर कैद उसका लंड पूरी कठोरता से तनकर खड़ा हो चुका था, जिसके नतीजतन उसकी जींस के ऊपर एक बड़े--से तम्बू का निर्माण हो गया था।

वैशाली क्षणभर मे कांप उठी, पहली बार प्रत्यक्ष वह अभिमन्यु के खड़े लंड को इतने नजदीक से देख रही थी। भले ही उसके बेटे का लंड अभी उसकी जींस के भीतर छुपा हुआ था मगर फिर भी अपने पूर्णविकसित आकार से उसने, अपने पति से तिरस्कृत चुदाई की इच्छुक उस कुंठित माँ को फौरन सिरहन से भर दिया था। दिन मे तीन बार स्खलित हो चुकने के बावजूद एकाएक वह अपनी चूत मे एक और नई तड़प महसूस करने को विवश हो जाती है। उसे अपनी खुद की स्थिति बहुत दयनीय नजर आने लगी जब वह चाहकर भी अपनी आश्चर्य से फट पड़ी आँखें अपने बेटे की जींस के तम्बू से हटा नही पाती।

"कुछ भी हो मन्यु तुम्हारी माँ होने के नाते मैं तुम्हारे इस तोहफे को नही ले सकती और रिटर्न यह होगा नही। अब एक ही रास्ता बचा है कि इसे मैं अपनी होनेवाली बहू के लिए संभालकर रख लूं, ताकि अभी नही तो कम से कम फ्यूचर मे इसका यूज हो जाए" एकसाथ लज्जा, गुस्सा, निराशा और अनियंत्रित कमुत्तेजना से अभिभूत वैशाली ने जैसे-तैसे अपने बेटे के तम्बू से चिपकी अपनी नीच नजरों को हटाते हुए कहा और तीव्रता से पलटकर अपने बेडरूम की ओर चल देती है।

"मॉम इफ मेरी वाइफ का बदन तुम्हारे बदन की तरह ... वह क्या कहते है? हाँ छरहरा नही हुआ तो" कहते हुए अभिमन्यु भी अपनी माँ के पीछे चलने लगता है।

"प्लीज मम्मी इकसेप्ट कर लो ना मेरे गिफ्ट को, कितने प्यार से लाया हूँ" वैशाली के उसे ध्यान ना देने के बावजूद वह बोलता रहा।

"रुको तो माँ, अच्छा हम इस सब्जेक्ट पर बैठकर बात करें?" उसने चलते-चलते पूछा, दोनो माँ-बेटे बेडरूम के अंदर प्रवेश कर चुके थे।

"मॉम आई रियली लव यू, बहुत प्यार करता हूँ तुमसे। मेरी कोई गर्लफ्रेंड नही है, पहली बार किसी लड़की को गिफ्ट दे रहा हूँ। अब इसमे मेरा क्या फॉल्ट की तुम मेरी माँ हो, मेरी फीलिंग्स को कम से कम ऐसे तो न तोड़ो। प्लीज मॉम प्लीज" अभिमन्यु बिस्तर के पास पहुँचकर रुक जाता है, वैशाली अपना वार्डरोब खोल चुकी थी मगर जाने क्यों वह पॉलीबैग शेल्फ मे रख नही पाती। अपने बेटे के मुंह से ऐसी मार्मिक बातें सुनना उसे अच्छा नही लगा था, यह अवश्य था कि खुद के लिए अभिमन्यु के प्यार को वह बरसों से देखती आ रही थी और अब से थोड़ी देर पहले उसने उसकी आँखों मे स्वयं के लिए एक मर्द रूपी प्यार भी साफ महसूस किया था जब वह उसके लगातार एक ही प्रश्न पर अटके रहने के उपरान्त उसे अपना सच्चा जवाब देने की वजह से रोने लगी थी।

"तुम झूठे हो मन्यु। अगर तुम्हारी गर्लफ्रेंड नही तो तुम वर्जिन क्यों नही हो?" बिना अपना चेहरा घुमाए वैशाली ने उससे पूछा, उसे मालूम था कि ऐसी उलझी परिस्थिति मे उसके बेटे की निजता को भंग करता उसका यह सवाल बिलकुल उचित नही ठहराया जा सकता मगर सत्य जानने की इच्छा के हाथों मजबूर वह पूछ ही लेती है।

"प्रॉस्टिटूट" अभिमन्यु हौले से फुसफुसाया, जवाब देते समय एकपल को भी उसने अपने जवाब की निकृष्टता पर विचार नही किया था।

"वॉट!" वैशाली चौंकते हुए अत्यंत तुरंत उसकी ओर पलट जाती है।

"मैं खुद को संभाल नही पा रहा था मम्मी और अगर मुझे किसी औरत के जिस्म का सहारा नही मिलता तो मानो या ना मानो, मैं पागल हो जाता। इसके बाद मैं कई बार उस गलत जगह पर गया और आगे भी खुद को रोक नही पाऊंगा" कहकर अभिमन्यु बिस्तर पर बैठ गहरी-गहरी सांसें लेने लगता है, उसका सिर शर्म से नीचे झुक गया था। अपने दूसरे पहलू को अपनी माँ के साथ सांझा करने के बाद उसे ऐसे विचार आने लगे थे कि काश अपने आप उसका दिल धड़कना बंद कर दे और वह अपने इस अजीब से पागलपन से पूरी तरह मुक्त हो जाए।

"ऐसे स्टाइलिश अंडरगारमेंट्स मैंने आज तक नही पहने मन्यु" वैशाली ने उसके करीब आते हुए कहा, पॉलीबैग भी उसके हाथ मे मौजूद था।

"तुम्हारे कन्फेशन पर हम जरूर बात करेंगे पर पहले यह बताओ कि कच्छी का कलर तुम सिलेक्ट करोगे या मैं करूँ?" उसने अभिमन्यु के कंधे को थपथपा कर पूछा, यह उसके बेटे की ईमानदारी का नतीजा था जो वह एकबार फिर से पिघल गई थी।

"बोलो जल्दी बोलो फिर तुम मुझे ट्रीट पर भी तो ले जाओगे और बिना कच्छी पहने मैं इस घर से बाहर जाऊंगी नही" अपने कथन को पूरा करते ही वह पॉलीबैग को बिस्तर पर उलट देती है।

"मैं मुंह धोकर आता हूँ, तुम हॉल मे तैयार मिलना माँ" अभिमन्यु बिस्तर से उठते हुए बोला, वह अपनी माँ अश्लील बातों से अकस्मात् झेंप सा गया था।

"पहले अपनी माँ के लिए कच्छी तो सिलेक्ट करो, माँ पेटीकोट के नीचे नंगी है मन्यु" वैशाली सीधे उसकी आँखों मे झांकते हुए बोली। वह बिस्तर के बिलकुल करीब आकर खड़ी हुई और अभिमन्यु के अचानक बिस्तर से उठकर खड़े हो जाने से दोनो माँ-बेटे का शरीर आमने-सामने से काफी हद तक चिपक गया था। दोनो एक-दूसरे की चढ़ी सांसों को अपने-अपने चेहरे पर साफ महसूस कर सकते थे, दोनो की छातियां ओर जांघें भी आपस मे सट गई थीं और ठीक उसी पल अपने बेटे के थरथराते तम्बू का स्पर्श अपनी नाभि पाकर वैशाली के मन मे एक ऐसा पापी ख्याल पनप जाता है जिसके पूरे हो जाने के पश्चात माँ-बेटे का आगामी भविष्य निश्चित ही बदल जाना था।


"अॉन योर नीज़ मन्यु, अभी" अपने जबड़े भींचकर ऐसा कहते हुए वैशाली अपने दोनो हाथ एकसाथ बेटे के कंधों पर रख उसे नीचे फर्श पर अपने घुटनों के बल बैठने के लिए, अपने हाथों की क्रिया के साथ मौखिक दबाव भी देने लगती है। अभिमन्यु ठगा, मंत्रमुग्ध सा अपनी माँ के हाथों के हल्के दबाव से भी हौले-हौले नीचे बैठने लगता है, उसका चेहरा नीचे बैठने के दौरान उसकी माँ के शरीर से बिलकुल सट गया था और जिसके नतीजन जबतब उसके होंठ भी वैशाली की साड़ी व निर्वस्त्र बदन से रगड़ खाते जा रहे थे।

सर्वप्रथम उसके होंठों ने उसकी माँ के गोल-मटोल मम्मों के ऊपरी फूले फुलाव को छुआ और वहाँ से फिसलते हुए उसके होंठ माँ के ब्लाउज पर पहुँचे, फिर पुनः होठों को उसकी माँ की नंगी त्वचा को छू लेने का अवसर प्राप्त हुआ। वैशाली के चिकने गुदाज पेट ने तो जवान अभिमन्यु को जैसे पूरी तरह से अपने वश मे कर लिया था, वह एकाएक इतना अधिक भ्रमित हो गया कि उसे यह भी ख्याल नही रहा कि उसने अपनी माँ के नंगे पेट को चूमना भी शुरू कर दिया है। माँ की गोल गहरी नाभि को बारम्बार पटापट चूमने के उपरान्त उसके होंठों का स्पर्श दोबारा वैशाली की साड़ी से हुआ और फिर वहीं ठहरकर रह गया, यह उसकी माँ का वह वर्जित स्थान था जिसे या तो बचपन मे उसके नाना-नानी ने देखा था या शादी होने के बाद उसके पिता ने। अभिमन्यु अब पूरी तरह से फर्श पर बैठ चुका था और ज्यों ही वह अपने चेहरे को साड़ी के ऊपर से अपनी माँ की टांगों की जड़ पर दबाता है, वैशाली अपना निचला होंठ जोर से अपने दांतों के बीच फंसाकर अपनी सिसकी रोकने के असफल प्रयास से झूझने लगती है। उसकी टांगें तत्काल कुछ इस तरह से कपकपाने लगी थी मानो वह किसी चालू जनरेटर के ऊपर खड़ी हो, वह कैसे भी कर अपने बेटे के मुंह को अपनी चूत के ऊपर से हटाना चाहती थी वर्ना कुछ ही क्षणों मे उसका पतन हो जाना निश्चित था।

"बेटा, उन्ह! क ...कच्छी, माँ साड़ी के नीचे ...ओह! नीचे नंगी है" वैशाली बेटे के कंधों को बलपूर्वक झकझोरते हुए सिसयाई और अभिमन्यु भी झटके से वर्तमान मे लौट आता है। खुद को स्थिर करने हेतु उसे थोड़ा समय मिलना चाहिए था जो उसे उसकी माँ के निंदनीय कथन को सुनकर नही मिल पाया था। उसने बिस्तर पर उसके सबसे नजदीक पड़ी कच्छी पर झपट्टा मारा और बिना अपना सिर उठाए कच्छी को जकड़ने वाला अपना दायां हाथ ऊपर कर देता है।

"तुम अपने हाथ से पहनाओ मन्यु, तुम्हारे बचपन मे मैंने भी अनगिनत बार तुम्हें चड्डी और निक्कर पहनाए है। आज उस अहसान को उतार दो बेटा, पहनाओ अपनी माँ को उसकी कच्छी। समझो यही मेरी मिन्नत है और आज्ञा भी" कहकर वैशाली ने कोई इंतजार नही किया और अपनी साडी़ को अपने पेटीकोट समेत पकड़कर ऊपर उठाने लगती है। वह जानती थी उसका यह पापी कृत्य उसकी मर्यादित छवि को सदा-सदा के लिए समाप्त कर देगा, अपने मातृत्व का अबतक अर्जित किया सारा तप माटी मे मिल जाएगा। उसकी चूत की तात्कालिक दुर्दशा से भी वह अंजान नही थी, चूत से उमड़े रस ने उसकी घनी घुंघराली झांटों को भी पूरी तरह से भिगो दिया था।

"माँ मुझसे न ...." अभिमन्यु अपनी आँखें मूदते हुए बोला मगर उसके कथन को उसकी माँ बीच मे ही काट देती है।

"माँ से बेशुमार प्यार करते हो पर उसकी खुशी के लिए इतना भी नही कर सकते" कहते हुए वैशाली अखंड उन्माद से रो ही पड़ती, जाने अपने किस कठोर धातु द्वारा बने संयम के तहत उसने खुद को रोका था। अपने दोनो हाथों मे साड़ी और पेटीकोट को एकसाथ लपेटते हुए आखिरकार वह अधेड़ माँ अपने सगे इकलौते जवान बेटे अभिमन्यु के समक्ष अपने निचले धड़ से नंगी हो ही जाती है।

"मन्यु डू इट नाउ! पहना दो अपनी माँ को कच्छी, जल्दी करो ...माँ नीचे से नंगी है उसे बहुत शर्म आ रही है बेटा" वैशाली के इस घोर अश्लील कथन ने अभिमन्यु को अपनी बंद आँखें खोलने पर विवश कर दिया और अपनी खुली आँखों से जो कामुक दृश्य उसने प्रत्यक्ष देखा मानो वह अपने होश बैठता है। बड़ी-बड़ी झांटों के बीचों-बीच छुपी उसकी माँ की सांवली रंगत की अत्यंत सुंदर चूत गाढ़े लिसलिसे कामरस से सराबोर थी, चूंकि उसकी माँ के पैरों के बीच कोई खुलापन नही था तो चूत के दोनो सूजे होंठ आपस मे बुरी तरह चिपके हुए थे। जीवंत फड़कते होंठों के ऊपर शुशोभित उसकी माँ का मोटा भांगुर भी उसे स्वयं फड़फाता हुआ सा प्रतीत हो रहा था, पूरा स्थान ही भीषण अगिन--सी तपन का अहसास करवा रहा था। अभिमन्यु को अब अपने किसी भी पल झड़ जाने का कोई दुख नही रहा था, उसका लंड तो जैसे उसे महसूस भी नही हो पा रहा था इतना प्रचंड तनाव उसमे आ चुका था कि अपने-आप वह शून्य मे परिवर्तित हो चला था।

"माँ तुम बहुत ...बहुत सुंदर हो और बेहद गीली भी" अभिमन्यु ने अपना सिर ऊपर उठाया और मुस्कुराकर अपनी माँ की सुर्ख लाल आँखों मे झांकते हुए कहा, जो बरबस नशे सी खुलती व बंद होती जा रही थीं।

"बद्तमीज लड़के, तुम्हारी माँ नीचे से नंगी है और तुम्हें मजाक सूझ रहा है। अगर मनभर कर वहाँ देख लिया हो तो अब माँ को उसकी कच्छी पहना दो, माँ को सचमुच शर्म आ रही है" अपने बेटे के संतुष्ट चेहरे को देख वैशाली भी मुस्कुराते हुए बोली, एक ऐसी संतुष्टता जो अब संसार की महज उस अकेली पापिन माँ को ही महसूस हो सकती थी।

"साड़ी को साड़ी मे उलझा दो मम्मी और फिर रखो मेरे कंधों पर अपने दोनो हाथ, शायद मेरा बीता हुआ बचपन तुम्हें दुबारा याद आ जाए" कहकर अभिमन्यु साडी़ को साडी़ के भीतर गोल-गोल लपेटने मे अपनी माँ की मदद करने लगता है, ताकि हाथ से छोड़ देने पर साड़ी नीचे न गिर सके।

"वेट अ मिनट माँ, एकबार और तुम्हारे वहाँ देख लूं फिर पहनाता हूँ तुमको कच्छी" वह पुनः अपनी आँखे अपनी माँ की चूत पर गड़ाते हुए बोला, वैशाली को उसका अनैतिक कथन सुनकर एकाएक चक्कर से आने लगे थे।

"वाउ! मॉम मे इस वर्ल्ड मे तुम्हारे यहाँ से बाहर निकलकर आया हूँ, बिलीव मी! मुझे हम दोनो पर प्राउड फील हो रहा है। तुम बहुत! बहुत! बहुत! बहुत ज्यादा सुंदर हो माँ, मेरी सोच से भी ज्यादा सुंदर" चहकते हुए उसने पिछले कथन मे जोड़ा। नासमझी या खुशी से बेहाल वह बुद्धु यह भी स्वीकार कर गया कि वह अपनी माँ की चूत के विषय मे सोचा करता है और कमाल यह कि उस पागल को भान ही नही कि गलतीवश वह अपनी माँ से क्या अनर्थ कुबूल बैठा था। जिसे सुनकर वैशाली मन ही मन मुस्कुराने लगती है, अपने सगे बेटे मुख से अपनी चूत की प्रशंसा का हर शब्द लगातार उसके कानों मैं रस घोले जा रहा था।

"बस मन्यु अब डन, मैं अब और देर नंगी खड़ी रह सकती" कहते हुए वैशाली ने आगे को झुककर अपने दोनो हाथ बारी-बारी से अपने बेटे के कंधे पर रख दिए और अभिमन्यु भी अपनी माँ की इच्छा को सहर्ष मान लेता है।

"अपना सीधा पैर उठाओ मम्मी" उसने वैशाली को आज्ञा दी, बिलकुल वैसे ही अंदाज मे जैसे हर माँ अपने बच्चों को कपड़े पहनाते वक्त देती है। अपने बेटे की आज्ञा को मानते हुए उसकी माँ से अपना दाहिना पैर फर्श से ऊपर लिया, फौरन जिसे पकड़कर अभिमन्यु कच्छी के दायं निचले छेद के भीतर कर देता है।

"अब उलटा पैर उठाऊं बेटा" बेटे के बोलने से पहले वैशाली ने स्वयं बोल दिया और एकसाथ दोनो माँ-बेटे जोरों से हँसना शुरू कर देते हैं। बायां पैर भी अब कच्छी के अंदर आ चुका था और फिर एक अंतिम नजर अपनी माँ की चिपचिपी स्पंदनशील चूत पर मायूसी से डा़ल अभिमन्यु कच्छी को तबतक ऊपर चढ़ाता गया जबतक उसकी माँ की नंगी चूत उसकी खुली आँखों से ओझल नही हो गई। मायूसी इस बात की कि शायद यह पहली और आखिरी बार था जो उसने अपनी असल जन्मस्थली के प्रत्यक्ष दिव्य दर्शन किए थे क्योंकि अपनी माँ से ना तो किसी तरह की कोई जबरदस्ती उसने भूत मे और ना ही वह आगामी भविष्य मे कभी करता, अब भविष्य तो बस उसकी माँ के अपने निजी निर्णय पर टिका रह गया था।

इसके उपरान्त वैशाली बिना कुछ कहे सीधे बेडरूम के बाथरूम मे चली जाती है, अभिमन्यु हॉल मे चला आया था और कुछ समय पश्चात उसकी माँ भी वहाँ आ गई और अंततः दोनो माँ-बेटे अपनी-अपनी सोच मे गुम घर की चौखट को पार जाते हैं।
घर की चौखट पार कर दोनो माँ-बेटे मल्टी की सीढ़ियां उतर रहे थे, एक-दूसरे के बिलकुल समानांतर और जल्दी ही वे निचले तल पर पहुँच गए। अभिमन्यु को सहसा अहसास हुआ जैसे उसकी माँ थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी, अपने हर बढ़ते कदम पर कभी वह अपनी टांगों को चिपकाकर छोटे-छोटे कदमों से चलने लगती तो कभी एकदम से टांगों को चौड़ाकर लंबे-लंबे पग धरना शुरू कर देती। पार्किंग तक वह बड़े गौर से अपनी माँ की चाल मे आए अंतर का अवलोकन करता रहा मगर जब उसे लगा कि सचमुच उसकी माँ को चलने मे तकलीफ हो रही है, वह तत्काल कारण बताओ नोटिस जारी कर देता है।


"क्या हुआ मॉम, चलने मे दिक्कत हो रही है?" उसने वैशाली के सैंडि़ल की हील को देखते हुए पूछा, भले हील की ऊंचाई मीडियम थी पर हाल-फिलहाल तो उसकी लंगड़ाहट की वजह उसे यही समझ आती है।

"इतना गौर तो मैं भी तुमपर नही कर पाती जितना आजकल तुम अपनी माँ पर करने लगे हो। डिटेक्टिव मत बनो, चुपचाप बाइक चलाओ। समझे!" वैशाली मुस्कुराते हुए कहती है।

"इतना शक तो तुम अपने पति पर भी नही करती जितना आजकल अपने बेटे पर करने लगी हो। पुलिसवाली मत बनो चुपचाप बाइक पर बैठो। समझीं!" अभिमन्यु ने भी फौरन नहले पर देहला दे मारा और मल्टी के बाहर हमेशा सभ्यता से रहने वाले माँ-बेटे खुलेआम जोरों से हँसना शुरू कर देते हैं।

दोनो माँ-बेटे बाइक पर सवार हो चुके थे और जल्द ही बाइक हवा से बातें करने लगी।

"मन्यु कन्ट्रोल योरसेल्फ! मैं माँ हूँ तुम्हारी, कोई गर्लफ्रेंड नही जो मुझे इम्प्रेस करने के लिए बाइक इतनी तेज चलाओगे" बाइक की तेज गति से घबराकर वैशाली ने बेटे को टोकते हुए कहा।

"मुझे कसकर पकड़ लो मॉम, मेरी तमन्ना थी कि कभी किसी लड़की को अपने पीछे बिठाकर वाकई उसे इम्प्रेस कर सकूं। डोन्ट वरी, खुद से ज्यादा मुझे तुम्हारी फिक्र है" कहकर अभिमन्यु एकाएक एक्सलरेटर बढ़ा देता है ताकि उससे दूरी बनाकर बैठी उसकी माँ खुद ब खुद उससे चिपककर बैठ जाए और हुआ भी ठीक यही, वैशाली ने फौरन अपना बायां हाथ आगे लाकर बेटे के पेट पर रख दिया और दाएं को उसकी गरदन से नीचे लाते हुए वह बलपूर्वक उसकी बाईं पसली पकड़ लेती है। जब-जब अभिमन्यु उसे एक लड़की की संज्ञा देता था जाने क्यों हरबार उसका दिल खुशी से नाच उठता था, माना अपने पति मणिक के स्कूटर के पीछे वह अनगिनत बार बैठी थी मगर जिस बुरी तरह अभी उसने अपने बेटे को जकड़ा हुआ था, अपनी उस जकड़ पर वह खुद को बेहद रोमांचित होना महसूस कर रही थी।

'कारण' या तो विधि के विधान से बनते हैं या अपनी स्वयं की करनी से। मणिक का इस अधेड़ उम्र मे अचानक से पैसे कमाने मे जुट जाना विधि का विधान था क्योंकि अपने और अपने परिवार के सुखमय भविष्य के लिए उसे घर के मुखिया होने का अपना फर्ज हर हाल मे पूरा करना था यकीनन जिस कर्तव्य के लिए ही उसका जन्म हुआ था। एक पति और पिता की भूमिका मौखिक निभाने के अलावा उसे अपने आश्रितों का हर संभव पालन-पोषण भी करना था। वैशाली जो कि अचानक अपने पति से बिछड़ गई थी, भले ही इस बिछड़न को पति-पत्नी द्वारा जानबूझकर नही रचा गया था मगर मणिक के साथ ताउम्र जीवन का निर्वाह करते हुए उसे हर विवाहित नारी की तरह अपने पति के साथ की एक चिरपरिचित आदत हो चुकी थी। पति का साथ सिर्फ उसके साथ हँस-बोल लेने या ऊपरी प्यार दर्शा लेने आदि भर से पूरा नही होता, एक पत्नी को बिस्तर पर अपने पति रूपी मर्द के नीचे चरमरा उठने की चाह भी हमेशा रहती है और जिस चाह से वैशाली एकदम से वंचित रहने लगी थी। अब यदि ऐसे मे उसकी चाह बिस्तर पर किसी पराए मर्द का साथ चाहने लगे और वह पराया मर्द भी कोई अन्य नही उसका अपना सगा जवान बेटा अभिमन्यु तो इसे विधि का विधान कदापि नही कहा जाएगा, यह पति से तिरस्कृत अपने यौवन के हाथों मजबूर उस नारी की अपनी स्वयं की करनी थी।

"अगर मैं गिरी तो याद रखना बहुत मारूंगी तुम्हें" बाइक की गति तेज होने की वजह से वैशाली बेटे के दाएं कान मे चिल्लाते हुए बोली, सट तो वह उससे पहले से ही चुकी थी और अब उसका बायां चिकना गाल सीधे अभिमन्यु के दाएं कान से रगड़ खाने लगा था।

"मैं कुछ कहना चाहता हूँ मॉम पर चौंकना मत वर्ना जरूर बाइक गिर जाएगी" वह भी जोर से चिल्लाया।

"क्या कहना चाहते हो?" उत्सुकता वश वैशाली ने तुरन्त पूछा और वैसे भी जब बेटे ने उसे पहले ही चौंक ना पड़ने की चेतावनी दे दी थी तब वह अवश्य कोई ऐसी शैतानी भरी बात कहने वाला था जो यकीनन उसकी माँ को हैरत से भर देती।

"मेरी दूसरी तमन्ना भी पूरी हो गई मम्मी, मुझसे सटकर बैठने वाली लड़की के बूब्स मेरी पीठ पर गड़ रहे हैं। काश कि अभी उसने ब्रा नही पहनी होती मगर फिर भी मैं बता नही सकता मुझे कितना मजा आ रहा है ...हु! हूऽऽ!" अभिमन्यु बेशर्मों की भांति हँसते हुए बोला और अकस्मात् बाइक को और भी तेजी से भगाने लगता है।

"हुंह! तुम्हारी बेशर्मी का बस चले तो अपनी माँ को नंगी ही बाइक पर बिठा लो" वैशाली ने चिढ़ने का दिखावा करते हुए कहा, साथ ही वह महसूस करती है कि अश्लीलता से प्रचूर उनके कथनों के प्रभाव से उसके निप्पल अचानक तीव्रता से तनने लगे थे और जिन पर उसके बेटे की मजबूत पीठ का दबाव उसे बड़ा सुखमय सा प्रतीत हो रहा था।

"अच्छा है मम्मी कि तुमने कपड़े पहन रखे हैं वर्ना राह चलते मर्दों को कहीं की भड़स कहीं पर निकालनी पड़ती। खीं! खीं! खीं! खीं!" वह खिखियाते हुए बोला।

"वैसे एक बताओ, क्या कभी पापा के स्कूटर पर तुम्हें इतने मजे आए हैं?" उसने पूछा तो वैशाली एकाएक गहरी सोच मे डूब गई।

घर हो या बाहर, मणिक का अनुशासन हमेशा से कड़क रहा था। वह ना तो खुद कभी फूहड़पने की बात या हरकतें करता और ना किसी अन्य का फूहड़पन कभी उसे बरदाश्त होता, अपनी मर्यादा और गरिमा दोनो को सदा एक-सा बनाए रखने वाले मणिक को उसके सभी मित्रगण और रिश्तेदार सदैव बड़ी गम्भीरता से लिया लिया करते थे। जबतब अपने बीवी-बच्चों से उसका हँसी मजाक होता भी तब भी उसके अलावा अन्य तीनों मे से किसी को हँसी नही आया करती थी, वह तो इज्जत की मजबूरी होती तो जबरन हँस दिया करते थे। पत्नी संग एकांतवास मे भी उसकी गंभीरता यूं ही बरकरार रहती मगर इसका यह अर्थ कदापि नही कि उसकी मर्दानगी मे कभी कोई कमी रही हो, बल्कि अपने बच्चों के जवान हो जाने के बावजूद वह रोजाना नियम से अपनी पत्नी की जमकर चुदाई किया करता था। 'पेट भर कौरा और कलाई भर लौड़ा' इस अत्यंत मजेदार पू्र्ण स्वदेशी कहावत का सही अर्थ वैशाली जैसी समझदार और घरेलू स्त्रियां ही जान सकती हैं, जिन्हें अपने पति द्वारा उनके विवाहित जीवन मे पेट भर खाना और संतुष्ट संभोग इन दोनो मूलभूत आवश्यकताओं की कभी कोई कमी नही रहती।

"मुझे तो कोई मजा नही आ रहा, तुम्हें जरूर कोई गलतफहमी हुई है" अपनी सोच से बाहर निकल वैशाली थोड़ा क्रोधित स्वर मे बोली, एकाएक पति के स्मरण ने उसे खुद पर ही क्रोध दिला दिया था। एक उसका पति था जो अपने परिवार के साथ का त्याग कर उन सब के खुशहाल भविष्य को संजोने मे जी जान से जुटा हुआ था और एक वह थी जो अपने ही सगे बेटे संग व्यभिचार करने को उतावली हुई जा रही थी।

"झूठ! जानवर हो या इंसान, आजादी सभी को चाहिए। मैं जानता हूँ कि पापा के नाम से हम भाई-बहन के अलावा तुम्हारी भी उतनी ही फटती है मॉम, तुम्हें भी उनका अकड़ू नेचर पसंद नही लेकिन फिर भी तुम हमेशा से उसे पसंद करती आ रही हो, उसे झेलती आ रही हो क्योंकि वह तुम्हारे पति हैं" कहकर अभिमन्यु बाइक की रफ्तार को हौले-हौले कम करने लगता है। उसका कहा हर शब्द सीधे उसके दिल से निकला था, उसके उसी दिल से जिसके एक छोटे--से कोने मे नही बल्कि अब उसकी माँ उसके पूरे दिल मे ही रच-बस गई थी।

"तुम्हें अपनी जुबान पर लगाम लगाने की जरूरत है मन्यु वर्ना हम यहीं से घर लौट सकते है" यह आवाज वैशाली के दो-तरफा बंटे हुए मन से बाहर आई थी। अपने बेटे के कथन से वह पूर्णतः सहमत थी, उसे वाकई मणिक का भय जीवनपर्यंत सताता रहा था मगर अपने बहुमूल्य राज़ के अकस्मात् उजागर हो जाने से वह सहसा दुखी हो गई थी। अभिमन्यु पर उसकी कोई भी नाराजगी नही होने का प्रमाण यह था कि वह अबतक उससे उसी तरह से सटकर बैठी हुई थी जब माँ-बेटे के बीच अश्लील वार्तालाप और उससे पनपा हँसी-मजाक शुरू हुआ था, यहां तक कि अपने दोनो हाथ भी उसने जरा भी पीछे नही खींचे थे।

"अजीब लड़की हो तुम, अपनी पहली डेट पर साथ आए लड़के को यूं बेवजह धमकाते हुए तुम्हें शर्म नही आती। पता भी है मेरा कितना खर्चा हो गया? सत्ताइस सौ के अंडरगारमेंट्स, चालीस का गुलाब, आने-जाने का डेढ़ लीटर पेट्रोल और दोबारा घर से निकलने के बाद भी लगभग आधा लीटर पेट्रोल जल चुका है। हाँ यार! लड़कियां नही हुईं आफत हो गईं" बाइक को दाएं मोड़ते हुए ऐसा कहकर वह फौरन अपनी माँ के अत्यंत कोमल होठों को चूम लेता है। उसने बिलकुल सही समय का चुनाव किया था, बाइक मोड़ते वक्त उसका चेहरा भी स्वभाविक रूप से दाहिनी और घूमा था और इससे पहले की उससे सटकर बैठी उसकी मायूस माँ को पहले से ही उसकी इस शरारत का पता चल पाता अभिमन्यु उसके रसभरे होठों का प्रथम चुम्बन लेने मे सफल हो गया था।

"ये ये क्या? उफ्फ! मैं क्या करूं इस बेशर्म लड़के का, बातें भी गंदी करता है और हरकतें तो बातों से भी कहीं ज्यादा गंदी हैं" वैशाली लज्जा से दोहरी होते हुए बोली, खुलेआम चलती सड़क पर बेटे का उसके होंठों को चूम लेना मानो पलभर मे उसकी सारी मायूसी तत्काल हवा हो जाती है। हालांकि उनका चुम्बन क्षणिक था, अहसास भी ना हो सकने जैसा मगर फिर भी दोनो माँ-बेटे खुशी से फूले नही समा रहै थे।

"नौटंकी मत करो लड़की, तुम्हें भी अच्छे से पता है कि पहली डेट पर कपल और क्या-क्या गंदे काम करते हैं" मुस्कान के साथ कड़क आवाज बनाकर ऐसा कहते हुए वह पुनः अपना चेहरा दाहिनी ओर घुमाने लगता है ताकि दोबारा अपनी माँ को चौंकने पर मजबूर कर सके। भले उसे अब और चुम्बन नही लेने थे क्योंकि जो आंतरिक आनंद उसे अपने पहले चुम्बन मे महसूस हुआ था उतना शायद वह उनके आगामी अनगिनती चुम्बनों मे भी महसूस नही कर सकता था, एक विशेष बात और थी कि जब उसने वैशाली के होठों को चूमा था तब उसका ध्यान अपने बेटे की हरकत की ओर जरा भी नही था और वह अकस्मात् किसी दूसरी दुनिया मे पहुँच गई थी, लज्जा और बेतुकी घबराहट से उसका मुंह खुला का खुला रह गया था, वह बुरी तरह कांप उठी थी। यही उनके पहले चुम्बन की विशेषता थी जिसे सरल शब्दों मे अबोध, आश्चर्य से भरा हुआ एक निष्कपट, निष्छल कृत्य कहा जाए तो उसका सही भाव समझने मे आसानी होगी।

"लो! लो! करो ...किस करो, अब रुक क्यों गए मन्यु?" जब वैशाली को समझ आ गया कि उसके बेटे ने दूसरी बार सिर्फ उसे हैरान-परेशान करने के लिए ही अपना चेहरा दाहिनी ओर घुमाया है, वह स्वयं अपना चेहरा उसके दाएं कंधे के पार निकालते हुए बोली, पहले-पहल तो वह वास्तव मे पुनः चौंक गई थी और तीव्रता से अपना चेहरा पीछे खींच लिया था मगर सत्य जानने के उपरान्त वह खुद ही अपने होठों को सिकोड़कर उसे चिढ़ाने लगती है। सत्य तो यह भी था कि वह चाहती थी कि उसका बेटा उसके उकसावे पर दोबारा उसके होठों को चूमे मगर अभिमन्यु ने ऐसा कुछ भी ना कर उसे लगातार तीसरी बार चौंका दिया था।


"तुम्हें तो कोई शर्म है नही मम्मी मगर मुझे है, जमाना क्या सोचेगा? छि!" कहकर वह हँसने लगा और वैशाली फौरन उसकी पीठ पर मुक्के जड़ने लगती है।

"वैसे जब घर पहुँच जाएंगे तब मैं पक्का बेशर्म बन जाऊँगा माँ, तब देखूँगा तुममे कितना दम है मुझे रोकने का" अभिमन्यु पहले से भी कहीं तेज हँसते हुए बोला और उसके कथन के अर्थ को सोचते ही वैशाली के खुले मुंह से एकाएक लंबी सीत्कार बाहर निकल जाती है।

"तुम्हें रोक तो मैं चाहकर भी नही सकूंगी मन्यु, क्या पता मैं ही खुद को ना रोक पाऊं" वह अपनी चूत के अंदरूनी स्पंदन को स्पष्ट महसूस करते हुए सोचती है, उसकी गांड का छेद भी स्वतः ही कुलबुलाने लगा था।

अगले कुछ क्षणों तक दोनो चुप रहे और तबतक मॉल भी नजदीक आ गया मगर हर-बार की तरह इस बार वैशाली के उतरने के लिए अभिमन्यु ने बाइक को मॉल के बाहर जरा भी नही रोका बल्कि अपने साथ वह उसे भी सीधे मॉल की भूमिगत पार्किंग के भीतर ले जाता है।

"तुम जानते हो ना कि तुम्हारे पापा मुझे और अनुभा को कभी पार्किंग के अंदर नही ले गए, फिर तुम मुझे क्यों वहाँ साथ ले जा रहे हो मन्यु?" वैशाली ने तत्काल पूछा, पार्किंग नीचे चार मालों तक थी और अभी वे दूसरे तल पर पहुँचे थे। उसका दिल धुकनी की तरह जोर-जोर से धड़कने लगता है जब उसका बेटा उसके प्रश्न का जवाब देने की बजाय बाइक को तीसरे तल पर ले जाने के लिए मोड़ने लगता है।

"मन्यु उतारो मुझे ...यहीं उतार दो, मुझे नही जाना और नीचे" किसी अनिष्ठ की कल्पना से घिरी वह माँ एकाएक इतनी अधिक घबरा जाती है कि चंद लम्हों मे उसकी कजरारी आँखों मे आँसू उमड़ने लगते हैं, सिसकियां लेनी शुरू कर चुकी वह माँ यह तक भूल जाती है कि अभी वह संसार के सबसे सुरक्षित हाथ अपने सगे बेटे के साथ है।

"उतरो माँ, यहां से लिफ्ट मे साथ चलेंगे। मैंने बाइक ऊपर इसलिए नही रोकी क्योंकि मुझे तुम्हारा नेचर पता है, कोई गार्ड-वार्ड भी तुमसे अगर पुछताछ करने लगता तो तुम बेवजह घबरा जातीं" जब बाइक रोक देने के बावजूद वैशाली उसपर से नीचे नही उतरी तब अभिमन्यु ने उसे शांत स्वर मे वजह समझाते हुए कहा, बेटे की बात सुन हथप्रभ वह फौरन बाइक से उतर जाती है।

"मन्युऽऽ" वह बाइक साइड स्टेंड पर खड़ी कर पाता इससे पहले ही रोती हुई वैशाली उसकी पीठ से चिपक गई।

"माँ, तुम अचानक रोने क्यों लगीं?" अभिमन्यु ने बाइक को विपरीत दिशा मे गिरने से बचाते हुए पूछा और फिर ठीक तरह से उसे पुनः स्टेंड पर लगाकर वह अपनी माँ की ओर घूम जाता है।

"मुझे लगा ... मुझे लगा" वैशाली ने उसे अपनी मूर्खता की सत्यता से परचित करवाने लिए अपना मुंह खोला भी मगर ज्यादा कुछ वह नही कह पाती, बस उसकी बलिष्ठ छाती मे अपना चेहरा छुपाकर सिसकती रहती है।

"ओह! तो तुम्हें लगा कि मैं पार्किंग मे तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती करूँगा, जबरदस्ती वह भी अपनी माँ के साथ। तुम्हारे साथ हँसी-मजाक करने लगा हूँ, तुम्हें अपना दोस्त बना लिया, अम्म! कितनी बार ... हाँ याद आया, दो बार तुम्हें बिच कहकर भी बुलाया पर सैक्स तुम्हारे साथ नही करना चाहता, मैं पहले ही बता चुका हूँ। बाकी यह भी अभी से जान लो कि सैक्स के अलावा तुम्हारे साथ मैं अपनी हर वह फैंटसी पूरी करूंगा जो मेरे दिल मे है, अब जरूर तुम इसे मेरी जबरदस्ती मान सकती हो मगर फिर भी मुझे रोक नही पाओगी मॉम" अभिमन्यु ने मुस्कुराते हुए कहा, वह नही चाहता था कि अपनी माँ की बेवकूफी पर क्रोधित होकर वह उसे और भी ज्यादा रुला दे, उसे बेवजह शर्मिंदा होने पर मजबूर कर दे।

"कैसी फैंटसी?" हुआ वही जैसा उसने सोचा था, उसके कथन को सुन सिसकते हुए ही वैशाली ने तत्काल अपना चेहरा उसकी छाती से ऊपर उठाते हुए पूछा।

"पहले अपने यह आँसू पोंछो बिच, फिर बताऊंगा" हँसते हुए ऐसा कहकर वह स्वयं अपनी कमीज की दाईं बांह से अपनी माँ के आँसुओं को पोंछने लगता है, उसने खास यह भी ध्यान दिया कि उसकी माँ का बचा हुआ काजल किसी भी तरह उसकी कहर ढ़ाने वाली आँखों की खूबसूरती पर यूं ही सजा रहे ताकि उनकी अकल्पनीय सुंदरता को खुद अभिमन्यु की नजर भी ना लग सके।

"शहर भर की लड़कियां मरी जा रही हैं मेरे साथ डेट पर जाने को और एक मैं हूँ जो ना जाने किस रोतलू के चक्कर मे पड़ गया। चलें रोतलू या अभी और रोना है?" ऐसा पूछकर वह अपनी माँ के कंधे पर से सरक चुके उसके पल्लू को पुनः उसके कंघे पर व्यवस्थित कर देता है।

वैशाली बेटे के मजाकिया और प्रेम भरे कथनों से फौरन सिसकना छोड़ गर्व के उस सबसे ऊँचे शिखर पर पहुँच जाती है जहां संसार की हर माँ उसे अभिमन्यु समान बेटे के लिए ही तप करती हुई नजर आती है मगर उन अनगिनती माँओं मे से तप सिर्फ उसी का पूरा हुआ जिसके फलस्वरूप उसका लाड़ला प्रत्यक्ष उसकी आँखों के समक्ष खड़ा मुस्कुरा रहा था।

"मन्यु मुझे माफ ...." वैशाली ने कहना शुरू किया था पर उसका बेटा उसे बीच मे ही टोक देता है।

"अपनी माँ से माफी मंगवाने का अधिकार मैंने किसी को नही दिया, खुद मुझे भी नही लेकिन मुझे मेरे सवालों के मुझे सही-सही जवाब चाहिए। बोलो क्या कहती हो, डन?" अपने कथन से उसने एकबार फिर से वैशाली का दिल जीत लिया, वह तत्काल अपना सिर हाँ के सूचक मे ऊपर-नीचे कर देती है।

"लंगड़ाकर क्यों चल रही थीं?" उसने अपना पहला प्रश्न पूछा और जैसे सहसा उसकी माँ को सांप सूंघ जाता है, तभी पार्किंग के किसी कर्मचारी की उन्हें आवाज सुनाई पड़ती है जो चौथे माले पर बाइकों को एक--सा लगवाने का प्रयास कर रहा था।

"समय नही है जल्दी बोलो, चलने मे तुम्हें क्यों तकलीफ हो रही थी?" उसने दोबारा वही प्रश्न किया, अपनी माँ के चेहरे पर छाई सुर्खता से उसे लग रहा था कि उसकी लंगड़ाहट का कोई तो विशेष कारण अवश्य था।

"वो मन्यु वो ... जो पेंटी तुमने पहनाई थी, उसे पहनने के बाद ..." इतना कहकर वैशाली तीव्रता से अपने बाएं हाथ का पंजा अपने बोलते हुए मुंह पर रख लेती है, इसी प्रयास मे कि यदि वह अपनी बोलती जुबान को काबू मे नही कर पाई तो उसे रोकने के लिए कम से कम अपने बाएं पंजे का सहयोग वह ले सके।

"पेंटी नही कच्छी मॉम, मैंने तुम्हें कच्छी पहनाई थी। खैर चलो आगे बोलो" अभिमन्यु को जैसे जरा--सा भी सब्र नही हो रहा था, एक दुष्ट सी मुस्कान बिखेरते हुए वह बेहद अश्लीलता पूर्वक बोलता है। वहीं बेटे का कथन और उसमे शामिल घोर नंगपर से वैशाली भी समझ जाती है कि अब अभिमन्यु उससे किसी भी प्रकार की शर्म नही करेगा, फिर चाहे वह अपनी माँ से वार्तालाप करे या उसके साथ कोई कुकृत्य।

"हाँ वही! जो कच्छी तुमने अपनी माँ को खुद अपने हाथों से पहनाई थी, उसने तुम्हारी माँ को तुम्हारी तरह ही बहुत परेशान कर रखा है" वह बेटे से भी अधिक नंगपन दिखाते हुए बेझिझक कहती है, उसने साफ देखा अभिमन्यु उसके अश्लील शब्दों पर खुशी से मानो झूम सा उठा था।

"उस नाचीज कच्छी की इतनी हिम्मत की मेरी माँ को परेशान करे, आई डोन्ट लाइक दिस टाइप अॉफ हिमाकत, जुर्ररत एण्ड अॉल। यू कन्टिन्यू मॉम, आई एम लिसनिंग" वह खिलखिलाकर ताली ठोकते हुए कहता है।

"अब और क्या कहूँ? बस परेशान कर रखा है" वह खुद भी हँसते हुए बोलती है।

"मगर क्यों कर रखा है परेशान, आखिर मै भी तो जानूं कि वहज क्या है?" अपने जिद्दी स्वभाव की तरह अभिमन्यु एकबार पुनः अपनी माँ के पीछे पड़ जाता है और फिर वैशाली तो माँ थी, उसका स्वभाव क्या, उसकी रग-रग से वाकिफ।

"अब अगर तुम सुनना ही चाहते हो तो सुनो। जो कच्छियां तुम अपनी माँ के लिए खरीदकर लाए हो वैसा पैटर्न उसने पहले कभी नही पहना और आज जब पहना तो ठीक से चल भी नही पा रही। जानना चाहते हो क्यों?" वैशाली के प्रश्न के जवाब मे अभिमन्यु ने फौरन अपनी गर्दन ऊपर-नीचे कर दी।

"क्योंकि ... क्योंकि कच्छी बार-बार तुम्हारी माँ की गांऽऽड मे घुस जाती है, अब चलें या मेरे मुंह से दो-चार और गंदी बातें सुनने का मन है" वैशाली ने झूठा क्रोध दिखाते हुए कहा, बल्कि इसके ठीक विपरीत वह महसूस करना अब शुरू कर चुकी थी कि उसकी चूतरस से गीली होकर उसकी कच्छी उसके चूतमुख से बुरी तरह चिपक गई है।

"वाउ! मैं अपने शब्द इसी वक्त वापस लेता हूँ। कच्छी जी, यह तुम्हारी हिम्मत का ही रिजल्ट है तो तुम्हें बार-बार हैवन मे घूमने जाने का मौका मिलता है" अभिमन्यु के ऐसा कहते ही वैशाली उसके दाएं कंधे पर लगातार घूंसे चलाने लगती है।

"बेशर्म, बद्तमीज, घटिया इंसान। तुमने तो जैसे सबकुछ बेच खाया, उफ्फ! मैं क्या करूं इस ढी़ठ लड़के का, मेरा ही हाथ टूट जाएगा" वह अपनी मुट्ठी पर फूंकते हुए बोली, तभी अभिमन्यु ने उसके चोटिल हाथ को पकड़ा और सीधे उसे लिफ्ट की ओर ले जाने लगता है।

"जब तुम्हें पता है कि मैं वाकई ढ़ीठ हूँ फिर क्यों बेफालतू के हाथ-पैर चलाती हो। सच मे लगी क्या?" उसने वैशाली समेत लिफ्ट के भीतर प्रवेश करते हुए पूछा, माँ-बेटे के अलावा भी चार-पाँच लोग उनके साथ ही लिफ्ट मे घुसे थे।

"हम्म!" अपरिचितों की उपस्थिति मे वैशाली सिर्फ इतना सा जवाब देकर चुप हो जाती है, अभिमन्यु उसकी चुप्पी का कारण समझ गया और बिना किसी परवाह के वह उन अपरिचितों के सामने ही अपनी माँ की चोटिल मुट्ठी को चूमने लगता है। उसने पाया कि उसकी माँ एकाएक असहज हो गई थी और अपने हाथ को बेटे के होंठों से दूर खींचने का प्रयत्न करने लगी थी मगर उसने अपनी माँ का हाथ नही छोड़ा, बल्कि उसकी आँखों मे झांकते हुए उसे यह विश्वास दिलाता रहा कि उसके होते हुए वैशाली को किसी से भी डरने की कोई जरूरत नही है, उसके जीवित रहते कोई उसकी माँ का बाल भी बांका नही कर सकता है।

"इतनी घबराती क्यों हो? अपने बेटे पर भरोसा नही है क्या?" लिफ्ट से बाहर निकलकर अभिमन्यु ने उससे मौखिक रूप से पूछा।

"औरत हूँ, डर लगता ही है" वैशाली ने जवाब मे कहा।

"अपने इसी बेतुके डर से तुमने अपनी पूरी लाइफ घुटन और परेशानी मे बिता दी, अपने बेटे के प्यार पर भी शायद तुम्हें कोई भरोसा नही" अभिमन्यु गहरी सांसें लेते हुए शांत स्वर मे बोला।

"तुम और तुम्हारे प्यार पर भरोसा नही होता तो तुम्हारी माँ होकर भी कभी तुम्हें बेशर्मों की तरह अपने शरीर का वह अंग नही दिखाती जिसे देखने का अधिकार केवल मेरे पति को है" वैशाली भी पूरी गंभीरता से बोली।

"पर एक बात तो है मॉम। जब भी तुम अपने मुंह से कच्छी, गांड, लंड और चूत जैसे देशी शब्द बोलती हो, कसम से कहर ढ़ा देती हो" अपनी माँ का मायूस चेहरा देख अभिमन्यु ने उसे लजाने के उद्देश्य से कहा, सचमुच उसकी माँ का शर्म से बेहाल चेहरा उसके दिल मे किसी नुकीली कटार--सा धंसता चला जाता था।

"कच्छी और गांड तक तो ठीक है मगर इसके आगे सिर्फ तुम्हारी गंदी कल्पना का विशाल समंदर है" वैशाली मुस्कुराते हुए बोली, धीरे-धीरे उसे भी समझ आने लगा था कि अभिमन्यु पलभर को भी उसका दुखी चेहरा नही देख पाता है फिर भले ही वह अपनी अश्लील या मजाकिया बातों से ही उसे हँसाने का प्रयास क्यों ना करे पर उसे हँसाकर ही मानता था।

इसी बीच वे चलते-चलते पिज्जा हट की होस्टिंग डेस्क तक पहुंचे, कांच से अंदर देखा तो एक सिंगल टेबल भी खाली नही थी। वैशाली यह देखकर हैरान हो गई कि वहाँ उसके उम्र की कोई भी अन्य औरत किसी जवान लड़के के साथ नही आई थी, औरतें थी भीं तो उनका परिवार उनके साथ वहां मौजूद था।

"डाइन इन इज फुल, इफ देयर इज ऐनी कैन्सलेशन आई लेट यू नो। मैम! सर! विल यू प्लीज वेट देयर" कहते हुए होस्टिंग कर रही धमाल लड़की ने अपनी दाईं ओर बनी एक गोल सीमेंटेड पट्टी की ओर इशारा किया जहाँ पहले से ही वेटिंग वाले लगभग आधा दर्जन कपल बैठे हुए थे।

"सर अगर चाहें तो टेक-अवे हो जाएगा" लड़की वैशाली की नजरों को ताड़ते हुए बोली जो वेटिंग कपलों की अधिकता को देख मायूस सी हो रही थी।

"ना! ना! वील वेट, थैंक्स अम्म! या थैंक्स मिस गौरी" अभिमन्यु ने लड़की के नेमबैच पर लिखे उसके नाम को पढ़ते हुए कहा और फिर अपनी माँ को उस दूसरी गोल सीमेंटेड पट्टी पर ले जाने लगता है जहाँ कोई भी मौजूद नही था। उसने पुनः गौर किया उसकी माँ लंगड़ाकर चल रही है और उसकी उस लंगड़ाहट पर वैशाली का जरा-सा भी ध्यान नही था, उसके शांत मुखमंडल पर कोई ऐसे लक्षण नही पनप रहे थे जो उसकी चाल से संबंधित उसके जबरन पाखंड को दर्शा पाते।


"तुम फिर लंगड़ाकर चल रही हो?" देर हुई नही कि उसकी शैतानी शुरू हो गई।

"अब इतनी भीड़ मे टांगें चौड़ाकर तो चल नही सकती तभी लंगड़ा रही हूँ" वैशाली सीमेंटेड पट्टी पर बैठते हुए बोली।

"ज्यादा दिक्कत हो तो टेक-अवे करवा लूं?" अभिमन्यु ने मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए पूछा।

"अगर ऐसा कर सको तो मेरी बहुत हैल्प हो जाएगी बैटा, मुझसे अब सहा नही जा रहा और भीड़-भड़क्के मे बार-बार अपने पीछे हाथ लगा नही सकती" वैशाली उसके बाएं हाथ को सहलाते हुए कहती है, उसकी आवाज से साफ पता चल रहा था कि वह अवश्य किसी तकलीफ मे है।

"मगर बाइक पर तो कोई दिक्कत नही हुई थी" अभिमन्यु ने अपनी माँ के दाएं कंधे पर अपना सिर टिकाते हुए कहा।

"उसपर बैठी हुई थी इसलिए, चलने मे दिक्कत आती है मन्यु" वैशाली एक हाथ से उसका सिर सहलाते हुए बताती है।

"मगर बाइक तो चल रही थी ना फिर क्यों दिक्कत नही आई?" पूछकर वह हँसने लगता है और उसकी हँसी से वैशाली झेंप जाती है, फौरन उसने बेटे के सिर पर हल्की सी चपत लगा दी।

"चलो ठीक है मगर हमारी डेट" रंग बदलने मे माहिर वह उदास होते हुए बोला।

"मौका सिर्फ एकबार आकर हमेशा के लिए थोड़ी ना चला जाता है। हम घर पर अपनी डेट सेलिब्रेट करेंगे, टीवी देखते हुए" वैशाली ने उसका मन रखने के लिए आधिकारिक तौर पर उसकी डेट प्रपोजल को स्वीकारते हुए कहा।

"ओके! मुझे मंजूर है मगर मेरी एक शर्त है" अभिमन्यु सहसा चहककर बोला।

"बको क्या शर्त है तुम्हारी, वैसे मुझे पता था कि तुम जात के मुताबिक पक्के बनिया हो" वैशाली मुस्कान के साथ पूछती है, अब वह अपने बेटे हर संभव समझ चुकी थी।

"घर जाकर तुम्हारी कच्छी मैं खुद अपने हाथों से उतारूंगा" अभिमन्यु जैसे कोई विस्फोट करते हुए कहता है, उसकी माँ उसकी शर्त को सुन अकस्मात् हक्की-बक्की सी उसके चेहरे को घूरने लगती है।

"नही मन्यु, जो आज हो गया वह दोबारा अब कभी नही होगा, तुम उस बीते वक्त को तुरन्त भूल जाओ" उसने घबराते हुए कहा, बेटे की सर्वदा अनुचित शर्त ने उसकी माँ को हैरानी से भर दिया था।

"तुमने भी उस वक्त को एन्जॉइ किया था मॉम, हम फिर से उसे इन्जॉइ करेंगे। प्लीज मम्मी" यह अभिमन्यु का लगातार दूसरा विस्फोट था, वैशाली पसीने से तरबतर होने लगी थी।

"मैंने तुमसे ऐसा नही कहा मन्यु, यह बस तुम्हारे शैतानी दिमाग की उपज है" वह जरा क्रोधित लहजे मे बोली और उसका क्रोध करना जरूरी भी था, यह तो सीधे उसपर झूठा इल्जाम लगाने जैसा था और जिसे वह चाहकर भी कभी स्वीकार नही करती।

"अडल्ट हूँ मॉम, सबकुछ जानता हूँ। तुमने वाकई इन्जॉय किया था और इसीलिए उस वक्त तुम्हारी चूत से झरना बह रहा था" आखिरकार अभिमन्यु तीसरा विस्फोट भी कर ही देता है और उसके कथन को सुन अब वैशाली पूरी तरह से निरुत्तर हो जाती है। अपने बेटे के बुद्धि बल का वह माँ आज लोहा मानने पर मजबूर है, जो बेटा अपनी सगी माँ को एक स्त्री के रूप मे जीत सकता है वह संसार की किसी भी अन्य स्त्री को यकीनन ही फांस सकता है।

"ओके! तो फिर मैं टेक-अवे करवा लेता हूँ" वह प्रसन्न होकर सीमेंटेड पट्टी से उठते हुए बोला, उसकी माँ की चुप्पी ने उसे पुनः जीत का स्वाद चखा दिया था।

"बैठो अभी, हमारी बात पूरी नही हुई" वैशाली बलपूर्वक उसे दोबारा पट्टी पर बिठते हुए बोली।

"मौका सिर्फ एकबार आकर हमेशा के लिए थोड़ी ना चला जाता है" वह तत्काल अपनी माँ के ही कहे कथन की पुनरावृत्ति करता है और इसबार वैशाली पूर्वरूप से टूट जाती है।

"थैंक्स मॉम, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और तुम्हें कभी कोई दुख नही दूंगा" मुस्कुराते हुए ऐसा कहकर वह तेजी से होस्टिंग डेस्क पर पहुँचा और अपना अॉर्डर पंच करवाने लगता है। उसकी नजर गौरी के गौरवर्ण से हट नही पा रही थी मगर कहीं उसकी माँ उसकी हरकतों से भड़क ना पड़े वह चुपचाप अपना टेक-अवे लेकर चलता बनता है।

पार्किंग से बाइक निकालकर वह उसे पुनः हवा से बातें करवाने लगा, वैशाली पहले की तरह ही उससे चिपककर अवश्य बैठी मगर एकदम शांत थी और लौटते वक्त ना जाने क्यों अभिमन्यु भी उसे बिलकुल नही छेड़ता, बस जल्द से जल्द घर पहुँचने के इंतजार मे बाइक दौडा़ता रहता है।
मल्टी पार्किंग मे बाइक पार्क कर अभिमन्यु और वैशाली मल्टी की सीढ़ियां चढ़ने लगते हैं, एकदम शांतिपूर्ण वातावरण मे उनके पैरों की चाप के अलावा कोई अन्य ध्वनि उस वक्त मल्टी के भीतर उत्पन्न नही हो रही थी। उनकी मल्टी का असल नाम शराफत पैराडाइस होना चाहिए था क्योंकि लगभग पूरी मल्टी ही नौकरी पेशा और व्यापारियों से भरी पड़ी थी जो कि खुद से मतलब रखने वाले लोग थे, अपनी स्वयं की उलझनों मे उलझे रहने वाले लोग। अब इससे बड़ी बात और क्या होगी कि उस मल्टी को बने डेढ़ साल बीत गया था मगर व्यवस्थापक या इंचार्ज का पद अबतक रिक्त था।


"तुम्हारी लंगड़ाहट से मुझे बहुत तकलीफ हो रही है मम्मी, फ्लैट मे पहुँचकर मैं सबसे पहले तुम्हारी कच्छी ....." अभिमन्यु ने मल्टी के शांत वातावरण मे एक और ध्वनि को जोड़ते हुए कहा, उसकी ऊंची आवाज और कथन मे शामिल अश्लीलता से घबराकर तत्काल वैशाली उसके बोलते मुंह पर अपना बायां पंजा दबा देती है और जिसमे सफल उसका बेटा बोलते-बोलते अचानक गूंगा सा हो जाता है।

"शश्श्ऽऽ मन्यु! कोई सुन लेगा तो मैं बेफालतू बदनाम हो जाऊंगी। फ्लैट के अंदर तुम्हें अपनी माँ के साथ जो भी करना हो कर लेना मगर प्लीज बेटा" वैशाली कांपती हुई--सी हौले से बुदबुदाई, सामाजिक भय की प्रचूरता से प्रभावित चंद लम्हों मे उसका अधिकांश चेहरा पसीने-पसीने हो गया था।

"तुम फिर डर गईं मॉम?" अपनी माँ के बाएं पंजे को आसानीपूर्वक अपने मुंह से दूर करते हुए अभिमन्यु ने जानकर भी अंजान बनते हुए पूछा, उसकी ऊंची आवाज मे कोई विशेष अंतर नही आया था बल्कि उसके स्वर पहले से भी कठोर हो गए थे।

"डरूं नही तो क्या करूं मन्यु, किसी को हमारे बारे मे अगर भनक भी लग गई तो मेरे पास मरने के अलावा कोई दूसरा चारा नही बचेगा" वह पुनः बुदबुदाई और उनके उस बेतुके से वार्तालाप की शीघ्र समाप्ति के उद्देश्य से अपने बेटे की दाईं कलाई को थामकर बलपूर्वक उसे भी अपने चलायमान कदमों के साथ अपने पीछे खींचने का प्रयत्न करने लगती है। एक अधेड़ उम्र की कामुक स्त्री मे इतना बल कहाँ कि वह अपने से लगभग आधी उम्र के एक बलिष्ठ नौजवान पर अपनी शारीरिक क्षमता का दम-खम आजमा सके, बात यदि उसके बुद्धिबल की होती तो जरा सी साड़ी ऊंची उठाई नही कि संसार का हर मर्द स्वतः ही उसके पीछे किसी पालतू कुकुर सामान फौरन अपनी दुम हिलाता हुआ चला आता। एक! दो! तीन! चार! ऐसे ही उसके दर्जनों झटके विफल रहे, बेटे को अपने पीछे खींचना तो दूर वह उसे उसके स्थान से हिला तक नही पाती है।

"उससे पहले मैं मर जाऊंगा या उस भैन के लौड़े को मार दूंगा जो मेरी माँ की तरफ सही-गलत, अपनी उंगली भी उठाने की कोशिश करेगा। तुम्हारा डर खत्म होना जरूरी है मॉम, बहुत जरूरी है" कहकर अभिमन्यु ने उल्टे अपनी माँ को ही अपनी ओर खींच लिया और तीव्रता से उसके दूसरे हाथ मे पकड़ा हुआ टेक-अवे का पॉलीबैग छीनकर उसे नीचे फर्श पर छोड़ देता है।

"क ...कैसे?" वैशाली इसके आगे कुछ और नही कह पाती जब अगले ही क्षण उसका बेटा उसके चिर-परिचत डर की मार से थरथराते अत्यंत कोमल होंठों पर अपने होंठ रखकर उनका कंपन अपने आप ही बंद कर देता है, साथ ही उसने माँ के बोलते मुंह को भी एकाएक सिल दिया था।

"ऐसे माँ ऐसे, तुम्हें यूं खुलेआम किस करके" उसने पलभर को उसके होठों को आजाद करते हुए कहा और पुनः अपने होंठ उसके होंठों से जोड़ दिए। बारम्बार वह उन्हें चूमता, भय स्वरूप उसकी भिंच चुकी मगर हिलती आँखों मे झांकता और फिर से उसके होंठों को चूमने लगता। अभिमन्यु ने जाना कि उसके लघु चुम्बनों के प्रभाव से भी उसकी माँ की सांसे निरंतर तेजी से गहरी पर गहरी होती जा रही हैं, उसकी छाती से सटे उसके मम्मों के भीतर धुकनी समान धड़कता उसकी माँ का दिल उसे स्वयं उसीके धड़कते दिल सा प्रतीत हो रहा था जो स्पष्ट प्रमाण था कि उसकी माँ ही नही घबराहटवश वह खुद भी पकड़े जाने की रोमांचक संभावना से ग्रसित था।

अपने इन्ही लघु चुम्बनों के दौरान मौका पाकर सहसा अभिमन्यु अपने सूखे होंठों पर अचानक अपनी जीभ फेरने लगता है और ज्यों ही उसके गीले होठों का परिवर्तित स्पर्श वैशाली ने अपने शुष्क होंठों पर महसूस किया उसने चौंकते हुए झटके से अपनी मुंदी आँखें खेल दीं, देखा तो उसका लाड़ला उसीके चेहरे को बड़ी बारीकी से निहारता हुआ मंद-मंद मुस्का रहा था।

"सिर्फ चूमने भर को किस नही कहते गंदे लड़के, होंठों को चूसा भी जाता है" जाने क्या सोचकर वैशाली अपना यह उकसावे भरा कथन कह गई और कहने के बाद पुनः सोचे-विचारे बगैर स्वयं ही अपने बेटे के होंठों से उलझ पड़ती है। यह कुछ और नही केवल अपने जवान बेटे की ह्रष्ट-पुष्ट भुजाओं के बल के मद मे चूर चुदाई की प्यासी एक शादीशुदा किंतु पति से तिरस्कृत माँ की अखंड बेशर्मी थी जो वह भी अपने संस्कार, जीवनपर्यंत अर्जित की हुई अपनी मर्यादित छवि को सरेआम तार-तार करने पर तत्काल आमदा हो गई थी।

मल्टी के जिस सार्वजनिक स्थान पर खड़े होकर दोनो माँ-बेटे वासना का नंगा खेल खेलने मे व्यस्त थे, वह जगह उनके पडो़सी मिस्टर नानवानी के फ्लैट के मुख्यद्वार के बिलकुल करीब थी, इतनी करीब कि यदि उसके परिवार का कोई भी अमुक सदस्य एकाएक फ्लैट का मुख्य दरवाजा खोल देता तो निश्चित ही वह उन माँ-बेटे के पापी चुंबन का राजदार हो जाता। एकबार को अभिमन्यु को दोष दिया जा सकता था कि वह जवान है, अपनी बेकाबू कामुक भावनाओं पर नियंत्रण नही रख सकता मगर वैशाली तो उसकी सगी माँ थी और इसके बावजूद खुद भी अपने बेटे के साथ बहक गई, यकीनन यह विश्वास करने योग्य बात नही थी। इस सब से बेखबर अपने बेटे के चेहरे को अपने दोनो हाथों से थामकर अपने पंजों के बल खड़ी उसकी वह अधेड़ कमसिन माँ उसके होंठों का तीव्रता से रसपान किए जा रही थी, कभी ऊपरी तो कभी वह उसका निचला होंठ चूसने लगती तो कभी दोनो होंठ एकसाथ अपने नाजुक होंठों के बीच फंसाकर बलपूर्वक उन्हें चूसने भिड़ जाती।

"वाउ मॉम! यू आर ...उफ्फ! यू आर फकिंग अॉसम। छत पर चलते हैं, बाकी मजा वहीं करेंगे" अचानक अपने होंठ अपनी माँ के होंठों से पीछे खींच अभिमन्यु साड़ी के ऊपर से उसकी मांसल गांड के दोनो पट अपने दोनो हाथों के पंजों मे जकड़ते हुए सिसका और फिर बिना रुके वैशाली की सुर्ख मतवाली आँखों मे झांकते हुए ही लगातार उसकी गांड को अत्यंत कठोरता से दबाने लगा, अपनी पूरी ताकत झोंककर वह उपनी माँ की गुदाज गांड के दोनो पटों को अधीरता से मसलना शुरू कर देता है।

"ओहऽऽ मन्यु! आहऽऽ ...आहऽऽ दर्द ....दर्द होता है बेटा" अपनी गांड पर अपने बेटे के जवान मर्दाने हाथों के मर्दन से वैशाली सीत्कारते हुए कहती है, वह एकदम से अभिमन्यु के ऊपर झूल--सी गई थी।

"ना कर मन्यु ...उन्ह! उन्ह! लगती है माँ को" उसने पिछले कथन मे जोड़ा जब उसका बेटा उसकी पीड़ा भरी आहों को सुनने के उपरान्त भी उसकी गांड को दबोचना नही छोड़ता।

"फिर से नौटंकी मम्मी! तुम्हें तो मेरी हर बात पर चिढ़ होती है, जबकि तुम जिसे दर्द का झूठा नाम दे रही हो मैं अच्छे से जानता हूँ वह क्या है" क्रोधित स्वर मे ऐसा कहकर अभिमन्यु ने फौरन उसकी गांड पर से अपने दोनो हाथ हटा लिए और फर्श पर पड़े टेक-अवे का पॉलीबैग उठाकर तत्काल पैर पटकते हुए बाकी की बची सीढ़ियां चढ़ने लगता है। उसके पास हमेशा उनके फ्लैट के मुख्यद्वार की चाबी मौजूद हुआ करती थी और जबतक अपनी सोच से बाहर निकलकर वैशाली भी उसके पीछे चलना शुरू कर पाती, दरवाजा खोलकर उसका बेटा फ्लैट को भीतर प्रवेश कर चुका था।

"मन्युऽऽ" फ्लैट के अंदर पसरे अंधेरे और सन्नाटे के बीच वैशाली अपने बेटे को पुकारते हुए हॉल की लाइट अॉन करती है, वह रूठने के अंदाज मे हॉल के सोफे पर अपनी नाक सिकोड़े बैठा हुआ था।

"अले! अले! मेरी डेट तो लगता है नाराज हो गई" वह सोफे के करीब आकर लाड़ भरे स्वर मे बोली।

"जस्ट लीव मी अलोन मॉम! यू नो, तुम्हीं मुझे पूरे दिन से उकसा रही हो और जब भी मैं अपने मन की करने को होता हूँ, फटाक से मुझे टोक देती हो" कहकर अभिमन्यु अपना चेहरा वैशाली की विपरीत दिशा मे मोड़ लेता है।

"ठीक कहा तुमने, शुरूआत हरबार मैंने ही की थी मगर अब खाने से तुम्हारी क्या दुश्मनी है? चलो उठो, मुझे भी जोरों की भूख लगी है" कहकर वैशाली उसे उसके दाएं कंधे से ऊपर उठाने का विफल प्रयास करने लगी।

"अच्छा ...अम्म! हाँ पहले तुम माँ की कच्छी उतार दो इसके बाद ही हम अपनी डेट सेलीब्रेट करेंगे" उसने पिछले कथन मे जोड़ा जब वह थक-हारकर भी अभिमन्यु को सोफे पर से उठा नही पाती।

"देखा फिर करी ना तुमने मेरी गांड मे उंगली, दोबारा खड़े लंड पर धोखा मत करो और मुझे अकेला छोड़ दो। प्लीज!" वह खिसियाते हुए कहता है जैसे उसकी वाणी मे शामिल अश्लीलता की उसे कोई परवाह ही ना हो। ठीक भी तो था, एक जवान लड़का बार-बार कबतक अपनी घटती-बढ़ती उत्तेजना को सहता रहेगा जबकि उसकी उत्तेजना का कारण कोई और नही उसकी अपनी सगी माँ ही थी।

"मैं जानती हूँ कि तुम इस वक्त क्या और कैसा फील कर रहे हो और मानो या मानो तुम्हारी माँ का भी कुछ यही हाल है। तुम्हारे पापा के अलावा इतनी फ्री मैं आजतक किसी के साथ नही हुई, अनुभा के साथ भी नही मगर जाने क्यों मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि मुझे तुम्हारे, अपने बेटे के साथ की जैसे बरसों से तलाश थी और ज्यों-ज्यों मेरी तलाश पूरी होने के करीब आती जा रही है, मैं हमारे रिश्ते तक को भूलते जाने पर मजबूर होने लगी हूँ। तुम्हारी माँ होकर भी मैं सोच-समझ नही पा रही कि क्या सही है और क्या गलत, बस पानी की धार सी बहती चली जा रही हूँ" गंभीरतापूर्वक ऐसा कहकर वह बेटे के दाएं कंधे को थपथपाने लगती है। इसी को तो हम आम भाषा मे सुख-दुख बांटना कहते हैं, अपने राज़ को स्वयं बेटे के संग सांझा कर मानो वैशाली के दिल से एक बहुत बड़ा बोझ हल्का हो गया था, कुछ विशेष नही तो कम से कम वह अपने भीतर सहसा एक अजीब--सी खुशी के प्रज्वलित होने का अहसास तो अवश्य करने लगी थी।

"तुम्हें इस बात का अफसोस है कि तुम अपने बेटे के साथ इतना फ्री क्यों हुईं?" अभिमन्यु हौले से बुदबुदाते हुए पूछता है। अपनी निजता को उसके संग बांटकर उसकी माँ ने एकाएक उसे बेहद अचंभित कर दिया था, जिसके नतीजन वैशाली के प्रति उसका प्रेम और विश्वास अब पहले से कहीं अधिक प्रगाढ़ होने लगा था।

"नही बिलकुल नही। अब मेरा यह जवाब मेरी ममता का है, मर्यादा का है, मेरे संस्कारों का है या फिर बंधनों की जंजीर मे जकड़ी आजादी की चाह रखने वाली एक आम--सी औरत का है, मैं यह नही जानती। जानती हूँ तो बस कि मुझे यह आजादी अच्छी लग रही है और मैं खुद को दोबारा से जिंदा महसूस कर पा रही हूँ" कहकर वैशाली सोफे से दूर जाने लगती है, यकीनन उसने अपना ह्रदय स्वयं अपनी छाती को चीरकर अपने बेटे के समक्ष प्रस्तुत कर दिया था। अभिमन्यु अपना चेहरा घुमाकर अपनी माँ के चलायमान कदमों को गौर से देखने लगा, वह उसी क्षण अपनी माँ के हर आगे बढ़ते कदम को चूमने की चाह से तड़प उठा। उसकी माँ पुनः दुखी हो गई और जिसका इकलौता कारण वह खुद को मान बैठा था, एकपल को भी उसे अपने पिता का ख्याल नही आया जिसने अपनी पत्नी को कभी अपनी पत्नी--सा नही समझा, समझा तो सिर्फ अपना एक आजीवन गुलाम, नौकर या सेवक और नियम के मुताबिक संसार की हर पत्नी की भांति उसकी माँ ने भी जैसे अपने पति का ताउम्र दासत्व अपना एकमात्र भाग्य मानकर सहर्ष ही स्वीकृत कर लिया था।

"मॉम! भूख लग रही है, तुम्हारे बेडरूम मे खाएंगे" वह सोफे से उठते हुए बोला और टेक-अवे पॉलीबैग डाइनिंग टेबल से उठाकर किचन मे घुस जाता है। उसने पिज्जा माक्रोवेब मे दोबारा गर्म किया, गार्लिक ब्रेड भी और फ्रिज से कोल्ड्रिंक की बॉटल, दो तरह के सॉसेज्स आदि निकालकर अपने परिजनों के शयनकक्ष के भीतर पहुँच गया। बेडरूम के बिस्तर के बीचों-बीच प्लास्टिक की एक चौकोर शीट बिछाकर वह डिनर उसपर करीने से सजाने लगता है, बिस्तर के नजदीक चुपचाप खड़ी हतप्रभ वैशाली उनके फ्लैट की खरीदी के उपरान्त आज पहली बार डिनर को अपने बेडरूम मे लगता देख रही थी और वह भी सीधे उसके बिस्तर पर, सही मायने मे जिसपर यदि किसी का सच्चा अधिकार था तो वह था सिर्फ उसका और उसके पति मणिक का।


"अपनी साड़ी और पेटीकोट उतार लो मम्मी फिर हम अपना डेट-डिनर शुरू करेंगे" वह बिना अपनी माँ की ओर देखे कहता है, निश्चित ही यह माँ-बेटे के बीच पनपे उसी समय अंतराल का भीषण परिणाम था जो अभिमन्यु को अपनी इस अनैतिक सोच को विचारने का भरपूर वक्त मिल गया था।

"साड़ी, पेटी ...पेटीकोट?" वैशाली एकाएक चौंकते हुए पूछती है। यह क्या कम था जो वह उसीके बेडरूम मे, उसीके बिस्तर पर अपने सगे जवान बेटे के साथ डिनर करने को मन ही मन अपनी स्वीकृति प्रदान कर चुकी थी। अपने बेटे के महा-नीच कथन और उसमे शामिल उसकी पापी मांग ने उसकी माँ को महज चौंकाया ही नही था वरन तत्काल वह आंतरिक लज्जा से दोहरी भी हो गई थी।

"जल्दी करो मम्मी, भूख के मारे मेरी जान निकली जा रही है" वह अॉरिगेनो, वाइट पैपर और चिल्ली फ्लेक्स के पाऊच्स संभालते हुए बोला।

"मगर साड़ी और पेटीकोट ...कैसे मन्यु? मैं तुम्हारी बात को शायद ठीक से समझ नही पा रही" वैशाली अपना निचला कंपकपाता होंठ अपने मोती समतुल्य दांतो के मध्य दबाते हुए पूछती है, अपने अत्यंत नाजुक होंठ को अपने तीक्ष्ण दांतों से जैसे वह आज स्वयं ही चबाकर खा जाने पर विवश थी।

"अम्म! हाँ क्या पूछ रही हो? ओह! मुझे भी तो कपड़े उतारने थे, कंफर्ट जोन मे खाने का मजा ही कुछ और होता है। है ना मॉम?" पत्थर मे तब्दील हुई अपनी माँ से ऐसा विस्फोटक प्रश्न पूछ उसके जवाब की प्रतीक्षा किए बगैर ही अभिमन्यु फौरन बिस्तर से नीचे उतर आया और रिकॉर्ड समय मे अपनी शर्ट और फिर जीन्स उतारकर वह कई वर्षों बाद अपनी माँ के समक्ष सिर्फ अपनी अंडरवियर पहने खड़ा हो जाता है। उसकी अंडरवियर जॉकी कम्पनी की थी, फुल फ्रेंची स्टाइल और जिसके भीतर कैद उसका अधखडा़ लंड जॉकी के ऊपर एक बहुत ही उत्तेजक बड़े--से तम्बू का निर्माण कर रहा था। हालांकि उसके अपने कपड़ों को उतारने के दौरान वैशाली ने उसे रोकने की हर संभव कोशिश की थी मगर उसके शब्द थे जो उसके गूंगे गले से बाहर ही नही निकल पाए थे मानो उसकी जुबान को एकदम से लकवा मार गया था।

"चलो अब उतारो भी, डिनर दोबारा ठंडा करना है क्या?" वह अपनी कमर के आजू-बाजू अपने दोनो हाथ रखकर किसी युवा मॉडल की भांति पोज देते हुए पूछता है। उसकी फूली नंगी छाती, बलिष्ट भुजाएं और मांस से भरी जाघों पर चहुं ओर बालों की अधिकता देख वैशाली यकीन ही नही कर पाती कि उसका बेटा आज के पश्चिमी परिवेश मे विचरण करने वाला कोई आम--सा नौजवान है, जबकि इस आधुनिक युग मे लड़कियां हों या लड़के सभी सफाचट रहना ज्यादा पसंद करते हैं। उसकी बेटी अनुभा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण थी जिसकी पॉकेटमनी का एक बड़ा हिस्सा उसके हेयर ट्रीटमेंट पर ही खर्च हुआ करता था।

"मैं तुमपर कोई प्रेशर नही डाल रहा हूँ माँ पर अगर तुम ऐसा करोगी तो मुझे बहुत खुशी होगी और साथ मे तुम्हें भी" वह ज्यों की त्यों बुत बनी खड़ी अपनी माँ की आँखों मे झांकते हुए कहता है, उसके चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान तब व्याप्त होने लगती है जब एकाएक वैशाली का दायां हाथ उसके पेट और बाएं की उंगलियां उसके ब्लाउज के ऊपर रेंगनी शुरू हो जाती हैं।

"वैसे तो तुम वाकई एक घटिया इंसान हो मन्यु पर कहीं अपना प्रॉमिज मत भूल जाना, तुमने खुद कहा है कि तुम मेरे ...यानी कि अपनी माँ के साथ सैक्स नही करना चाहते" कहते हुए शर्म से लाल पड़ी वैशाली अपने पेटीकोट मे खुरसी साड़ी को अपनी दाईं मुट्ठी मे कसकर भींच लेती है, संग-संग उसने बाएं हाथ से अपना पल्लू भी फौरन ब्लाउज से नीचे गिरा दिया।

"बिलकुल याद है मम्मी, मैं सचमुच अपनी माँ की चुदाई नही करना चाहता। एकबार फिर से कहता हूँ, मैं तुम्हें नही चोदूंगा मॉम मेरा तुमसे वादा है" अभिमन्यु उनके मर्यादित रिश्ते की पूर्णरूप से धज्जियां उड़ाते हुए बोला, उसका अश्लील संवाद इतना अधिक विध्वंशक था कि अपनी माँ के साथ वह स्वयं भी अपने ही शब्दों से थरथरा उठा था।

"मन्यूऽऽ" वैशाली चीखते हुए बोली मगर बावजूद इसके कि वह क्रोध से तिलमिला रही है, वह अपनी साड़ी पेटीकोट के बाहर खींचने से खुद को रोक नही पाती। बेटे के ज्वलंत कथन ने सहसा उसकी माँ के सम्पूर्ण बदन को बुरी तरह से झुलसा दिया था, जिसके नतीजतन वह अपने शरीर पर बारीक--सी एक साड़ी तक बरदाश्त नही कर सकी थी और तो और साड़ी के उसके पैरों के पास नीचे फर्श पर गिरते ही वह तीव्रता से अपने दाएं हाथ की प्रथम उंगली को अपने पेटीकोट के नाड़े मे उलझा लेती है।

"वाउ! माय नॉटी एण्ड सैक्सी बिच इस अॉन फायर ...आहां! यू बैटर कैरी अॉन मॉम, आइ रियली लव टू वॉच योर फकिंग अमेजिंग स्ट्रिप-टीज" अभिमन्यु ताली ठोकते हुए कहता है जैसे स्टेज पर खड़ी किसी रंडी के जल्द से जल्द नंगी हो जाने के प्रयास मे पब्लिक जोशो-खरोश से उसका उत्साहवर्धन करने लगती है ठीक उसी प्रकार वैशाली का बेटा भी अपनी माँ का आत्मविश्वास बढ़ा रहा था। वह तत्काल बिस्तर पर पैर लटकाकर बैठ जाता है ताकि उसकी माँ को अपना पेटीकोट उतारते देखने का अद्भुत व अद्वितीय कामुक दृश्य वह बड़े गौर से और बेहद नजदीक से देख सके।

"लाइक सन लाइक मदर, लाइक मदर लाइक सन। क्या कहते हो मन्यु, खींच दूं पेटीकोट की डोरी?" कामलुलोप वैशाली सीधे अभिमन्यु की जॉकी के भीतर पूरी तरह से तनकर कठोर हो चुके उसके लंड के बड़े से तम्बू को घूरते हुए पूछती है, अपने सगे बेटे के लंड की विशालता को वह सरलतापूर्वक उसकी जॉकी के ऊपर उभरा हुआ देख पा रही थी और जिसपर होती निरंतर हलचल से उसे उसके लंड की बारम्बार ठुमकियों का भी स्पष्ट अहसास होने लगा था। अतिशीघ्र वह माँ अपने अंतर्मन की उस आवाज को बेहद फूहड़ता से हँसकर दबा देती है जो उसे निकट भविष्य मे होने वाले दुष्परिणामों से बचने का हरसंभव संकेत दे रहा था, महज इस बहकावे मे कि उसके बेटे ने उसके संग चुदाई नही करने का उसे भीष्म वचन दिया था।

"बेशर्म मम्मी! अपने जवान बेटे से ऐसा नंगा सवाल पूछते हुए क्या तुम्हें जरा सी भी लज्जा नही आ रही?" अपने पेटीकोट के नाड़े मे अपनी दाईं उंगली फंसाए खडी़ अपनी माँ को चिढ़ाने के उद्देश्य से अभिमन्यु बोला।

"तुम कम से कम पलटकर तो खड़ी हो सकती हो माँ वर्ना मैं जरूर शर्म से मर जाऊंगा" उसने नीचतापूर्ण पिछले कथन मे जोड़ा और फिर खुद ही अपने दोनो हाथ अपनी माँ की ओर बढ़ाते हुए वह उसकी पतली कमर को मजबूती से थामकर, उसे आसानीपूर्वक अर्धाकार घुमा देता है। अपनी माँ की नंगी त्वचा की अत्यधिक गरमाहट ने अभिमन्यु को विस्मय से भर दिया था, लगा जैसे वह अत्यंत तेज बुखार से तप रही हो। खुद उसका भी तो यही हाल था, जॉकी के भीतर कैद उसका फड़फड़ाता लंड बिना उसके हाथ लगाए ही झड़ पड़ने की कगार पर पहुँच चुका था। वहीं वैशाली बेटे के मजबूत हाथों के स्पर्श से एकाएक सकपका--सी गई थी, उसका बचाखुचा धैर्य बेटे के अनैतिक, निकृष्ट कथनों ने तोड़ दिया था और इससे पहले कि वह पूरी तरह से टूट जाती या अभिमन्यु के वचन को मिथ्या साबित करने का स्वयं प्रण कर लेती, वह झटके से अपने पेटीकोट का नाड़ा खींच देती है।

"इश्श्श्ऽऽ!" एकसाथ दोनो माँ-बेटे सीत्कार उठे, किसकी सीत्कार मे ज्यादा वजन था यह पहचान पाना असंभव सा था। पेटीकोट के वैशाली की चिकनी त्वचा से नीचे फिसलते ही अभिमन्यु का कलेजा मुंह को आ गया, वह फौरन अपनी जॉकी के ऊपर से अपने कठोर लंड को बलपूर्वक उमेठ देता है ताकि तीव्रता से शून्य मे परिवर्तित होता जा रहा उसका मस्तिष्क उसके नाजुक कामांग पर किए उसके खुद के निष्ठुर प्रहार से यथासंभव जीवंत बना रह सके।

ब्लाउस से नीचे लगभग पूरी नंगी हो चुकी अपनी माँ की पीठ से अपनी फट पडी़ आँखों को नीचे लाते हुए अभिमन्यु सीधे उसकी गुदाज गांड को घूरने लगता है, उसकी माँ ने एकदम सच कहा था कि उसके द्वारा लाई गई फैशनेबल कच्छी बार-बार उसकी गांड की गहरी दरार के बीच घुस जाती है। वैशाली की गांड का दायां पट बिलकुल नंगा था और बाएं पट को भी कच्छी बेमुश्किल आधा ही ढ़ांक सकने मे सक्षम नजर आ रही थी। उसने स्पष्ट यह भी देखा कि कुछ वक्त पीछे उसके अपनी माँ की गांड को दबोचने और शक्तिपूर्वक उसे मसलने के परिणामस्वरूप गांड के दोनो गौरवर्णी पट सुर्ख लाल हो गये थे और जिनकी सुर्खियत पर एकाएक मोहित होकर अभिमन्यु बिना कोई अतिरिक्त क्षण गंवाए, बारी-बारी उसके दोनो पटों को तेजी से चूमना शुरू कर देता है।

"मन्युऽऽ! ये ... ये क्या?" अपने बेटे के होंठों का स्पर्श अपनी नंगी गांड पर महसूस करते ही वैशाली अचानक से अपने पैरों को चलायमान कर देने पर विवश हो जाती है और इसके तुरंत बाद ही उसने पलटकर खडे़ होते हुए पूछा। उसे कोई विशेष परवाह नही थी कि अब अभिमन्यु कच्छी के भीतर निरंतर रस उगलती उसकी चूत पर अपनी आँखे गड़ा सकता है, यकीनन समझ भी सकता है कि उसकी माँ किस बुरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी।

"सॉरी! मैं बस तुम्हारे उस दर्द को कम करना चाहता था जो मैंने खुद तुम्हें दिया था" वह धीमे स्वर मे बोला, हरपल शरारत से भरा रहने वाला उसका चेहरा जैसे फौरन कुम्भला सा गया था।

"अब मैं और तुम्हारी झूठी, मक्कार बातों मे नही आनेवाली मन्यु" कहकर वैशाली नीचे फर्श पर पड़े अपने पेटीकोट को उठाने लगती है, हालांकि अपनी नंगी गांड पर उसे बेटे के होंठों का स्पर्श अंदर तक मंत्रमुग्ध कर गया था मगर वह इस सत्य को एकाएक अभिमन्यु के समक्ष कबूल भी तो नही सकती थी। जीवन मे पहली बार किसी मर्द के होठों ने उसके निचले धड़ को छुआ था और वह मर्द कोई और नही उसका अपना सगा बेटा था, उनका पवित्र रिश्ता ही एकमात्र कारण था जो उसे बेवजह बेटे पर झूठा लांछन लगाना पड़ रहा था जबकि वह अच्छे से जानती थी कि भले ही उसका बेटा दुनियाभर से झूठ कहता-फिरता हो पर अपनी माँ से कभी नही बोल सकता था और वह भी तब जब वह अपनी माँ को अपनी खुद की जान से ज्यादा चाहने लगा था, वाकई उसके सच्चे प्रेम मे पड़ गया था।

"तुम्हारे पीछे ....वहाँ पूरे मे रेड-रेड हो गया है और जो मेरी अपनी गलती की वहज से हुआ, तुमने तो मुझे रोकने की कोशिश की थी यह बाताकर कि तुम्हें वहाँ दर्द हो रहा है पर मैं कहाँ माना था। शायद इसीलिए मैंने ....." अभिमन्यु गहरी व लंबी-लंबी सांसें भरते हुए बोला, जाहिर था कि अपनी माँ के हाथ मे उसका उतरा हुआ पेटीकोट देख उसे जरा भी अच्छा नही लगा था परंतु इस संबंध मे वह वैशाली से कुछ नही कहता बल्कि पेटीकोट को वापस पहनने का निर्णय वह खुद उसी पर छोड़ देता है।

"कभी-कभी मुझे लगता है कि तुम एक नही दो इंसान हो जो पता नही कब हँसने लगे और कब रूठ जाए, कब शैतानी कर बैठे और कब प्यार जताने लगे। अब बोलो भी ...कि मैं पेटीकोट नही पहनूँ वर्ना सचमुच पहन लूंगी" मुस्कुराकर ऐसा कहते हुए वैशाली तत्काल अपना पेटीकोट हवा मे झुलाने लगती है वह जानबूझकर उसे बार-बार बेटे के नजदीक ले जा रही थी ताकि वह उसे जबरन अपनी माँ के हाथ से छीन ले मगर अभिमन्यु उसे सफा चौंकाकर बिस्तर पर चढ़ गया और पीछे सरकते हुए बिस्तर की पुश्त से टेक लगाकर बैठ जाता है।

"आओ माँ! आज तुम्हें अपने हाथों से खिलाऊँगा ...यहाँ आओ और अपने बेटे की टांगों के बीच आकर बैठो। घबराना मत, तुम्हें चोदूंगा नही ....तुमसे वादा जो किया है" काफी गंभीर स्वर मे ऐसा कहकर अभिमन्यु अपनी माँ की आँखों मे झांकते हुए ही जॉकी के ऊपर से अपने कठोर लंड को बड़ी बेशर्मी के साथ सहलाने लगा और जिसे देख खुद ब खुद पेटीकोट वैशाली के हाथ से पुनः नीचे फर्श पर गिर जाता है। वह माँ अपने बेटे की अश्लील वाणी से कहीं ज्यादा उसकी पापी हरकत, उसके नीच इशारे से अचंभित हुई थी। एकसाथ क्रोध, लज्जा, कुठां, कामुत्तेजना आदि कई भावों से तड़प उठी, एकाएक अत्यधिक चुदास महसूस करती वह माँ भी खुद पर संयम नही रख पाती और किसी बाजारू वैश्या की भांति अपने दाएं हाथ की मुट्ठी मे तत्काल अपनी कच्छी को बलपूर्वक भींच लेती है। उसकी कच्छी के निचोड़ से उसका ढ़ेर सार कामरस उसकी दाईं मुट्ठी मे एकत्रित होने लगा और जो शीघ्र ही उसकी उंगलियों की पोर से छलककर लिसलिसी बूंदों के रूप मे नीचे फर्श पर टपकने लगता है।


"अब आती हो या फिर मैं अपनी यह जॉकी भी उतार दूं" अपनी माँ की इस विस्फोटक कार्यवाही को प्रत्यक्ष देख अभिमन्यु अखंड उन्माद से कांपते हुए बोला और तीव्रता से अपने हाथ के दोनो अंगूठे अपनी कमर के इर्द-गिर्द लाकर उन्हें अपनी जॉकी की इलास्टिक मे फंसा देता है, तत्पश्चात उसने फौरन अपनी गांड बिस्तर से पूरी तरह ऊपर उठा दी मानो सचमुच वह अगले ही पल अपनी सगी माँ के समक्ष पूर्णरूप से नंगा हो जानेवाला था।

"नही! नही! नही! ...मैं आ रही हूँ, मैं आ रही हूँ बेटा" लगभग चीखते स्वर मे ऐसा कहकर वैशाली अचानक ही बिस्तर पर कूद पड़ती है। यह दृश्य भी बहुत कामुक था, बिस्तर पर पहले से ही अधनंगे बैठे अपने अत्युत्तेजित जवान बेटे की चौड़ी छाती से टेक लगाकर बैठने के अत्यंत पापी उद्देश्य से, सिर्फ ब्लाउज और छोटी--सी कच्छी पहने एक माँ अपने घुटनों और हाथों के बल बिस्तर पर चलना शुरू कर चुकी थी। उसके हर बढ़ते कदम पर उसके गोल-मटोल मम्मे उसके ब्लाउज से बाहर निकल आने को मचल उठते, पति के जीवित होने का प्रमुख प्रमाण उसका मंगलसूत्र झूले--सा झूलता हुआ, उसकी मांसल गांड हवा मे तनी हुई, बाल कंधे और चेहरे पर बिखरे हुए, हाथों के पंजे और दोनो घुटने मुलायम गद्दे मे धंसे हुए; एक अजीब से रोमांच को जाग्रत कर देने वाला दृश्य था। अभिमन्यु के नजदीक पहुँचकर जब वैशाली ने अपने शरीर को घुमाया तब सहसा उसकी गांड बेटे के चेहरे से रगड़ खाती हुई गुजरी, उसने अपने दोनो हाथों से स्वयं अपने बेटे की टांगों को विपरीत दिशा मे चौड़ाया और अंततः वह पापिन माँ बिस्तर पर बेटे के अधनंगे बदन से टेक लगाकर बैठ जाने मे सफल हो ही जाती है।


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